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इनको जिसने छुआ वो जान से गया, ऐसे बनाई जातीं विषकन्या

90 का दशक जीने वालों को धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ ज़रूर याद होगा। नीरजा गुलेरी के निर्देशन में बना यह धारावाहिक देवकीनंदन खत्री के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित था। इस धारावाहिक में क्या कुछ नहीं था- अय्यारी, जादू-टोना, राजनीतिक षड्यंत्र, युद्ध, इश्क-मुहब्बत की दास्तानें और सबसे बढ़कर विषकन्याएं।

विषकन्याएं इस धारावाहिक के बाद ही चर्चा का विषय बनीं। बला की ख़ूबसूरत, बेहद रहस्यमयी और एक जीता-जागता ज़हरीला हथियार। सम्मोहन के जाल में फंसाकर पुरुषों को मौत के घाट उतार देने वाली इन विषकन्याओं का ज़िक्र यूं तो कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, लेकिन आम लोगों के बीच ये इस धारावाहिक के बाद ही जिज्ञासा का केंद्र बनीं।

1888 में देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चंद्रकांता संतति’ में कई जगह इनका ज़िक्र है। कहानीकार विवेक मिश्र बताते हैं, ‘चंद्रकांता संतति 13 खंडों में है। इस उपन्यास में विस्तार से बताया गया है कि विषकन्याएं कैसे बनती थीं। जिन कन्याओं का विषकन्या बनाने के लिए चयन किया जाता था, उन्हें बचपन से ही थोड़ी-थोड़ी मात्रा में विष देना शुरू कर दिया जाता।

इनको बाक़ायदा ट्रेनिंग दी जाती थी। चूंकि इनका इस्तेमाल राजनीतिक मक़सद से किया जाता, इसलिए इन्हें तहज़ीब, संगीत और नृत्य की शिक्षा दी जाती, ताकि शत्रु राजा या बड़े ओहदे पर बैठे पुरुष इनकी ख़ूबसूरती और व्यवहार के जाल में फंस सकें। इन्हें युद्ध कौशल में निपुण बनाया जाता और हर तरह की छल विद्या सिखाई जाती।’

आयुर्वेद और शल्य चिकित्सा के सबसे प्राचीन संस्कृत ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ में भी विषकन्याओं का ज़िक्र मिलता है। इस ग्रंथ की रचना छठी शताब्दी में काशी में जन्मे आचार्य सुश्रुत ने की थी। ग्रंथ में लिखा है, ‘विषकन्या के चुंबन या इनके साथ संभोग करने से पुरुष के शरीर में ज़हर फैल जाता है। जूं आदि इसके शरीर पर तुरंत मर जाती है, यही इसकी पहचान है।’ कहा जाता है कि किसी कन्या को विषकन्या बनाने के लिए उसे भोजन में नमक नहीं दिया जाता था।

विषकन्या बनाने के लिए ऐसी बालिकाओं का चयन किया जाता, जो ‘विषकन्या योग’ में जन्म ले। इस योग में जन्म लेने वाली कन्याएं शादी के बाद अपनी पति की मौत का कारण बनती हैं।

पहली बार कब हुआ इस्तेमाल
322 ईसा पूर्व से 187 ईसा पूर्व के बीच मौर्य साम्राज्य के दौरान पहली बार इनका नाम आता है। राजा चंद्रगुप्त मौर्य के सलाहकार और महान कूटनीतिज्ञ चाणक्य की लिखी क़िताब ‘अर्थशास्त्र’ में बताया गया है कि कैसे विषकन्याओं का इस्तेमाल शक्तिशाली शत्रुओं की छलपूर्वक हत्या करने के लिए किया जाता था।

कहा जाता है कि चाणक्य ने कई बार महाराजा चंद्रगुप्त की विषकन्याओं से रक्षा की। संस्कृत के ऐतिहासिक नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में भी विषकन्याओं की बात की गई है। इस नाटक की रचना विशाखदत्त ने की थी। नाटक के मुताबिक, एक बार नंद वंश के सम्राट धनानंद ने चंद्रगुप्त के पास एक रूपवती स्त्री को भेजा। चंद्रगुप्त उस पर मोहित हो गए, लेकिन जैसे ही चाणक्य ने उस स्त्री को देखा वह समझ गए कि यह विषकन्या है।

