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कोरोना को खत्म दिखाने की क्यों इतनी जल्दी, सरकार क्यों कर रही हड़बड़ी?

केंद्र सरकार किसी तरह से यह दिखाने की बेचैनी में है कि कोरोना वायरस अब खत्म होने वाला या खत्म हो गया, लोगों को इससे डरने की जरूरत नहीं है। यह बिल्कुल 360 डिग्री का टर्न कह सकते हैं। मार्च के पहले हफ्ते में जब भारत में गिने-चुने केसेज थे तब प्रधानमंत्री ने होली नहीं खेलने का ऐलान किया था और उसी समय इस वायरस को लेकर पैनिक बनना शुरू हो गया था। लोग खौफ में आ गए थे। रही सही कसर मार्च के आखिरी हफ्ते में कंपलीट लॉकडाउन के जरिए पूरी कर दी गई। खौफ पैदा करने से लेकर खौफ खत्म करने तक का पांच महीने का सफर आसान नहीं रहा पर हकीकत यह है कि अभी खौफ खत्म करने का समय नहीं आया है और न कोरोना खत्म हुआ है।

सरकार के अपने हित हैं, जिसकी वजह से वह कोरोना को खत्म बताने की बेचैनी में है। अगर वह बेचैनी में नहीं होती तो मेडिकल और इंजीनियरिंग की परीक्षा कराने को लेकर इतना उतावलपन नहीं दिखता। देश-दुनिया के सारे जानकार इसका विरोध कर रहे हैं। कई राज्य सरकारें इसका विरोध कर रही हैं। परीक्षा में शामिल होने वाले बच्चों के अभिभावक इसका विरोध कर रहे हैं।

देश की मुख्य विपक्षी पार्टी ने भी कहा कि बच्चों का जीवन खतरे में डाल कर परीक्षा कराना उचित नहीं है पर सरकार अड़ी रही। पहले तो सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार की बात मानते हुए परीक्षा की इजाजत दे दी, जिसके बाद परीक्षा कराने के तरीकों को लेकर दिशा-निर्देश जारी हुए। बच्चों का और साथ साथ परीक्षा कराने वाले हजारों कर्मचारियों का जीवन खतरे में डालने का एकमात्र मकसद यह मैसेज देना है कि देश में सब कुछ ठीक हो गया है और कोरोना का संकट खत्म हो गया है। अगर यह परीक्षा हुई तो तय मानें कि जल्दी ही स्कूल, कॉलेज और कोचिंग आदि खोलने का भी फैसला होगा। शिक्षा की एक बड़ी लॉबी का दबाव सरकार के ऊपर है कि वह शिक्षण संस्थाएं खुलवाए बाकी पढ़ाई और परीक्षा कैसे होनी है वह शिक्षण संस्थान संभाल लेंगे।

कोरोना वायरस को खत्म बताने की बेचैनी में ही सरकार चुनाव कराने की तैयारी भी कर रही है। हालांकि उसमें भाजपा के अपने हित भी जुड़े हैं। अगर चुनाव नहीं होते हैं तो मध्य प्रदेश में नया संकट खड़ा हो सकता है। राज्य में 14 मंत्री ऐसे हैं, जो अभी विधायक नहीं हैं। तभी राज्य में 27 सीटों पर उपचुनाव कराने की जरूरत है। अगर मध्य प्रदेश में चुनाव कराते हैं तो बिहार विधानसभा के चुनाव भी समय पर कराने होंगे। सो, दोनों चुनाव की तैयारी चल रही है। इसका भले राजनीतिक फायदा भाजपा को मिले पर एक मकसद यह दिखाना भी है कि कोरोना के बीच जनजीवन सामान्य हो गया है।

कोरोना के साथ सहजीवन संभव होने की बात को प्रमाणित करने के लिए ही अनलॉक के चौथे चरण में कई चीजें खोलने की तैयारी हो रही है। बताया जा रहा है कि दिल्ली सहित देश के कई शहरों में एक सितंबर से मेट्रो की सेवा शुरू हो जाएगी। इसके अलावा सिनेमा हॉल खोलने की भी तैयारी हो रही है। कहा जा रहा है कि आधी क्षमता के साथ सिनेमा हॉल खोले जा सकते हैं।  अनलॉक के तीसरे चरण में ही दिल्ली में होटल खोलने का फैसला हुआ है। सोचें, एक तरफ कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा है और दूसरी ओर सरकार सब कुछ सामान्य दिखाने के लिए ऐसे फैसले कर रही है, जिससे बच्चों का जीवन खतरे में आ सकता है और दूसरे नागरिक भी कोरोना का शिकार हो सकते हैं।

क्या सरकार को कोरोना का सच नहीं दिखाई दे रहा है, जो वह इस तरह के फैसले कर रही है? सरकार को सच दिख रहा है पर वह आधा सच दिखा रही है और आधा छिपा रही है। वह ये तो बता रही है कि भारत में मरीजों के ठीक होने की दर यानी रिकवरी रेट कितनी कम हो गई, लोगों के मरने की दर कितनी घट गई, अब ऑक्सीजन या वेंटिलेटर सपोर्ट पर कितने कम लोग हैं आदि आदि। पर यह हकीकत नहीं बता रही है कि कोरोना का संक्रमण अब दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में पहुंच गया है, जहां इलाज की सुविधा नहीं है और न जांच की सुविधा है। बड़े शहरों में भी जिस रफ्तार से कोरोना का संक्रमण बढ़ रहा है, अगर थोड़े दिन तक यहीं रफ्तार रही तो उसे रोकना मुश्किल होगा।
भारत में कोरोना वायरस के केसेज 33 लाख पहुंचने वाले हैं।

संक्रमितों की संख्या के लिहाज से भारत अभी तीसरे स्थान पर है पर अगले महीने के पहले हफ्ते में ही भारत दूसरे स्थान पर पहुंच सकता है। फिलहाल ब्राजील दूसरे स्थान पर है और भारत और उसके बीच सिर्फ चार लाख संक्रमितों की अंतर है। वहां औसतन 30 हजार तक केसेज रोज आ रहे हैं, जबकि भारत में उससे दोगुने केस रोज आ रहे हैं।

एक्टिव केसेज के मामले में भी ब्राजील में भारत से सिर्फ दो हजार केस ज्यादा हैं। भारत में पिछले तीन हफ्ते से लगातार 60 हजार से ज्यादा केसेज आ रहे हैं और नए केसेज की संख्या के मामले में भारत कई हफ्ते से दुनिया में नंबर एक है। इस लिहाज से हैरानी नहीं होगी अगर सर्दियां आते आते भारत नंबर एक हो जाए। हालांकि नंबर एक देश अमेरिका संक्रमितों की संख्या में भारत से बहुत आगे है। गंभीर केसेज की संख्या के मामले में भारत लगातार दूसरे स्थान पर बना हुआ है। और ऐसा तब है, जब भारत ने दस लाख की आबादी पर सिर्फ 27 हजार लोगों के टेस्ट किए हैं। ब्राजील ने दस लाख की आबादी पर 66 हजार और अमेरिका ने दो लाख 35 हजार टेस्ट किए हैं।

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