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क्‍या कमजोर पड़ रहा है किसान आंदोलन? गाजीपुर बॉर्डर पर मंच और सड़क पर पसरा सन्नाटा

नए कृषि कानूनों को लेकर कुछ किसान संगठन दिल्ली की सीमा पर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. किसान इन कानूनों को खत्म कराने पर अड़े हैं, वहीं मोदी सरकार का साफ कहना है कि अगर आपको कानूनों में खामियां नजर आ रही हैं और किसान विरोधी समझ में आ रहा है तो उस चर्चा करो. उस क्लाज को संशोधित कर दिया जाएगा. लेकिन किसान संगठन हैं कि मानने को तैयार नहीं. लोगों का तो कहना है कि ये आंदोलन कृषि कानूनों को हटाने के लिए कम और मोदी सरकार को हटाने के लिए ज्यादा लग रहा है. अब खबर आई है कि गाजीपुर में किसान आंदोलन कमजोर पड़ गया है, यहां पर मंच और सड़क पर सन्नाटा पसरा है. कहा जा रहा है कि धरने पर बैठे किसानों को पता चल गया है कि इस आंदोलन का किसानों की समस्यों से लेना-देना कतई नहीं है. ये तो सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार को अस्थिर करने की कोशिश है.

गाजपुर बॉर्डर पर किसानों की संख्‍या न के बराबर दिखाई दे रही है. मंच खाली पड़े हैं और सड़कों पर किसान भी नदारद दिखे. बता दें कि किसान नेता राकेश टिकैत ने गाजीपुर बॉर्डर से ही लोगों से किसान आंदोलन में ज्‍यादा से ज्‍यादा संख्‍या में शामिल होने की बात कही थी. लेकिन अब किसानों का अपने नेताओं से मोहभंग हो चुका है उन्हें लग रहा है कि उसके मंच का एक एजेंडे के तहत इस्तेमाल किया जा रहा है.

पिछले कई दिनों से इस बात को लेकर चर्चा जोरों पर थी कि किसान आंदोलन के अंदर अब फूट पड़ चुकी है. किसान संगठन से जुड़े नेता भले ही किसान आंदोलन के आगे की रणनीति बनाने की बात कर रहे हैं लेकिन अंदर खाने हकीकत कुछ और ही है. सोमवार को गाजीपुर बॉर्डर का नजारा देखने के बाद इस आंदोलन के कमजोर होने की बात साफ होती दिखाई दे रही है. गाजीपुर बॉर्डर पर आज सुबह से ही किसानों की संख्‍या न के बराबर हो गई है. आंदोलन में शामिल होने पहुंचे किसानों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए तैयार किया गया किसान मंच पूरी तरह से खाली पड़ा है.

मंच के साथ ही सड़क पर भी किसानों की संख्‍या न के बराबर दिखाई दे रही है. किसान आंदोलन के नाम पर अब केवल सड़क बंद है. टेंट और लंगर सेवा के पास भी इक्का दुक्का लोग ही दिखाई पड़ रहे हैं.

कहा जा रहा है कि किसान नेता राकेश टिकैत को पता चल चुका है कि उनके घड़ियाली आंसू अब यहां किसानों को ज्यादा दिन नहीं टिका पाएंगे. इसलिए वे खुद गाजीपुर धरना स्थल से नदारत रहते हैं और किसान नेता से राजनेता बनने के लिए अब जगह-जगह जाकर महापंचायत कर रहे हैं. जानकारों का मानना है कि जनता को भी पता चल चुका है कि राकेश टिकैत का असली मकसद क्या है. लिहाजा अब उन्हें राजनीति में कुछ खास हासिल होने वाला नहीं. लोग तो यहां तक कहते हैं कि वो दिन दूर नहीं जब राकेश टिकैत की हालत धोबी के कुत्ते जैसी हो जाएगी.

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