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इस कारोबारी के एक फोन ने जब बचाई अमेरिकी अर्थव्यवस्था, आज भी मशहूर है वो किस्सा

साल 2008 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी से जूझ रही थी. दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में लेहमैन ब्रदर्स, वाचोविया और वॉशिंगटन म्यूचुअल जैसे कई बड़े बैंक फेल हो चुके थे. मंदी से निपटने के लिए अमेरिकी सरकार बेलआउट पैकेज, बैड ऐसट्स की खरीद जैसे कदम उठा रही थी. लेकिन, ये कोशिश नाकाफी थी. इस बीच, बर्कशायर हैथवे के सीईओ वॉरेन बफे ने एक रात अमेरिका के तत्कालीन ट्रैजरी सेक्रेटरी को फोन कर कुछ सुझाव दिए. इस एक फोन कॉल ने अमेरिका के इस आर्थिक संकट का चेहरा ही बदल दिया.

मंदी के उस दौर में अमेरिका अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए तत्कालीन सरकार ने इमरजेंसी इकोनॉमिक स्टैबिलाइजेशन एक्ट या बेलआउट बिल भी पास किया जिसके तहत सरकार ने फेल हो रहे बैंकों के 700 अरब डॉलर से बैड एसेट्स खरीदे थे. लेकिन, निवेशकों को सहारा देने के लिए सिर्फ इतना ही काफी नहीं था. बल्कि समय के साथ स्थिति और खराब हो रही थी. सभी प्राइवेट कंपनियां और सरकारी अधिकारी अमेरिका अर्थव्यवस्था को ठप होने से बचाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कोई भी किसी ऐसे फैसले पर नहीं पहुंच पा रहा था जो अमेरिका को इस संकट से उबार सके.

अमेरिका के आर्थिक संकट पर ‘पैनिक: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ 2008 फाइनेंशियल क्राइसिस’ नाम की एक डॉक्यूमेंट्री भी बनी है. इस डॉक्यूमेंट्री में अमेरिका के तत्कालीन ट्रैजरी सेक्रेटरी हैनरी हैंक पॉल्सन, वॉरेन बफे, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और जॉर्ज बुश के अलावा क्राइसिस से जुड़े अहम सरकारी अधिकारी और प्राइवेट सेक्टर के अधिकारियों का इंटरव्यू लिया गया है. इस डॉक्यूमेंट्री में पॉल्सन बताते हैं कि सभी एक्सपर्ट्स संकट के उबरने के लिए अपने-अपने आइडियाज लेकर आ रहे थे लेकिन कुछ भी काम नहीं आ रहा था लेकिन पॉल्सन को की गई वॉरेन बफे की एक फोन कॉल ने अमेरिका की बहुत बड़ी मदद की.

बफे का प्रस्तावइकोनॉमिक स्टैबिलाइजेशन एक्ट के तहत अमेरिकी सरकार ने फेल हो रहे बैंकों के 700 अरब डॉलर के तनावग्रस्त एसेट्स खरीदे थे. इसी मुद्दे पर वॉरेन बफे ने देर रात को ट्रैजरी सेक्रेटरी हैनरी हैंक पॉल्सन को फोन किया और उन्हें सुझाव दिया कि एसेट्स खरीदने की बजाय यह पैसा उन्हें बैंकों में डालना चाहिए. सिर्फ ये एक सुझाव ही अमेरिकी सरकार ने आगे जो किया उसका आधार बना.

बैंकों की हिचकइसी बारे में बात करने के लिए मॉर्गन स्टैनली के जैक मॉर्गन, जे.पी. मॉर्गन के जेमी डाइमन, गॉल्डमैन सैक के लॉयड ब्लैंकफीन, मैरिल लिंच के जॉन थैन और सिटीग्रुप के विक्रम पंडित जैसे मुख्य बैंकों के सीईओ इक्ट्ठा हुए. उस वक्त सभी बैंकों को मदद की जरूरत नहीं थी जबकि कुछ बैंक पैसा लेने से सिर्फ इसलिए डर रहे थे कि अगर उन्होंने पैसा ले लिया तो इससे निवेशकों को लग सकता है कि उनका बैंक संकट से जूझ रहा है और वो अपना पैसा बाहर निकाल लेंगे. लेकिन पॉल्सन ने समझाने पर वो इस बात के लिए तैयार हो गए जिसके बाद 250 अरब डॉलर अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम में डाले गए.

इस कदम की आलोचनाइस कदम की हर जगह सराहना नहीं. आंंदोलनकारी विरोध जताने के लिए सड़क पर आ गए. उनका मानना था कि सरकार टैक्सपेयर के पैसे से वॉल स्ट्रीट के निवेशकों को बचाने की कोशिश कर रही है जिनके गलत फैसलों से ही आज यह आर्थिक संकट छाया है. फैडरल रिजर्व के चेयरमैन ने कहते हैं कि “मुझे लगता है कि अभी भी बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि हमने कंपनियों को पैसा दिया और वॉल स्ट्रीट की मदद की क्योंकि हम फाइनेंशियल इंडस्ट्री में अपने दोस्तों की मदद करने की कोशिश कर रहे थे और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने में हमारी दिलचस्पी नहीं थी.

फैसले का असरपूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का मानना था कि इस फैसले ने इकोनॉमी को डिप्रेशन से बचा लिया. पॉल्सन के मुताबिक इस फैसले से 2009 में मार्केट में स्थिर रिकवरी देखने को मिली थी. इसलिए वो कहते हैं कि यह कदम एक ऐसा कामयाब प्रोग्राम जिसकी इतिहास में सबसे ज्यादा आलोचना की गई. बुश ने भी स्वीकारा कि यह अब तक का सबसे बड़ा फाइनेंशियल बेलआउट पैकेज था. हालांकि वो इस बात को साबित नहीं कर सकते हैं लेकिन बुश का मानना है कि इस कदम ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को डिप्रेशन से बचा लिया.

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