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कैबिनेट की सहमति के बिना आगे बढ़ी मोदी सरकार, इजराइल से खरीदे जाएंगे AWACS रडार

ऐसी ख़बर है भारत सरकार ने इजराइल से दो AWACS (Airborne Warning And Surveillance System) रडार खरीदने को अंतिम मंजूरी दे दी है, हालांकि इसकी खानापूर्ति के लिए अभी कैबिनेट की मीटिंग होनी बाकी है। भारतीय मीडिया और भारत सरकार इसे चीन के साथ भारी तनाव के मद्देनजर पेश करने की कोशिश कर रही है। भारत सरकार और भारत की मीडिया भारत की जनता को यह जताने की कोशिश कर रही है कि हम चीन के सामने स्ट्रांग है और युद्धक तैयारियों में लगे हुए हैं जबकि सच यह है कि इस सौदे की बुनियाद मार्च 2004 में तब रखी गई थी जब भारत इजराइल और रूस तीनों के बीच 350 मिलियन डॉलर का रक्षा सौदा हुआ था।

इस डील के तहत इजराइल हमें उत्तम तकनीक वाला फाल्कन रडार देगा और उस भारी-भरकम रडार को कैरी करने के लिए रशिया हमें il-76 विमान देगा। इनकी आपूर्ति 2009 तक होनी थी जो कि शायद समय पर हो भी गई क्योंकि वर्तमान में हमारे पास इज़राइल निर्मित तीन फाल्कन एवॉक्स रडार है जो रसिया निर्मित il-76 पर तैनात हैं। इनके अतिरिक्त डीआरडीओ निर्मित नेत्रा नामक दो स्वदेशी रडार भी एयरफोर्स के लिए काम कर रहे हैं।

जिन दो राडारों की खरीद का जश्न भारतीय मीडिया और भारत सरकार आज मना रही है इनकी खरीद के लिए भी भारतीय रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 8365 करोड़ रुपए 2015 में ही मंजूर कर लिया था। अबतक इनकी आपूर्ति हो जानी चाहिए थी।

कई महीने पहले चीनी सैनिकों ने गलवान घाटी पर कब्ज़ा किया था तब से वह वहीं पर बरक़रार है, पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, भारत सरकार किसी भी तरह की बातचीत से चीन को मनाने या सैन्य कार्रवाई दाउरा चीन को पीछे धकेलने में नाकाम रही है। अपनी इसी नाकामी को छुपाने के लिए, घरेलू मोर्चे पर भी डूब चुकी अर्थव्यवस्था, ख़त्म हो चुके रोज़गार, बेकाबू हो चुके कोरोना और कुछ राज्यों के सर पर आ चुके चुनाव में जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस तरह का जश्न मना रही है। इस प्रोपेगेंडा में भारतीय मीडिया पूरी तरह भारत सरकार के साथ काम कर रही है।

रफाल विमानों की आमद हो या फाल्कन रडार की ख़रीदारी हो इनका जश्न भारत में जिस तरह से मनाया जा रहा है यह बिल्कुल नए गांव ऊंट आने की कहावत को चरितार्थ करता है । वरना आप बताइए जब इसके पहले तीन अन्य रडार भारत ने खरीदे थे, भारत पहुंचे थे, हमारी एयरफोर्स में शामिल किए गए थे क्या तब भी आपको इनके बारे में मीडिया ने बताया था ? क्या तब भी किसी सरकार ने छाती फुलाया था, अपनी पीठ थपथपाई थी …शायद नहीं क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा है।

पर मीडिया और सरकार आपको आधी बात ही बता रही है क्योंकि इस खरीद का या रफाल विमानों के भारत पहुंच जाने का चीन के साथ जारी मौजूदा तनाव से कोई संबंध नहीं है । क्योंकि भारत पहुंच चुके रफाल विमान किसी भी मिशन में शामिल होने के लिए कम से कम अभी 1 साल और लेगा। उसी तरह यदि इजराइल के साथ फाल्कन रडार की फाइनल डील आज ही हो जाए तब भी उन्हें भारत पहुंचने में कम से कम 2 साल लगेंगे। अर्थात चीन के साथ मौजूदा तनाव में इनकी कोई उपयोगिता नहीं होगी।

यदि साल डेढ़ साल में भारत किसी युद्ध में उतरता है तो आने वाले दोनों फाल्कन रडार आ चुके रफाल भारत के किसी काम नहीं आएंगे न ही उनके होने या न होने का डेढ़ दो सालों तक किसी दुश्मन पर कोई फर्क पड़ेगा क्योंकि इन बातों को वह भी अच्छी तरह जानते हैं। पर इन बातों से भारत की राजनीति को साधा जा सकता है, मूर्खों को और मूर्ख बनाया जा सकता है,अपनी पीठ को थपथपाया जा सकता है सरकार और सरकार की पिट्ठू मीडिया यही कार्य बखूबी कर रही है।

