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आज खाली है देश का खजाना, बेची जा रहीं सरकारी कंपनियां, क्या इसके भी जिम्मेदार हैं नेहरू ?

कम से कम 45 साल की चरम बेरोजगारी और माइनस 24 पर पहुंची अर्थव्यवस्था के लिए तो नेहरू जिम्मेदार नहीं हैं. क्या इस तबाही की जिम्मेदारी लेने की कूवत आज किसी नेता में है?

कोई पार्टी 50 साल तक सत्ता में थी, इस बात पर ईष्या में दुबले होने की जगह ये सोचना चाहिए कि आज हम क्या कर रहे हैं. जो आज सत्ता में है, वह क्या कर रहा है?

आज जो लोग बार बार 50 साल का सवाल उठाते हैं, वे तब विकल्प क्यों नहीं दे पाए? क्योंकि तब वे महात्मा गांधी की हत्या की शर्मिंदगी से जूझ रहे थे. क्योंकि दशकों तक इसी देश की जनता ने उन्हें अछूत जैसा समझा.

ऐसा समझने की वजह साफ थी. सरदार पटेल ने स्पष्ट कर दिया था कि आपका हाथ भले न हो, लेकिन आपने ही वह जहरीला माहौल बनाया जिसमें बापू की हत्या संभव हो सकी.

इतिहास जैसा था, वह गुजर चुका है. अब हम उसे बदल नहीं सकते, लेकिन भविष्य सुधार सकते हैं और ये तय है कि किसान और मजदूर विरोधी कानून बनाने से भविष्य सुधरने की जगह चौपट होगा.

ये समय नेहरू से हिसाब लेने का नहीं है. ये समय है आज की परेशानी पर बात करने का. बात इस पर होनी चाहिए कि बेरोजगारी 45 साल के चरम पर क्यों है?

अर्थव्यवस्था की ऐसी ऐतिहासिक दुर्गति क्यों है? एक समृद्ध देश का खजाना खाली क्यों होता जा रहा है? एक एक करके सरकारी कंपनियां क्यों बेची जा रही हैं?

किसानों और मजदूरों के खिलाफ और कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाने वाला कानून क्यों बनाया जा रहा है? कम से कम आज की पीढ़ी जो झेल रही है, वह नेहरू का किया धरा नहीं है.

(यह लेख पत्रकार कृष्णकांत की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. ये लेखक के निजी विचार हैं)

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