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अमानवीय रिवाज : बिहार में जब जुल्म के दरवाज़े पर पहुंचती थी ‘डोली’ !

‘मेहंदी लगाके रखना, डोली सजाके रखना’, एक समय इस गाने ने पूरे देश को दीवाना बना रखा था। वे शाहरुख-काजोल के खट्टे-मीठे रोमांस वाली डीडीएलजे के जादू के दिन थे। डोली से ही जुड़ा एक रिवाज उससे कुछ साल पहले तक बिहार में भी था। बिहार के एक गांव में चारपाई पर बैठकर मैंने इसका पूरा किस्सा सुना था। सुनकर हड्डियां तक सिहर उठीं। आज से तीन-चार दशक पहले तक बिहार के कई इलाकों में ‘डोली लेने’ की कुप्रथा थी। दस्तूर यह था कि शादी के बाद दुल्हन की डोली या पालकी पहले गांव के जमींदार के घर के दरवाजे पर रुकेगी।

उसे जमींदार कहें, बड़ा जोतदार कहें, सामंत कहें- जिस भी नाम से बुलाएं, असल बात यह थी कि गांव में किसी की हिम्मत उसके खिलाफ बोलने की नहीं होती थी। गांव में जो कुछ था, उस पर हक उसी का था। उसकी मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता। तो ऐसे में शादी किसी की भी हो, जमींदार की मर्जी का पहलू यहां भी आ जाता।

डोली से उतर कर दुल्हन पहले जमींदार के बिस्तर पर जाती। मनमर्जी करने के बाद जब वह इजाजत देता, तब दुल्हन ससुराल जा सकती थी। सालों तक गरीबों और दलितों ने यह कुप्रथा झेली। समय बदला तो यह कुप्रथा बंद हुई। अब इसके बारे में ज्यादा कुछ सुनने को नहीं मिलता। लेकिन अब भी कहीं-कहीं गांवों के सामंतों की ऐसी जोर-जबरदस्ती चल ही रही है। यह अलग बात है कि ऐसी खबरें बड़े शहरों में रहने वालों तक नहीं पहुंचतीं।

आज की जेनरेशन को क्या इस बात का अंदाजा है कि एक समय दूरदराज के इलाकों में इस तरह के अमानवीय रिवाज चल रहे थे? ऐसी ही एक और कुप्रथा ‘ब्लाउज खुलाना’। इसका जिक्र पहली बार बस्तर के घने जंगलों में सुना था। इस बारे में बताया था एक उग्र वामपंथी दल की नेता सुजाता ने। वह हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी की बेहतरीन छात्रा रहीं। पीएचडी करने के लिए छत्तीसगढ़ के बस्तर और बगल में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली गई थीं। रिसर्च के फील्ड वर्क के दौरान उन्हें एक सन्न कर देने वाली घटना का पता चला। उनके वहां पहुंचने के दो दिन बाद ही एक नवविवाहिता ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी।

खोज-खबर लेने पर पता चला कि इलाके में नई ब्याहताओं का आत्महत्या करना कोई नई चीज नहीं है। कोई फांसी लगाकर मरती है, तो कोई कुएं में कूदकर। सुजाता ने पूछा कि नई शादी वाली युवतियां इस तरह क्यों आत्महत्या करती हैं? ससुरालवालों के अत्याचार के कारण या फिर पति के साथ झगड़े के चलते? लोगों ने जो जवाब दिया, उसने सुजाता को हैरत में डाल दिया। इसके पीछे थी एक अपमानजनक कुप्रथा।

दरअसल, उस वक्त समाज के मालिक-मुख्तार लोगों का नियम था कि कोई शादीशुदा युवती घर से बाहर अपनी छाती ढककर नहीं रख सकती। किसी तरह का ब्लाउज पहने बिना सबके सामने से खुली छातियां लेकर गुजरना पड़ता। इसी रिवाज को ‘ब्लाउज खुलाना’ कहा जाता था। शादी के बाद जो युवतियां इस बेइज्जती को बर्दाश्त नहीं कर पातीं, वे जान दे देतीं। इस नियम को न मानने की सजा और भी सख्त थी।

यह सब सुनने के बाद सुजाता पीएचडी अधूरी छोड़कर उस इलाके की धुर वामपंथी राजनीति से सीधे-सीधे जुड़ गईं। इसके बाद कई सालों तक इसके खिलाफ लगातार आंदोलन चला। गांव के लोगों, खासकर महिलाओं के बीच से भी इसके खिलाफ आवाज उठनी शुरू हुई। चिंगारी धीरे-धीरे आग में बदली और ‘ब्लाउज खुलाना’ की कुप्रथा हमेशा के लिए बंद हो गई।

गांव-देहातों में गंदे रिवाजों की ऐसी कई कहानियां बिखरी पड़ी हैं। शाइनिंग इंडिया इस बारे में कितना जानता है, पता नहीं।

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