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गलवान-पुलवामा पर लगातार बोलते PM मोदी क्यों नहीं लेते उन पड़ोसियों का नाम, जिनके कारण शहीद हुए दर्जनों जवान?

इस बार के बिहार चुनाव ने केवल राज्य स्तर पर ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा नेता दिया है, जो कम से कम अभी तक शिष्टता से अपने मुद्दों पर टिका रहता है। आज की राजनीति में जब मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की जाती, केवल एक-दूसरे की टांग खीचना और विपक्ष पर उलुल-जुलूल आरोप मढ़े जाते हैं, ऐसे में तेजस्वी यादव का मुद्दे पर टिके रहता एक कौतूहल का विषय है।

तेजस्वी ने बड़ी शिष्ट से और कम शब्दों में आक्षेपों का जवाब देना भी सीख लिया है। नीतीश बाबू जब खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे की तर्ज पर लालू जी के परिवार पर अनर्गल आरोप मढ़ रहे थे, तब तेजस्वी ने कहा था, उनके हर अपशब्द मेरे लिए आशीर्वचन हैं। प्रधानमंत्री जी तो किसी चुनाव में जनता से जुड़े किसी मुद्दे की आशा करना व्यर्थ है, उनके भाषण तो बस विपक्ष पर बेसिर—पैर के भद्दे आरोपों तक ही सीमित रहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जब अपने भाषण में तेजस्वी को जंगल राज का युवराज करार दिया तब तेजस्वी ने सटीक जवाब दिया, वो तो प्रधानमंत्री हैं, कुछ भी बोल सकते हैं।

प्रधानमंत्री पर ऐसा विनोदात्मक प्रहार शायद ही किसी ने किया हो। सब समझते हैं कि प्रधानमंत्री मुद्दे पर नहीं बल्कि कुछ पर ही बोलते हैं, पर इसे शब्दों में तेजस्वी ने आसानी से ढाल दिया। प्रधानमंत्री जी गलवान वैली और पुलवामा का मुद्दा लगातार उठाते हैं। पर आश्चर्य यह है कि इन दोनों जगहों पर जिन पड़ोसी देशों के कारण वीर जवानों की मौतें हुईं, उन देशों का नाम तक नहीं लेते।

दूसरी तरफ इन दोनों मामलों में विपक्ष पर कुछ इस तरह से लगातार प्रहार कर रहे हैं मानो विपक्षी नेता इन देशों से बिरयानी खाकर आ रहे हों या फिर इनके राष्ट्रपति के साथ झूले पर पींगें मार रहे हों। प्रधानमंत्री कुछ इस तरह से बोलते हैं मानो उन वीर जवानों ने मातृभूमि की सेवा करने के लिए शहादत नहीं दी, बल्कि इस सरकार को महान बनाने के लिए शहादत दी हो।

प्रधानमंत्री के कुछ भी बोलने का इससे अच्छा उदाहरण कोई हो ही नहीं सकता है, जिसमें देश की हरेक समस्या से पल्ला झाड़कर केवल विपक्ष पर फूहड़ आरोप लगा रहे हों। प्रधानमंत्री जी लगातार बता रहे हैं कि हमें पहले से पता था कि क्या होने वाला है, पर विपक्ष उन देशों का साथ दे रहा है।

प्रधानमंत्री जी, जब आपको, सरकार को और सेना के खुफिया तंत्र को सबकुछ पता था, फिर भी ऐसी घटनाएं होती हैं, और आश्चर्य यह है कि किसी को अपनी नाकामी महसूस नहीं होती और देश का सामना करते हुए शर्म भी नहीं आती। इतना तो तय है कि 2014 के बाद से देश में जो कुछ हो रहा है उसमें किसी के लिए भी सरकार जिम्मेदार नहीं है।

