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गाजियाबाद जिला पंचायत में अध्यक्ष पद अनारक्षित घोषित, बीजेपी का दावा मजबूत

गाजियाबाद :  बजट 80 करोड़, सदस्यों की संख्या-14 और पांच लाख मतदाता वाले गाजियाबाद जिला पंचायत में अध्यक्ष पद अनारक्षित घोषित किया गया है। इसके बाद बीजेपी समेत कांग्रेस, बीएसपी, आरएलडी और सपा के उन दावेदारों की बांछें खिल गई हैं जो आरक्षित सीट होने के कारण सदस्य का चुनाव जीतने के बाद भी यह पद नहीं प्राप्त कर पाते थे।

हालांकि सभी राजनीतिक दलों में इस पद को पाने के लिए जोड़-तोड़ शुरू हो गई है लेकिन सबसे ज्यादा दावेदार बीजेपी के ही माने जा रहे हैं। इसके पीछे कारण है कि जिला पंचायत अध्यक्ष का पद सत्तारूढ़ दल के पास ही रहता है और वही अपने अनुसार बोर्ड को चलाता है।

जाट, गुर्जर, त्यागी और मुस्लिम वर्ग का दबदबा
गाजियाबाद जिला पंचायत अध्यक्ष प्रदेश में काफी प्रभावी माना जाता है, यही कारण है कि इस पद को पाने के लिए राजनीतिक दलों में जोड़-तोड़ रहती है। जातिगत आंकड़ों को देखें तो इस पद पर अधिकांश समय जाट, गुर्जर, त्यागी और मुस्लिम वर्ग से जुड़ा व्यक्ति ही काबिज रहा है।

इस बार भी बीजेपी से निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी मावी और उनके पति पवन मावी एक बार फिर से इस पद को पाने के लिए जोड़-तोड़ में लग गए हैं। वैसे बीजेपी में कई और दावेदार हैं जो अभी अपने राजनीतिक संपर्कों को साधने में लगे हैं।

सबसे लंबे समय तक पंचायत अध्यक्ष रहे जोगिंदर सिंह
जिला पंचायत की जातिगत 14 वार्डों की सीटों के पूर्व के आंकड़े देखें तो यहां 4 गुर्जर, 3 जाट, एक त्यागी, दो और मुस्लिम, एक यादव और एससी के तीन सदस्य चुने जाते रहे हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष के पुराने इतिहास को देखें तो सबसे ज्यादा तीन कार्यकाल हापुड़ निवासी जोगिंदर सिंह का रहा। 1997 में उनकी हत्या के बाद हुए चुनाव में धौलाना निवासी धर्मेश तोमर भाजपा जिला पंचायत अध्यक्ष बन गए थे।

वर्ष 2010 में प्रदेश में बीएसपी की मायावती सरकार होने के कारण पूर्व एमएलसी मलूक नागर की पत्नी सुधा नागर सत्ता के बल पर यह पद पाने में कामयाब हो गई थीं। 2012 में हापुड़ जनपद अलग बन जाने के बाद प्रदेश में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री राजपाल त्यागी के छोटे बेटे अजीत पाल त्यागी सरकारी जोड़ का लाभ लेकर यह पद पाने में कामयाब हो गए थे।

जिसकी सत्ता उसका अध्यक्ष
2015 में सपा सरकार होने पर मुरादनगर निवासी एमएलसी आशु मलिक ने सपा मुखिया मुलायम सिंह से अपने संबंधों लाभ उठाकर अपने भाई नूर हसन को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवा दिया था। दो साल के बाद जब प्रदेश में बीजेपी सरकार का गठन हुआ तो बीजेपी के अनिल कसाना ने जोड़तोड़ कर अविश्वास प्रस्ताव लाकर नूर हसन को हटा दिया और इस पद पर लक्ष्मी मावी बीजेपी के प्रदेश शीर्ष नेतृत्व से संबंधों का लाभ लेकर जिला अध्यक्ष के रूप में काबिज हो गईं।

गुर्जरों और अनुसूचित जाति का दावा हो सकता है मजबूत
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सत्ता का लाभ उठाने वालों के जातिगत गणित को समझें तो यहां बागपत से सांसद समेत पांच विधायक जाट समाज से हैं, वहीं हाल ही में बीजेपी ने पश्चिमी क्षेत्र के प्रभारी रहे अश्वनी त्यागी को भी पार्टी में महासचिव बनाने के साथ ही एमएलसी पद भी दे दिया है जबकि गुर्जर समाज के लोगों को अभी कोई महत्वपूर्ण पद मिलने की आस है।

यदि विधानसभा में पार्टी में जातिगत लाभ हानि का हिसाब लगाया तो यह पद एक बार फिर से गुर्जर या अनुसूचित जाति के हिस्से में जा सकता है। जिला पंचायत जीतने वाले 14 सदस्य ही सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनते हैं। यदि आम सहमति नहीं बनती तो सदस्य ही वोटिंग कर अध्यक्ष पद का चयन कर लेते हैं।

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