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चलो किसान! जब हुइहै राजा हलकान, तब हुइहै जीवन आसान!

देश में चल रहे अभूतपूर्व किसान आंदोलन और दिल्ली घेराव के बीच कुछ लोग यह बहस चलाने मे मुब्तिला हैं कि भूमिहीन दलितों व खेत मजदूरों को किसान आंदोलन से दूर रहना चाहिए क्योंकि यह बड़े व धनी किसानों का आंदोलन है। ये वही किसान और आढ़ती हैं जो सामंती संस्कारों के वाहक हैं और दलितों व खेत मजदूरों के खिलाफ अत्याचार और उनका शोषण करते हैं। दलित और भूमिहीन वर्गों के ये तथाकथित शुभ चिंतक इस किसान आंदोलन को बड़े किसानों का आंदोलन मान रहे हैं और यह समझा रहे हैं कि यह आंदोलन शासक वर्ग के दो खेमों का आपसी संघर्ष है, इसलिए दलितों और खेत मजदूरों को इससे अलग ही रहना चाहिए।

मजदूर वर्ग के ये कथित शुभचिंतक ये भूल जाते हैं कि भारत में किसान आंदोलनों का एक लंबा इतिहास रहा है, उस इतिहास का एक गौरवशाली पड़ाव अवध का किसान आंदोलन ‘एका’ है जिसके नेता मदारी पासी एक दलित जाति से थे। जमींदारों के अन्याय, अत्याचार और क्रूर सामंती शोषण के खिलाफ अवध के किसानों ने जो बिगुल बजाया था उसमें सभी जातियों के छोटे किसान व दलित भूमिहीन किसानों की बड़ी भागीदारी थी। मदारी पासी को आज दलित अस्मिता के प्रतीक पुरुष के रूप मे पूजा तो जाता है लेकिन किसान आंदोलन मे उनकी भूमिका को याद नहीं किया जाता, न ही नई पीढ़ी के सामने उस इतिहास को उजागर होने दिया जाता है।

2019 में अवध के किसान आंदोलन पर ‘एका’ नामक एक किताब का प्रकाशन हुआ। राजीव कुमार पाल द्वारा  लिखित इस किताब की भूमिका में प्रसिद्ध लेखक सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है– ‘‘पासी जाति के थे मदारी। और उनके सहयोगी प्रतापपुर के देव भी। देव तो एकदम खेतिहर थे। पासी जाति के बारे मे कहा जाता है कि सत्तावनी क्रांति मे अवध में सबसे ज्यादा सहयोग इन्ही लोगों का रहा। जमींदारों के अत्याचारों से किसानों के मुक्तिदाता बने मदारी। यद्यपि वे मानते थे कि कांग्रेसी,खिलाफती, अमन सभाइयों में सभी जमींदार हैं और वे अपने मनमाफिक कानून तय करवा लेंगे, बावजूद इसके मदारी के आंदोलन और जागीरदारों की घेराबंदी जैसे तीव्र कदमों ने किसानों के भीतर जिस चेतना और आत्मविश्वास का संचार किया वह उन्हें जीने और संघर्ष करने का हौसला दे गया– चलो किसान ! जब हुइहै राजा हलकान, तब हुइहै जीवन आसान।’’

मदारी पासी और अवध के किसानों का एका आंदोलन जमींदारों और उनके पोषक अंग्रेज़ी राज के खिलाफ था, और आज किसानों का दिल्ली घेराव कॉर्पोरेट जमींदारी और क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ है। तीन कृषि कानून जो सीधे पर पर किसान, मजदूर और आम उपभोक्ता सभी के हितों पर सीधा हमला हैं, उनके खिलाफ इन तीनों की भागीदारी ही इस आंदोलन के उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं।

 

यह सही है है कि भारत की कृषि संरचना भारतीय समाज की ही तरह जटिल और आपस मे उलझी हुई है, आवश्यकता से बहुत कम आधे अधूरे भूमि सुधार, बिखरी हुई छोटी जोतें, कृषि कार्य मे लगी बहुसंख्यक आबादी का भूमिहीन होना तथा किसी समग्र कृषि नीति का अभाव ऐसे कारण हैं जो भारत में कृषि संकट को जन्म देती हैं। खेती मे पिछड़े उत्पादन सम्बन्धों ने सामंती संस्कारों व भूमिहीनों के शोषण को भी आज तक कायम रखा हुआ है। यहाँ कोई भी कृषि नीति यहाँ तबतक कारगर नहीं हो सकती, जबतक वास्तविक भूमि सुधार नहीं हो जाते। आज़ादी के बाद से किसी भी सरकार ने इस दिशा मे कोई ईमानदार प्रयास नहीं किए। और वर्तमान सरकार एक झटके मे खेती को कॉर्पोरेट के हवाले करके किसानों को पूँजीपतियों का रणनीतिक साझीदार बना देना चाहती है।

भारत के खेत मजदूर और भूमिहीन दलित लंबे समय से भूमि सुधार और कृषि कार्य के आधुनिकीकरण की लड़ाई लड़ रहे हैं। अलग अलग राज्यों मे भूमि वितरण की मांग पर आंदोलन चलते रहे हैं। उदाहरण के लिए बिहार में डी बंदोपाध्याय आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के सवाल पर अभी भी आंदोलन कायम है। इसी तरह मजदूरी बढ़ाने और खेत मजदूरों को सम्मान व अधिकार देने, बटाईदारों को किसान का दर्जा देने और फसल के नुकसान पर उन्हें मुआवजा देने जैसी तमाम मांगों पर वही संगठन आंदोलन करते रहते हैं जो आज दिल्ली पड़ाव को संगठित कर रहे हैं।

