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घर में ही गठबंधन की खिचड़ी पका रहे चाचा-भतीजा, क्या बदल सकेंगे पुराना नतीजा?

लखनऊ। लोकसभा और विधानसभा में गठबंधन फेल होने के बाद अब समाजवादी पार्टी फिलवक्त किसी दूसरे दल से गठबंधन करने के बजाए घर मे ही गठबंधन करने का ताना-बाना बुन रही है। बिहार में दूसरी बार महागठबंधन के सरकार बनाने में विफल होने के बाद से यूपी में सबसे बड़े दल समाजवादी पार्टी के पास गठबंधन करने के विकल्प सीमित ही बचे है। ऐसे में उसे कुछ छुटभैय्ये दलों के साथ किसी दूसरे के बजाए पहले अपने चाचा शिवपाल यादव की प्रसपा से ही गठबंधन करनें अक्लमंदी दिख रही है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बसपा और कांग्रेस से गठबंधन करने के बाद अपेक्षित परिणाम न आने से समाजवादी पार्टी ने पूर्व मंत्री शिवपाल यादव के नेतृत्व वाली प्रगतिशील समाजवादी पार्टी(लोहिया) से गठबंधन करने का सकेंत दिया है।

सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने जहां २०२२ के चुनाव में अपने चाचा और प्रसपा के मुखिया शिवपाल यादव के खिलाफ जसवंत नगर से उम्मीदवार न उतारने तथा सरकार बनने पर कैबिनेट मंत्री बनाने का एलान किया है तो जवाब में शिवपाल यादव ने दो टूक कह दिया है कि यदि नौबत आती है तो वे अपनी शर्तो पर ही सपा से तालमेंल या गठबंधन करेगे। अखिलेश और शिवपाल के हालिया बयानों पर प्रसपा के प्रवक्ता दीपक मिश्र ने कहा कि उनकी पार्टी का सपा में विलय का कोई औचित्य नहीं है। भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए यदि जरूरी हुआ तो सम्मानजनक समझौता किया जाएगा। राजनीति प्रेक्षकों की माने तो एका का यह प्रयास सपा का परंपरागत वोट बचाने के लिए है। २०१७ मेें सपा-प्रसपा के अलग-अलग चुनाव लडऩे से मुलायम कुनबे को जो नुकसान उठाना पड़ा उसके बाद से दोनों दलों के नेताओं को इस बात का यकीन हो गया है कि यदि समय रहते कोई निर्णायक रणनीति नहीं अपनाई गयी तो एक बार फिर २०२२ में दोनो को ही को खासे नुकसान का उठाना पड़ सकता है।

इससे पहले २०१७ के विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस और २०१९ के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन किया। दोनों ही गठबंधनों मे शामिल दल कोई बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाए। २०१७ में सपा और कांग्रेस के बीच हुए एलायंस में सपा २९८ और कांग्रेस १०५ सीटों पर उतरी थी लेकिन दोनों के गठबंधन का आंकड़ा साठ की भी संख्या नहीं पार कर सका। २९८ में सपा को ४७ और कांग्रेस को १०५ में से मात्र सात सीटे मिली थी। यह गठबंधन बुरी तरह विफल रहा।

इसी तरह २०१९ के लोकसभा चुनाव में सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के न चाहने के बाद भी सपा के प्रमुख अखिलेश यादव ने बसपा से गठबंधन किया। यह सपा बसपा का दूसरी बार का गठबंधन था। इससे पहले सपा और बसपा मेें १९९३ में गठबंधन हुआ था और दोनों के बीच हुए गठबंधन के सूत्रधार मुलायम सिंह यादव और कांशीराम हुआ करते थे और इस गठबंधन ने मिलकर सरकार भी बनाई थी। गठबंधन सरकार का नेतृत्व मुलायम सिंह यादव ने किया था।

१९९५ में गठबंधन टूटने के बाद लगभग २५ साल बाद एक बार सपा और बसपा के बीच गठबंधन हुआ। इस बार के गठबंधन के सूत्रधार बदल गए थे इस बार गठबंधन करने वाले अखिलेश यादव और मायावती थे। लोकसभा २०१९ के चुनाव मे दोनो दलों में ३८-३८ सीटों का बंटवारा हुआ था जिसमें सपा को पांच और बसपा को दस सीटे मिली थी। लोकसभा चुनाव नतीजे आने के कुछ दिन बाद ही बसपा की मुखिया मायावती ने यह कहकर गठबंधन तोड़ दिया था कि सपा का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हुआ इसलिए गठबंधन बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाया। गठबंधनों के इन ख_ïे-कड़ुवे अनुभवों को देखते हुए समाजवादी पार्टी ने प्रसपा के साथ मिलकर ही २०२२ की रणनीति तय करने में गुणाभाग लगाना शुरू कर दिया है।

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