जिन रडारों की खरीद का जश्न भारतीय मीडिया मना रही है उस तकनीक में भारतीय सेना बहुत पीछे है क्योंकि भारत के प्रतिद्वंदी चीन के पास ऐसे 30 से अधिक रडार है जो उनके विमानों पर तैनात हैं ।पाकिस्तान हमसे बहुत ही छोटा है पर उसके पास भी 8 से अधिक अवॉक्स कैटेगरी के रडार हैं जो पहले से ही पाकिस्तान एयर फोर्स में शामिल है कार्य कर रहे हैं । इसके विपरीत हम सिर्फ 2 रनों की खरीद पर जश्न मना रहे हैं। पुलवामा अटैक के बाद जब दोनों देशों के बीच एयर स्ट्राइक हुई थी तब पाकिस्तान ने इस तरह के सारे सिस्टम को ऑन कर दिया था तब भारत को इसकी कमी का एहसास शिद्दत से हुआ था।

आइए समझते हैं यह रडार सिस्टम है क्या, यह काम कैसे करता है। इसी तरह के रडार सिस्टम से लैस अमेरिकी टोही विमान को हाक आई के नाम से जाना जाता है । हाक आई का उपयोग अमेरिका की नेवी और एयरफोर्स दोनों करती हैं। अवॉक्स सिस्टम से लैस विमान आकार में बहुत भारी भरकम होते हैं ऐसे में औसत दर्जे के भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर उनके लिए उपयुक्त नहीं हैं इसलिए भारत में इसका इस्तेमाल सिर्फ एयर फोर्स के एयरवेस द्वारा किया जाता है। इज़राइल में इसे आईज इन स्काई के नाम से जाना जाता है।

Awacs को AWE&C (Airborne Early Warning And Control) के नाम से भी जाना जाता है। यह सिस्टम खास तरह के बने विमान पर फिट करके दूर-दूर तक निगरानी करने के काम आता है । ग्राउंड बेस्ड राडार एक ही जगह पर फिक्स रहते हैं, यह राडार एक निश्चित दूरी तक ही देख सकता है, ग्राउंड बेस्ड रडार पहाड़ की ओट में क्या है यह नहीं देख पाते या उनकी रेंज के बाहर क्या हो रहा है इसे पता नहीं लगा पाते जबकि इस सिस्टम से आप जहां चाहे वहां प्लेन को भेजकर जानकारी इकट्ठी कर सकते हैं।

मान लीजिए आपके बेस पर लगा रडार 500 किलोमीटर तक निगरानी करता है आपको 1000 किलोमीटर तक की निगरानी करनी है तो आप अपने एयरवेस से अवॉक्स लगे विमान को 500 किलोमीटर भेजिए और 1000 किलोमीटर तक अपनी निगरानी का दायरा बढ़ा लीजिए। उदाहरण के तौर पर मुंबई में तैनात आपका ग्राउंड बेस्ड साधारण रडार यदि डेढ़ सौ किलोमीटर पुणे तक देख पाता है तो आप मुंबई से उड़ान भरिए है पुणे जाइए और फिर पुणे से कोल्हापुर तक की निगरानी कर लीजिए।

एवॉक्स आधुनिक निगरानी प्रणाली है यह टीआर मॉड्यूल से लैस है यह एल बैंड पर काम करता है। इसके विपरीत साधारण टोही विमान जैसे कि हमारा डीआरडीओ द्वारा निर्मित नेत्र रडार सिस्टम सी बैंड पर काम करता है जो कि बहुत ही चीप है इसकी रेंज बहुत ही कम है। 90 के दशक के पहले लगे टोही विमानों में राडार चारों दिशाओं में घूमते रहते थे पर उनसे दुर्घटना की संभावनाएं अधिक होती थी उसके बाद TR मॉड्यूल सिस्टम को डेवलप किया गया। TR मॉड्यूल मधुमक्खी के छत्ते में बने छोटे-छोटे क्षेत्र के समान होते हैं जो सभी दिशाओं में रेडियो तरंगे भेजते हैं और जैसे ही किसी चीज से टकराते हैं उसे वेरीफाई करते हैं।

यह अपनी रेंज में आने वाले फाइटर प्लेन, मिसाइल, ड्रोन आदि सभी का सफलतापूर्वक पता लगा लेते हैं और अपने सहयोगी फाइटर प्लेन तथा कंट्रोल रूम को जानकारी दे देते हैं। एवॉक्स सिस्टम सेटेलाइट से भी जानकारियां जुटा लेता है। इस सिस्टम का फायदा यह है कि दुश्मन की तरफ से आने वाली किसी भी मिसाइल ड्रोन और प्लेन का पता आधे से कम समय में चल जाता है जिसके कारण जवाबी कार्रवाई के लिए अधिक समय मिल जाता है।

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