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अच्छी तरह से सोच लें जिनपिंग, चीन में कब तक चलती रहेगी पार्टी?

आर्किड उर्फ योहानला 17 साल की थी, जब वह क्विंग राजवंश के सम्राट की 3000 रखैलों की कतार में शामिल हुई। आमतौर पर तो उसे बीजिंग के फोरबिडन सिटी की भूलभुलैया में हमेशा के लिए गुम हो जाना था, जहां सम्राट के शयनकक्ष में उसका नंबर शायद कभी नहीं आता। लेकिन बेहद खूबसूरत और चतुर योहानला ने अगले छह दशकों तक अपनी और राजवंश की ही नहीं, चीन की तकदीर को भी बदल डाला।

वह सम्राट की पत्नी बनी, राजकाज पर कब्जा किया, अफीमची सम्राट की मौत के बाद युवराज बेटे की रीजेंट बनी, बेटे को किनारे किया, उसकी मौत के बाद एक बच्चे को सिंहासन पर बैठाया, उसे भी नाकाबिल पाकर हटा दिया और प्रजा की चहेती बनी रही।

योहानला, जिसे बाद में सीशी के नाम से जाना गया, चीन की आखिरी सम्राज्ञी कहलाती है। पर्ल एस. बक के उपन्यास ‘इंपीरियल वुमन’ में इस हैरतअंगेज ज़िंदगी को पढ़ते हुए आप यह बात नोटिस किए बिना नहीं रह सकते कि योहाना को इतिहास का कितना अशांत दौर नसीब हुआ था।

ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, पुर्तगाल, रूस और जापान हर तरफ से चीन पर टूटे पड़ रहे थे। पूरी कहानी में पश्चिम की असभ्य ताकतों से भिड़ने का भाव हावी दिखता है। देश के भीतर भी कई तरह के असंतोष और बगावतें राजवंश को चैन से नहीं जीने दे रही थीं।

लेकिन इससे भी ज्यादा नोटिस शायद आप इस बात को करेंगे कि 100 साल पुरानी यह कहानी आज भी कितनी माकूल बैठती है। राजगद्दी की जगह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को रख दीजिए। योहानला तब अस्तित्व की जिस जंग में मुब्तिला थी, आज उसमें कम्युनिस्ट पार्टी के लिए शी चिन फिंग हैं। यह चीन का आधुनिक राजवंश है।

पिछली सदी के आखिरी दिनों में सोवियत संघ टूट जाने के बाद चार ही देशों में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन बचा रह गया है: क्यूबा, वियतनाम, लाओस और चीन। इनमें चीन ही काबिलेगौर है, क्योंकि वह दुनिया का सबसे बड़ा और दूसरा सबसे ताकतवर देश जो है।

आज की इस जबरदस्त तरीके से एकाकार हो गई दुनिया में अनुदार और अलोकतांत्रिक सिस्टम का यह अकेला टापू एक अजब सी मौजूदगी है। जाहिर है इसे कायम रखना कतई आसान बात नहीं। माओ की लीडरशिप में पार्टी ने चीन की सत्ता हासिल की। अब वह कहां जाए? सोवियत संघ का अंजाम देखा। वह चीन में नहीं होने दिया जा सकता। यह जिंदा रहने की लड़ाई है। योहानला एक शेर पर सवार थी। वह चाहे भी तो उतर नहीं सकती थी। आज उसी शेर पर पार्टी सवार है।

क्या है पार्टी और कितना मुश्किल है इस निजाम को कायम रखना। अब हम इस पर बात करेंगे। याद रखिए यही चीन की असल कहानी है। तीन बातें हैं जिन्हें हम चीन के मूल सिद्धांत कह सकते हैं। पहला, लोकतांत्रिक देशों में जो स्थान जनता का होता है, चीन में वही पार्टी का है। सरकार, सेना, अर्थ तंत्र, अदालत और तमाम व्यवस्थाएं पार्टी के लिए ही काम करती हैं। पार्टी सबसे ऊपर है। हर कोई पार्टी के प्रति जवाबदेह है। पार्टी सिर्फ अपने प्रति जवाबदेह है।

