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इस चीनी लठैत से निपटने का है सिर्फ एक रास्ता, क्या उस पर देश चलेगा ?

भारत और चीन सीमा पर तनाव है। 45 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि चीन के साथ लगी सीमा पर भारतीय जवानों की जानें गई हैं। और ताजा बयानों पर नजर डालें तो साफ दिख रहा है कि हाल के दो इनफॉर्मल समिट के बावजूद दोनों देशों के बीच कुछ भी ठीक नहीं है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया की कुल 35 फ़ीसदी आबादी भारत और चीन में ही है। जहां चीन पूरी दुनिया की फैक्ट्री है और कुल मैन्युफैक्चरिंग का करीब एक तिहाई वहीं होता है, भारत दुनिया का बैक ऑफिस है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों का ग्लोबल ग्रोथ में करीब 45 फ़ीसदी का योगदान है।

इतनी बड़ी आबादी, इतना मजबूत मैन्युफैक्चरिंग बेस, इतना असरदार बैक ऑफिस और दुनिया की ग्रोथ में दोनों देशों का इतना बड़ा योगदान, अगर इस इलाके में युद्ध जैसे हालात बनते हैं तो कोरोना की तरह इसका असर समूची दुनिया पर पड़ना तय है। तो क्या मान लिया जाए कि चीन की हरकतों की वजह से दुनिया एक बड़ी तबाही की तरफ बढ़ रही है?

चीन के राजनीतिक संदर्भ को देखकर तो ऐसा ही लग रहा है। और चीन जो कर रहा है, उसे समझने के लिए आपको अपने इलाके के लठैत की साइकोलॉजी समझनी होगी।

अगर उस लठैत को अचानक से कुबेर का खजाना मिल जाए तो वो क्या करेगा? अपने आपको वह सर्वशक्तिमान समझने लगेगा। आस-पास के लोगों पर धौंस जमाएगा। जिसने जी हुजूरी की, वो तो शागिर्द हो गया, लेकिन जिसने उससे बराबरी करने की कोशिश की तो वो उसको छल-कपट से बस में करने की कोशिश करेगा। चीन भी उसी लठैत मानसिकता का शिकार है।

इसमें कोई शक नहीं है कि चीन ने 1980 के दशक से काफी तेजी से आर्थिक तरक्की की है। इसी दौरान वह पूरी दुनिया की फैक्ट्री बन गया, दुनिया की दूसरी सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था। अलीबाबा, बायडू, टेनसेंट, लेनोवो जैसे ग्लोबल ब्रांड खड़े कर दिए। अमेरिका से सबसे ज्यादा सरकारी बॉन्ड खरीदने वाला यानी उसे कर्ज देने वाला देश बन गया। पूरी दुनिया के खनिज संसाधनों और अन्य कमॉडिटी का बड़ा खरीदार, ऑटो कंपनियों के लिए बड़ा बाजार बन गया और विश्व की दिग्गज कंपनियों के लिए निवेश का पसंदीदा डेस्टिनेशन भी।

भारतीय अर्थव्यवस्था में भी चीन का योगदान काफी बड़ा है-
1. भारत के कुल इंपोर्ट का करीब 18 फ़ीसदी चीन से आता है। ध्यान रहे कि इसमें कच्चा तेल और गोल्ड शामिल नहीं है। इसका मतलब यह है कि गोल्ड और कच्चा तेल को छोड़कर अपनी इंपोर्ट की बाकी जरूरतों का बड़ा हिस्सा हम चीन से ही पूरा करते हैं।

2. भारत में बिकने वाले हर चार में से तीन स्मार्टफोन चीनी कंपनियों के बनाए हुए ही हैं। विवो, एमआई, वनप्लस जैसी कंपनियों ने स्मार्टफोन के हर सेग्मेंट पर कब्जा जमा लिया है और उन्हें कहीं से भी चुनौती मिलती नहीं दिख रही।

3. भारत की दवा बनाने वाली कंपनियों ने पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। लेकिन इन कंपनियों का कच्चा माल चीन से आता है। इस तरह का क़रीब 70 फ़ीसदी कच्चा माल चीन से आता है।

4. आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के लिए सेमी-कंडक्टर की जरूरत होती है। करीब 70 फ़ीसदी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का आयात भी चीन से ही होता है।

5. हमारी ऑटो कंपोनेंट कंपनियां विश्व विजयी हैं, लेकिन उसके लिए भी करीब 20 फ़ीसदी कच्चा माल चीन से ही आता है।

6. कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और स्मार्ट टीवी का करीब आधा इंपोर्ट चीन से ही होता है।

भारत के साथ-साथ दुनिया के दूसरे देशों से चीन का व्यापार उसके लिए अब तक काफी फ़ायदेमंद रहा है। यही वजह कि दुनिया में आर्थिक महाशक्ति के रूप में उसकी पहचान बनी है। चीन का सालाना एक्सपोर्ट करीब 2.5 लाख करोड़ डॉलर का है।

चीन की अर्थनीति और राजनीति बेमेल
दुनिया के इतिहास को देखें तो आर्थिक विकास के साथ-साथ राजनीति में बदलाव होता है। तेजी से आथिक विकास कर रहा देश अपनी सॉफ्ट पावर को विकसित करने पर ध्यान देता है, अपने देश में रहने वालों के वेलफेयर पर ध्यान देता है। लेकिन चीन में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

वहां की राजनीति और अर्थनीति में बड़ा गैप है। जनता का दमन, विरोध को कुचलना, लोगों की जासूसी करना- ये वहां की सरकारी तंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं।

जो देश अपने ही लोगों का दमन करता है, जिसे अपने दूसरे को डराने-धमकाने की आदत हो जाती है, चीन ने इसी में महारत हासिल की है। यही वजह है कि डराना-धमकाना उसकी कूटनीति का हिस्सा है।

ऐसी लठैती का जवाब कैसा होना चाहिए? मेरे खयाल से भारत को अपनी सॉफ्ट पावर से चीन को जवाब देना चाहिए। सबसे पहले जरूरी है कि हमारे जितने भी पड़ोसी हैं, जिनसे हमारा सदियों से शानदार रिश्ता रहा है, उन्हें भरोसे में लिया जाए। नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश हमारे ऐसे पड़ोसी हैं जो हमेशा हमारे साथ रहे हैं। आगे भी रहें, हमें इसके लिए लगातार कोशिश करनी चाहिए।

हमें दुनिया को यह संदेश देना चाहिए कि एक दबंगई करने वाली तानाशाही स्टेट यानी चीन दुनिया के सम्मानित लोकतंत्र में उपद्रव मचाने की कोशिश कर रहा है। पूरी दुनिया का जनमत लोकतंत्र और उसके संस्थाओं का सम्मान करता है। भारत को इसका फायदा मिलेगा।

कोरोना संकट के बाद पूरी दुनिया में चीन अलग-थलग पड़ रहा है। अमेरिका नाराज है, यूरोपियन यूनियन का चीन पर बिल्कुल भरोसा नहीं है, इस्लामिक देशों से चीन की पटती नहीं है। कोरोना के बाद जो पूरी दुनिया में चीन के खिलाफ नाराजगी है, भारत को दूसरे देशों के साथ मिलकर उसको हवा देनी है। ध्यान रहे कि दबंगई करने वाला लट्ठमारी तो कर सकता है, लेकिन सॉफ्ट पावर के सामने असहाय हो जाता है।

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