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कैबिनेट मीटिंग के बीच में अचानक उठे योगी और चले गए बाहर, दिल जीत लेगा कारण !

सीएम योगी नियम और कानून की मर्यादा का पालने करने के साथ ही अनुशासन को लेकर गंभीर माने जाते हैं. सीएम योगी कई मौकों पर ये साफ कर चुके हैं कि प्रदेश के अंदर जिसने भी कानून तोड़ने की कोशिश की तो उसे उसका अंजाम भारी भुगतना पड़ेगा. इसलिए खुद भी वो हर नियम का अच्छी तरह से पालन करते हैं. नियम और अनुशासन के साथ नैतिकता को लेकर सीएम योगी कितने संवेदनशील है उन्होंने एक बार फिर से ऐसा ही उदाहरण पेश किया है.

दरअसल कैबिनेट की बैठक की अध्यक्षता कर फैसलों पर मुहर लगाते चले जा रहे सीएम योगी के सामने जैसे ही गोरक्षनाथ चिकित्सालय से संबंधित प्रस्ताव आया तो वो गोरक्ष मठ के प्रमुख होने के नाते बैठक छोड़कर चले गए और प्रस्ताव के फैसले में शामिल ही नहीं हुए.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई कैबिनेट की बैठक में रखे गए पंद्रह प्रस्तावों में गोरखपुर में गुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय संचालित करने वाली संस्था की ओर से जिले के सोनबरसा गांव में विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए जमीन की अदला-बदली का भी प्रस्ताव था. प्रस्ताव के मुताबिक, गोरक्षनाथ चिकित्सालय का संचालन करने वाली संस्था ने विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए गोरखपुर की सदर तहसील के सोनबरसा गांव में जमीन खरीदी थी.

विश्वविद्यालय के लिए खरीदी गई जमीन के बीच में ग्राम समाज की आरक्षित श्रेणी की 0.537 हेक्टेयर भूमि भी है. उत्तर प्रस्ताव राजस्व संहिता अधिनियम, 2020 के प्राविधानों के मुताबिक संस्था ने लोक उपयोगिता की इस भूमि का अन्यत्र स्थित अपनी 0.599 हेक्टेयर जमीन से उसी प्रयोजन के लिए अदला बदली करने का प्रस्ताव दिया था. साथ ही, लोक उपयोगिता की भूमि के श्रेणी परिवर्तन के लिए नियमानुसार डीएम सर्किल रेट का 25 फीसद शुल्क लगभग 11 लाख 50 हजार लाख रुपये जमा करने का भी प्रस्ताव दिया था.

लेकिन जैसे ही ये प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष चर्चा के लिए रखा गया, वैसे ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैबिनेट की बैठक छोड़कर चल दिए. चूंकि सीएम योगी स्वयं गोरक्ष पीठाधीश्वर हैं, इसलिए नैतिकता के आधार पर उन्होंने इससे संबंधित फैसले में शामिल होना उचित नहीं समझा. जिसके बाद उनकी अनुपस्थिति में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की और प्रस्ताव को स्वीकृति दी.

जानकारों का मानना है कि कानूनी रूप से भी सीएम योगी का फैसला उचित था, क्योंकि मठ प्रमुख होने के नाते वो लाभार्थी की श्रेणी में आते हैं. इसलिए उन्होंने तमाम कानून और नियमों की मर्यादा का पालन करके हुए बीच बैठक से ही चले जाना उचित समझा.

बता दें कि इससे पहले जब सीएम अपने आवास पर टीम 11 के साथ बैठक कर रहे थे. तब उन्हें पिता के निधन की सूचना मिली जिसके बाद उनकी आंखें नम तो हो गईं लेकिन अफसरों के सामने बिना विचलित हुए वो करीब आधे घंटे तक बैठक करते रहे और अफसरों को जरूरी निर्देश दिए. बैठक के बाद भी उन्होंने इतने बड़े दुख को अपने कर्तव्य पर हावी नहीं होने दिया और कुछ अफसरों के साथ बातचीत कर जरूरी दिशा-निर्देश दिए. यहां तक कि अपने पिता की मृत्यु पर अंत्येष्टि में न जाकर सीएम योगी कोरोना वायरस संक्रमण से प्रदेशवासियों को बचाने की मुहिम में जुटे रहे और कर्मयोगी के रूप में हर किसी की जुबान पर बने रहे. इससे साफ है कि सीएम योगी अपने कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी भेदभाव और नियम कानूनों के साथ अनुशासन की मर्यादा में रहकर करते हैं.

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