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इस्लाम के आंतरिक युद्ध की हो गई आधिकारिक शुरुआत, अरब मुस्लिमों के सामने गैर-अरब मुसलमान

बदलाव समय की मांग है। अरब देश ये बात अच्छे से समझते हैं और इसीलिए ये देश इस्लामिक कट्टरता को छोड़ प्रगतिवादी की ओर कदम उठा रहे हैं। ऐसे गैर-अरबी मुस्लिम देश जो प्रगति और विकास की ओर कोई खास ध्यान नहीं दे रहे हैं, उन्हें ये अरब देश अब नजरंदाज करने लगे हैं। यूएई ने इसी कड़ी में पाकिस्तान समेत 11 देशों के नागरिकों के वीजा आवेदन की स्वीकृति पर अस्थाई रोक लगा दी है। यूएई ने इसे कोरोना महामारी के कारण उठाया गया कदम बताया है। वास्तव में ये फैसला साफ दिखाता है कि अरब देश अब गैर-अरब देशों की तुलना में प्रगतिशील रुख अपनाते हुए इस्लामिक कट्टरता को त्याग रहे हैं, जबकि गैर-अरबी मुस्लिम देश अब प्रगति की बजाए दुर्गति को न्योता दे रहे हैं, जिससे अब पूरे विश्व में अरब मुस्लिम देशों और गैर-अरबी मुस्लिम देशों के बीच एक नई जंग छिड़ गई है।

यूएई जो एक प्रगतिशील अरब देश है उसने पाकिस्तान समेत 11 मुस्लिम देशों के वीजा आवेदनों पर बैन लगा दिया है। इस खबर की जानकारी खुद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाहिद हाफिज चौधरी ने दी है। गौरतलब है कि पाकिस्तान के अलावा ये निर्णय अन्य 11 मुस्लिम देशों के लिए भी लिया गया है जिसमें तुर्की, ईरान और अफगानिस्तान जैसे देश भी शामिल हैं। ये ऐसे देश हैं जो धर्म परिवर्तन के बाद इस्लामिक देश बने हैं।

हाल के परिदृश्यों को देखें तो इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी भी अब बिखरता नजर आ रहा है। यही नहीं ओआईसी ने द्विपक्षीय मुद्दों को महत्व देना भी बंद कर दिया है, जिसके चलते इन गैर-अरबी मुस्लिम देशों का आतंकी एजेंडा फुस्स हुआ है।  इसका उदाहरण पाकिस्तान द्वारा ओआईसी में उठाया गया कश्मीर का मुद्दा है।

गैर-अरबी देशों की कट्टरता से इतर अब अरब देश विकास और प्रगति को महत्व देर रहे हैं। यूएई और इजरायल के बीच हुई डील इस बात का उदाहरण है। इन दोनों देशों के बीच की तकरार इतनी लंबी थी कि ये कहा जाता था कि इजरायल और यूएई समेत अरब देश कभी एक हो ही नहीं सकते, लेकिन ये दोस्ती अमेरिका के कारण हुई। अरब देश फिलीस्तीन की वकालत करते थे, जिसमें यूएई भी शामिल था। इसके बावजूद यूएई ने इजरायल के साथ अपने रिश्तों को बेहतर करने की ओर कदम बढ़ाए जो दिखाता है कि अब ये देश पुराने मुद्दों पर मिट्टी डालकर आगे बढ़ गए हैं। सऊदी अरब भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। संभावनाएं हैं कि इजरायल के साथ अभी कई अन्य अरब देश भी संबंध मजबूत करेंगे।

इसके साथ ही अब ये देश पाकिस्तान पर भी इजरायल को मान्यता देने के लिए दबाव बना रहे हैं।

हालांकि, गैर-अरबी देशों को अरब देशों द्वारा फिलीस्तीन के मुद्दे को कूड़े में डालना रास नहीं आया है जिसके चलते इनमें से कई देशों ने इजरायल और यूएई के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते की आलोचना की।

इसका एक बड़ा उदाहरण फ्रांस है जहां कट्टरवादी इस्लाम के खिलाफ राष्ट्रपति  मैक्रों ने एक्शन लिया तो राष्ट्रपति  मैक्रों के खिलाफ तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश विरोध में उतर गये, जबकि सऊदी अरब और यूएई जैसे देश फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ थे। ये दिखाता है कि अरब देश अब कट्टरता को छोड़ प्रगतिवादी विचार अपना रहे हैं, जबकि तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश कट्टरता को अपनाते हुए विकास को तवज्जो देने के बजाए अपने लिए ही गड्ढा खोद रहे हैं, जो अरब देश और गैर-अरबी देशों के बीच एक नई जंग के आगाज़ की ओर इशारा कर रहा है। अरब देश इन गैर अरबी देशों की हरकतों पर भी नजर बनाए हुए है। तभी तो सऊदी अरब के चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के प्रमुख ने तुर्की का हर तरह से बहिष्कार करने की अपील की थी। इसके साथ ही पाकिस्तान पर आर्थिक दबाव बना रहे हैं।  इस जंग में विजय अरब के इस्लामिक देशों की नजर आ रही है।

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