उन्होंने चंद्रगुप्त के साथी राजा पर्वत्तक से कहा कि इस रूपवती स्त्री को आप स्वीकार करें। राजा पर्वत्तक चंद्रगुप्त मौर्य की टक्कर का था। जैसे ही उसने विषकन्या को छुआ, विषकन्या के हाथ में लगे पसीने से पर्वत्तक के शरीर में ज़हर फैल गया और आखिरकार उसकी मृत्यु हो गई।

इस घटना के बाद चाणक्य ने चंद्रगुप्त को विषकन्याओं के विष से बचाने के लिए भोजन में थोड़ा-थोड़ा ज़हर देना शुरू किया। धीरे-धीरे विष की मात्रा बढ़ानी शुरू कर दी, ताकि राजा का शरीर इम्यून हो जाए और विषकन्या के विष का उन पर कोई असर न हो।

विदेशों में भी विष का खेल
‘मुद्राराक्षस’ के अलावा बारहवीं सदी के ‘कथासरितसागर’ में भी विषकन्या का अस्तित्व मिलता है। एक और संस्कृत ग्रंथ ‘शुभवाहुउत्तरी कथा’ की राजकन्या कामसुंदरी भी एक विषकन्या कही जाती हैं। इसी तरह हिंदुओं के पौराणिक धर्मग्रंथ ‘कल्कि पुराण’ में चित्रग्रीवा नाम के एक गंधर्व की पत्नी सुलोचना को विषकन्या बताया गया है।

इन खूबसूरत और रहस्यमयी किरदारों से विदेशी पन्ने भी भरे पड़े हैं। पर्शियन और ग्रीक वंश से ताल्लुक रखने वाले मिथरिडेट्स द ग्रेट पोंटस साम्राज्य के बादशाह थे। उनके शरीर पर भी ज़हर का असर नहीं होता। उन्होंने ख़ास अपने लिए 65 सामग्रियों को मिलाकर एक ऐन्टिडोट तैयार किया था।

कहा जाता है कि मिथरिडेट्स की मां उनके दूसरे भाई को राजगद्दी देना चाहती थी। इसलिए उन्हें मारने के लिए मां ने खाने में थोड़ा-थोड़ा ज़हर देना शुरू किया। जब मिथरिडेट्स को यह बात पता चली तो वह जान बचाने के लिए जंगल में भाग गए।

वहां रहकर उन्होंने कम मात्रा में ज़हर खाना शुरू किया, ताकि उनके शरीर पर किसी ज़हर का असर न हो। इसके बाद उन्होंने अलग- अलग तरह के ज़हर और कुछ अन्य औषधियां मिलाकर एक ऐन्टिडोट तैयार किया, जिसे उनका ही नाम दिया गया, ‘मिथरिडेट’।

अरस्तु ने अपने शिष्य अलेक्जेंडर द ग्रेट को लिखी सीक्रेट चिट्ठियों ‘सीक्रेटम सीक्रेटोरम’ यानी ‘रहस्यों के रहस्य’ में उन्हें विषकन्याओं के प्रति आगाह किया है। अरस्तु उन्हें भारतीय राजाओं द्वारा दिए जाने वाले बेशक़ीमती तोहफों और सुंदर महिलाओं पर भरोसा न करने की हिदायत देते हैं।

वह अलेक्जेंडर को उन भारतीय राजाओं की दास्तां से सीखने को कहते हैं, जिनकी मौत ज़हर से हुई। वह कहते हैं, भारतीय राजाओं द्वारा भेजी गई उन सुंदर स्त्रियों से सावधान रहना, जिन्हें वे विष पिलाकर एक ज़हरीली नागिन जैसा बना देते हैं। कहा जाता है कि अलेक्जेंडर की मौत ऐसी ही एक विषकन्या के हाथों हुई थी, जिसे पोरस ने उनके पास तोहफे के रूप में भेजा था।

पौराणिक धर्मग्रंथों से होते हुए भारतीय और विदेशी साहित्य में शामिल हुईं विषकन्याएं धीरे-धीरे लोककथाओं का हिस्सा बन गईं। लेकिन एक ही साथ इतने सारे भारतीय और विदेशी ग्रंथों में इनकी भूमिका इनके अस्तित्व को लेकर सोचने पर मजबूर ज़रूर कर देती है।

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