दूसरा, चीन भी एक राष्ट्र राज्य यानी नेशन स्टेट है। लेकिन वहां नेशन का आधार पार्टी ही है। मसलन भारत में आप बिना किसी संस्था या सरकार पर आस्था रखे भारत देश को प्यार कर सकते हैं। लेकिन चीन में देश को प्यार करने का मतलब पार्टी को प्यार करना ही है। आप पार्टी को खारिज करते हुए चीन से देशभक्ति करें, तो देशद्रोही माने जाएंगे।

तीसरा, पार्टी ईश्वर की तरह हर जगह मौजूद होती है। तीन तरह से लोगों की वफादारी को पक्का किया जाता है ; निगरानी, प्रोपेगेंडा और मौजूदगी। आगे हम देखेंगे कि ये इंतजाम अलग-अलग मोर्चों पर कैसे काम करते हैं।


पार्टी और जनता
चीन में करीब 9 करोड़ लोग पार्टी के सदस्य हैं। यही वह वर्ग है जो देश को चला रहा है। अहम पदों पर पार्टी के सदस्य ही पहुंचते हैं। यह वैसे ही है जैसे किसी बड़ी संस्था या कंपनी को देश चलाने का ठेका मिल गया हो। पार्टी ज़िंदगी के हर स्तर पर मौजूद रहती है। हर जगह पार्टी कमिटियां होती हैं और सारी गतिविधियों को रेगुलेट करना उनकी जिम्मेदारी है। कमिटी सेक्रेटरी हर चीज़ पर नज़र रखता है।

पार्टी ने इस बात को समझ लिया था कि इतनी बड़ी आबादी को सिर्फ आइडियोलॉजी के दम पर भरमाए नहीं रखा जा सकता। सवाल पूछना और हक़ मांगना इंसानों की बड़ी बुरी आदत है। उन्हें चुप रखने के लिए क़ीमत देनी होती है। इसलिए तंग श्याओ फिंग ने 80 के दशक में इकॉनमी को रफ़्तार देने का दाव खेला।

लेकिन इसके बावजूद जब 1989 की बगावत हुई तो पार्टी को समझ आया कि तरक्की के साथ शासन के फंदे को न कसो तो लोगों का दिमाग़ ख़राब होते देर नहीं लगती। उसके बाद से पार्टी ने निगरानी का सिस्टम और भी दुरुस्त किया है। चीन का इंटरनेट एक बंद कमरा है, जहां बाहरी दुनिया सख्त पहरे से होकर ही झांक पाती है। परेशानी पैदा करने वाले पोस्ट फौरन साफ़ कर दिए जाते हैं।

ऐसा नहीं कि चीन में विरोध प्रदर्शन नहीं होते या लोग सरकार की आलोचना नहीं करते। लेकिन इन्हें कहां तक जगह दी जाए, यह पार्टी तय करती है। कई मामलों में रस्सी काफी लंबी हो सकती है, क्योंकि इससे उदारता का भ्रम दुनिया में फैलता है। बहरहाल लोगों पर नज़र रखने के लिए टेक्नलॉजी का जैसा इस्तेमाल चीन में हो रहा है वैसे शायद ही कहीं और होता हो।

लोकतांत्रिक आज़ादियों से यह इनकार चीनी जनता को परेशान करता हो, यह नहीं दिख रहा। बाहरी दुनिया के खुलेपन को लेकर कोई बेचैनी भी नहीं दिखती। इसकी वजह है चीन की बेमिसाल तरक्की। पार्टी अपनी प्रजा की वफादारी खरीदने में क़ामयाब रही। एक आम चीनी आज अपने और अपने देश की आर्थिक ताकत को लेकर आश्वस्त है। वह जान गया है कि पार्टी को अगर आप नहीं छेड़ते हैं तो आपके लिए आगे बढ़ने के तमाम मौके हैं। यह एक मौन सहमति है जिसे बना लेना पार्टी की बहुत बड़ी क़ामयाबी है। सवाल है कि कब तक यह बनी रहेगी।