बड़ी विचित्र स्थिति है कि कुछ वाम प्रकृति के समूह ऐसे भी हैं जो भारत में खेती को पूंजीवादी उत्पादन मान चुके हैं और वे खेती में अतिरिक्त मूल्य की बात स्वीकारते हैं,  वे खेत मजदूर आंदोलन को एक प्रतिगामी आंदोलन मानते रहे हैं, उनके हिसाब से खेत मजदूर आंदोलन कृषि क्षेत्र के पूर्ण पूंजीवादीकरण की राह में बाधा हैं, वही लोग आज खेत मजदूरों को किसान आंदोलन से दूर रहने की सलाह दे रहे हैं, और किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे संगठनों को पूँजीपतियों का पिछलग्गू बता रहे हैं। बहरहाल ये बहसें तो चलती रहेंगी लेकिन वर्तमान किसान आंदोलन ने भारत के कृषि ढाँचे पर व्यापक विमर्श छेड़ दिया है। साफ है तीन कृषि क़ानूनों के जरिये मोदी सरकार ने भारत में भूमि सुधार और आत्मनिर्भर कृषि विकास के एजेंडे को हमेशा के लिए तिलांजलि देने का मन बना लिया है। खेती किसानी, कृषि उपज की खरीद और खाद्यान्न को पूरी तरह कॉर्पोरेट के नियंत्रण में देने की तैयारी है। कॉर्पोरेट खेती के जरिये किसान-मजदूर संबंध को किसान-कॉर्पोरेट संबंध में बदल देने की तैयारी है, जिसके परिणाम स्वरूप खेत मजदूर की हैसियत पूरी तरह खत्म हो जाएगी और एक दोहरी जमींदारी प्रथा का आगाज होगा।

पिछले कुछ सालों में खेती के मामले मे काफी परिवर्तन घटित हुये हैं, जैसे एक बहुत बड़ा बदलाव आया है बटाई के मामले में। खेती में बढ़ते घाटे के कारण बड़ी संख्या में मध्यम व बड़े किसान अपनी जमीन बटाई पर दे देते हैं, दलित व खेत मजदूर जातियों के लोग अधिया-बटाई पर जमीनें लेकर खेती करते हैं। भले ही वह कई बार लाभकारी व्यवसाय न हो पर दलित किसानों का अच्छा खासा हिस्सा इसमे संलग्न है, जो खेत मजदूरी के बजाय एक तरह की कांट्रैक्ट खेती है जो किसान और खेत मजदूर के बीच होता है। लेकिन तीन कृषि कानून के अस्तित्व में आने के बाद से यह रूझान पैदा होगा कि किसान अपने लाभ और ज्यादा मुनाफे  के लिए मजदूर से अनुबंध करने की बजाय कॉर्पोरेट से अनुबंध करना ज्यादा फायदेमंद समझेगा। कुल मिलाकर अभी की कृषि व्यवस्था में भूमि सुधार की गुंजाइश बची है लेकिन कॉर्पोरेट खेती के काल में यह और मुश्किल होगा।

इसी तरह आवश्यक वस्तु अधिनियम के कारण जरूरी खाद्य सामग्री के भंडारण की छूट मिलने के कारण कॉर्पोरेट खाद्यान्न की कीमत तय करेंगे इससे आम उपभोक्ता का नुकसान होगा ही साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर भी असर पड़ेगा और यह आशंका निर्मूल नहीं है कि गरीबों को मिलने वाले सस्ते राशन पर भी कॉर्पोरेट की निगाह पड़ेगी और यह व्यवस्था भी समाप्त होगी। इसका सीधा नुकसान दलितों-गरीबों और खेत मजदूरों को होगा।

दलितों मजदूरों के कथित शुभचिंतक यह भी कह रहे थे कि किसान आंदोलन केवल एमएसपी पर केन्द्रित है और इस दिशा में कोई सकारात्मक परिणाम आते ही यह आंदोलन खतम हो जाएगा। पर अब नौ दौर की वार्ता के बाद यह भी स्पष्ट हो चला है कि किसान आंदोलन के नेता तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुये हैं। यह भी समझना चाहिए कि किसान नेताओं पर यह दबाव इसलिए भी है कि अपने कथित शुभ चिंतकों की सलाह को दरकिनार कर इस आंदोलन में बड़ी संख्या मे खेत मजदूर, दलित व आदिवासी संगठन बढ़ चढ़ कर भागीदारी कर रहे हैं। और यह भी एक तथ्य है कि इस किसान आंदोलन में बड़े और धनी किसान से ज्यादा छोटे किसानों की भागीदारी है।

समाज में कोई भी क्रांतिकारी बदलाव पहले से सूत्रबद्ध कर दिये गए सिद्धांतों की लीक पर घटित नहीं होता, समाज बदलाव का विज्ञान उसका मार्ग दर्शक होता है, नियंता नहीं! वर्तमान किसान आंदोलन दिल्ली की सीमाओं और देशभर के खेत खलिहानों मे घट रही एक अभूतपूर्व घटना है, समाज के हर परिवर्तन कामी व्यक्ति संगठन व सोच को इसका हिस्सा बनना होगा तभी इसमे से वांछित परिणाम हासिल करने की उम्मीद कर सकते हैं।


लेखक आर. राम स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. उनका ये लेख मीडियाविजिल वेबसाइट से साभार लिया गया

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