एक के बाद एक तमाशा होता रहता है, सरकार विपक्ष पर चुटकियाँ लेती है और फिर अगले तमाशे की तरफ बढ़ जाती है। हरेक चुनाव के समय कितने आतंकवादी किस नाम से कहाँ से आयेंगे, सबकी जानकारी बीजेपी के हरेक छोटे-बड़े नेता को होती है। पर, सरकार कहती है कि उसे पुलवामा हमले से पहले खुफिया जानकारी थी, पाकिस्तान की संसद में मंत्री भी यही बता रहे हैं, पर आश्चर्य यह है कि पड़ोसी देश जो करना चाहता था वह सफलतापूर्वक कर गया और हमारी सरकार सब कुछ जानने के बाद भे कुछ नहीं कर सकी।

दूसरी तरफ गलवान वैली में जितने सैनिकों की शहादत हुई, प्रधानमंत्री जी के अनुसार तो सैनिक अपने आप शहीद हो गए क्योंकि वहां तो किसी तरह की घुसपैठ हुई ही नहीं थी, और भारतीय सैनिक सीमा लांघते नहीं हैं।

पिछले बिहार चुनावों में लालू और नीतीश की जोड़ी जंगल राज थी, इस बार केवल लालू का जंगल राज रह गया है। प्रधानमंत्री जी जिसे मुख्यमंत्री चेहरा बता रहे हैं, वही पिछले 15 वर्षों से मुख्यमंत्री बने हुए हैं, पर अब जंगल राज उस पंद्रह वर्ष से भी पहले का बता रहे हैं। फिर वे उस मुख्यमंत्री पर क्यों दावं लगा रहे हैं, जो 15 साल के तथाकथित जंगल राज के असर से अगले 15 वर्षों में भी बाहर नहीं कर पाया। प्रधानमंत्री जी मुंगेर में जो कुछ भी हुआ, वह क्या आपके शब्दों में जंगल राज नहीं है, या फिर उत्तर प्रदेश में लगातार हो रहा है, वह क्या रामराज्य है?

वैसे भी प्रधानमंत्री जैसे पद पर और हिन्दू धर्म का ज्ञाता होने का दावा करने वाले किसी को भी केवल किसी को कोसने के लिए जंगलों को बदनाम नहीं करना चाहिए। पर, आज जंगलों को केवल पूंजीपतियों के हवाले करने वाली सरकार से जंगलों के बारे में ऐसी ही धारणा सुनने को मिल सकती है।

प्राचीन ग्रंथों में भी तरह-तरह के अरण्यों का बड़े सम्मान के साथ वर्णन किया जाता है। राम को सम्मान देने वाले रावण के वध से खुश होते हैं, रावण की लंका जंगल नहीं थी। कौरवों का शासन पूरी तरह से कुशासन माना जाता है, जिसके विरुद्ध कृष्ण भी खड़े थे, पर कौरव किसी जंगलराज में नहीं थे। कंस किसी जंगल का राजा नहीं था।

आधुनिक दौर में भी अमेरिका, ब्राज़ील और रूस कोई जंगल नहीं हैं। जंगल तो उत्तर प्रदेश भी नहीं है। प्रधानमंत्री जी कम से कम जंगल को तो बदनाम मत कीजिये, क्योंकि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर आप हमेशा देश में जंगल का क्षेत्र बढ़ने की बातें करते हैं, नए क्षेत्र में जंगल लगाने की बातें करते हैं। जलवायु परिवर्तन, तापमान वृद्धि और पर्यावरण विनाश से यही जंगल बचा सकते हैं, जिनके राज पर आप आक्षेप लगा रहे हैं।

जंगल में रहने वाले कबीलों का भी एक क़ानून होता है, जिसका सारे लोग पालन करते हैं। जंगलों के जानवरों का भी क़ानून होता है, बिना भूख लगे कोई किसी का शिकार नहीं करता। प्राकृतिक जंगलों में सब बराबर होते हैं, कोई पूंजीपति और कोई गरीब नहीं होता। कोई लूटपाट नहीं होती और न ही कोई केवल दूसरों की खिल्ली उड़ाकर कबीले का सरदार बन जाता है। खैर, प्रधानमंत्री जी हैं, कुछ भी बोल सकते हैं।

नोट- वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का ये लेख जनज्वार डॉट कॉम से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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