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एक तीर से दो निशाने साधा तालिबान, भारत से दिखाई वफादारी और आतंक पर नंगा किया पाकिस्तान

पाकिस्तान के पुराने सहयोगी तालिबान ने पाकिस्तान के लिए ही मुसीबत खड़ी कर दी है। तालीबान के पाकिस्तानी धड़े के पूर्व प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान (Ehsanullah Ehsan) ने कहा है कि पाकिस्तानी सरकार ने उसे ऐसे लोगों की एक लिस्ट सौंपी थी जिन्हें पाकिस्तानी सरकार मरवाना चाहती थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एहसान ने खुलासा करते हुए कहा कि “मुझे कहा गया कि आप एक डेथ स्क्वाड को लीड करें… और आप गद्दारों और मुल्क के दुश्मनों के खिलाफ काम शुरू करें। जो लिस्ट मुझे दी गई, उसमें से ज्यादातर लोगों का संबंध खैबर पख्तूनख्वा से था और वो सब पश्तून थे। ये लोग समाज के हर तबके से तालुक रखते थे, जिनमें पश्तून पत्रकारों के नाम भी शामिल थे”।

इस बयान से एक बार फिर से ये स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान सरकार अपने हितों के लिये आतंकी गतिविधियों का सहारा लेती है। इससे पहले जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान अमेरिका के दौरे पर गए थे तो उन्होंने वहाँ पर बयान दिया था कि पाकिस्तान की धरती पर 40000 आतंकी संगठन कार्यरत हैं जिसकी उन्हें जानकारी है। यही नहीं पाकिस्तान पर हमेशा तालिबानी आतंकियों को अपनी जमीन पर पनाह देने के आरोप लगे हैं। तालिबानी समूह पर अमेरिकी सैनिकों की हत्या के भी आरोप हैं, फिर भी पाकिस्तान इस समूह के आतंकियों को पनाह देता है। यही सबसे बड़ा कारण था कि अमेरिका ने आतंक को खत्म करने के लिए पाकिस्तान को दिए जाने वाले फण्ड में भारी कटौती की थी।

हालांकि, यह पहला मौका है जब तालिबान जैसे संगठन ने खुलकर अपने पाकिस्तान के अधिकारियों के साथ संपर्क होने की बात कही है। तालिबान एक कुख्यात आतंकी संगठन है जो लंबे समय तक अमेरिका के नेतृत्व वाली सेना से अफगानिस्तान में संघर्षरत था। वैसे तो पाकिस्तान पर FATF की तलवार लटकती ही रहती है, ऐसे में तालिबान का यह बयान पाकिस्तान को मुसीबत में डाल सकता है।

तालिबान की ओर से यह बयान आना आश्चर्यजनक तो है पर, वास्तव में यह तालिबान की रणनीति का हिस्सा है। वास्तव में तालिबान पाकिस्तान से दूरी बनाकर भारत जाने की कोशिश कर रहा. जबकि भारत तालिबान द्वारा किसी भी तरह के शांति स्थापित करने की प्रक्रिया पर भरोसा नहीं करता। वर्षों के संघर्ष के बाद अब जाकर अफगानिस्तान में कोई शांति समझौता हुआ है। अमेरिका की सेना भी अब वहां से वापसी कर रही है। ऐसे में तालिबान को यदि लंबे समय तक शांति चाहिए तो इसके लिए आवश्यक है कि वो अपनी छवि को सुधारे। इस काम में भारत ही उसकी मदद कर सकता है, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, भारत तालिबान को वैधानिक सत्ता मान लेगा तो यह तालिबान की कूटनीतिक जीत होगी।

भारत ने अब तक हुए सभी शांति वार्ताओं में तालिबान को कोई वैधानिक पक्ष नहीं माना है क्योंकि भारत की नीति है कि किसी भी आतंकी संगठन से वह बातचीत नहीं करेगा। यही कारण था कि भारत इस पूरे शांति समझौते का हिस्सा नहीं बना, बावजूद इसके भारत को इस वार्ता में अनाधिकार रूप से ही लेकिन हिस्सा बनाया गया।

यही नहीं भारत ने अफगानिस्तान में बड़ी मात्रा में निवेश किया है और भारत के अफगानिस्तान की सरकार के साथ संबंध भी बहुत अच्छे हैं। ऐसे में तालिबान की नीति है कि क्षेत्र की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति को अपनी ओर मिलाया जाए।

यही कारण था कि जब भारत ने धारा 370 को हटाया तो पाकिस्तान द्वारा बार बार भड़काने पर भी तालिबान ने इसे भारत का आंतरिक मामला करार दिया था। यही नहीं उसने पाकिस्तान को कहा था कि अफगानिस्तान और कश्मीर अलग मुद्दे हैं, 370 का हटना शांति समझौते को प्रभावित नहीं करेगा। इसी वर्ष मई महीने में तालिबान ने बयान दिया था कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है।

तालिबान भले आतंकी संगठन है लेकिन उसका उद्देश्य शुरू से वैश्विक स्तर पर इस्लाम की लड़ाई लड़ने का नहीं रहा है, बल्कि उसका इरादा अफगानिस्तान की राजनीति को अपने अनुसार चलाने का ही रहा है। इसलिए तालिबान वो हर कोशिश कर रहा है जो भारत को उसकी ओर कर सके, भले इसके लिए उसे पाकिस्तान से दोस्ती खत्म करनी पड़े।

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