पार्टी और बिजनेस
कम्युनिस्ट जकड़बंदी से बाहर निकल कर जब तंग ने मार्केट को गले लगाया तो उनका नारा था, बिल्ली सफेद हो या काली क्या फर्क पड़ता है अगर वह चूहा पकड़ती है तो। पार्टी ने कम्युनिटी फार्मिंग से निकालकर लोगों को उद्यमों की ओर बढ़ने का मौका दिया। धीरे-धीरे प्राइवेट प्रॉपर्टी के हक बहाल किए गए और फिर एक दिन बिज़नेस वालों को पार्टी फोरम में जगह भी मिलने लगी।

लेकिन इसके बावजूद पार्टी को पता है कि बिज़नेस को खुली छूट नहीं दी जा सकती। बिज़नेस कभी उस हद को पार करें और पार्टी को चैलेंज करने लगे, यह नहीं हो सकता। इसलिए चीन में हर महत्वपूर्ण कंपनी में पार्टी कमिटी होती है। पार्टी के सदस्य उसके कामकाज पर नजर रख रहे होते हैं। बिज़नेस की मंजूरी पार्टी देती है, इसलिए बिज़नेसमैन जानते हैं कि पार्टी से करीब रहकर ही वे तरक्की कर सकते हैं।

इस गठबंधन का पॉजिटिव पहलू यह है कि बिज़नेस शुरू करना और उसे बढ़ाना काफी आसान हो गया है। लेकिन इसी नजदीकी ने करप्शन का एक ऐसा गठजोड़ पैदा कर दिया है जो पार्टी के लिए भयानक संकट बन चुका है। पार्टी पदाधिकारियों के साथ मिलकर कंपनियां मनचाहे धंधे करती हैं।

कुछ बरस पहले शंघाई में रीडिवेलपमेंट के नाम पर इतना बड़ा घोटाला हुआ कि पार्टी हिल गई। पानी गले से ऊपर जाता देखकर शी ने करप्ट नेताओं और व्यवसायियों के खिलाफ जोरदार मुहिम छेड़ी। पार्टी को साफ दिखने लगा था कि करप्शन की यह बेहयाई लोगों की नज़र में उसे नाजायज बना सकती है। लेकिन यह खतरा लौट-लौटकर पार्टी को सताएगा, क्योंकि गठजोड़ के इस सिस्टम को बदला नहीं जा सकता।


पार्टी और सेना
1989 के लोकतंत्र आंदोलन के दौरान आर्मी के कुछ कमांडरों और सिपाहियों ने जनता के खिलाफ कार्रवाई से इंकार कर दिया था। तब पहली बार वह दरार दिखी जो पार्टी और देश के बीच होती है और जिसे छिपाने की कोशिश पार्टी हमेशा करती रही। इसके बाद आर्मी को सही रास्ते पर लाने की बहुत कोशिश की गई। उसे चुस्त और वफादार बनाया गया।

चीन की सेना में बड़े पदों पर दो-दो अफ़सर होते हैं, एक फौजी और दूसरा पॉलिटिकल कमिसार। यह कमिसार पार्टी का एजेंट है, जिसका काम सेना को पार्टी की राह पर टिकाए रखना है। लेकिन फिर भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या एक प्रफेशनल आर्मी देश और पार्टी को एक ही समझती रहेगी?

आप देख सकते हैं कि किस तरह चीन को लगभग हर मोर्चे पर नाजुक बैलेंस बनाए रखने पड़ते हैं। यह एक असामान्य सिस्टम में जीने का खामियाजा है।
दुनिया की दूसरी बड़ी ताकत और सबसे बड़ी आबादी वाला देश अगर ऐसी असामान्यता में जी रहा हो तो यह सारी दुनिया के लिए ख़तरनाक बात है। इस नाजुक बैलेंस का बिगड़ जाना सिर्फ चीन को ही नहीं सारी दुनिया को तकलीफ में डाल देगा।

पार्टी को पता है कि 40 साल से जारी तरक्की को अब उसी रफ्त़ार पर क़ायम नहीं रखा जा सकता। उसकी आबादी तेजी से बूढ़ी होती जा रही है। लिहाजा भविष्य को लेकर बेचैनी तो होनी ही है। शी इस बैलेंस को आक्रामकता, कट्टर राष्ट्रवाद और निरंकुश शासन के जरिए कायम रखने की जद्दोजहद में हैं। लेकिन पार्टी इस वक्त जरूर सोच रही होगी, मेरे पास कितना वक्त है?
शेर गुर्रा रहा है।

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