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ट्रैक्टर परेड हिंसा: दिल्ली पुलिस की दर्दनाक व्यथा,जो कोई सुनने को तैयार नहीं !

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिन्हे खरोंच भी लग जाए तो वामपंथियों से लेकर बुद्धिजीवी उनके लिए अश्रुगंगा बहाने लग जाएंगे। लेकिन अगर वे लोग सुरक्षाबलों के जवानों की हत्या करने पे भी उतर आयें, तो कोई उफ़ तक नहीं करेगा। इसी दोगलेपन के विरुद्ध अब दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों, उनके सगे संबंधियों और पूर्व अफसरों को मोर्चा निकालना पड़ा है।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर ट्रैक्टर परेड के नाम पर अराजकतावादियों ने जो उपद्रव किया, उसके कारण 300 से अधिक दिल्ली पुलिसकर्मी घायल हो गए। लेकिन इसके बावजूद कुछ निकृष्ट राजनीतिज्ञ उलटे दिल्ली पुलिस पर ही ‘निर्दोष किसानों’ पर क्रूरता ढाने का आरोप लगा रहे थे। राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों से लेके राहुल गांधी जैसे नेताओं ने उलटे दिल्ली पुलिस पर ही ठीकरा फोड़ने का प्रयास किया, जो जख्मों पर नमक रगड़ने के समान था।

इससे आहत हो दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों, उनके सगे संबंधियों और पुलिस के पूर्व अफसरों ने इन निकृष्ट प्रवृत्ति के लोगों और अराजकतावादियों के विरुद्ध शहीदी पार्क में विरोध प्रदर्शन किया। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, “शनिवार को शहीद दिवस पर आइटीओ स्थित जेपी पार्क में माहौल गमगीन होने के साथ आक्रोश से भरा हुआ था। यहां सैकड़ों की संख्या में पुलिसकर्मी और उनके स्वजन जुटे। उन्होंने आंदोलन के नाम पर सियासत कर रहे लोगों से पूछा कि क्या आंदोलन ऐसा होता है, जिसमें राष्ट्र के प्रतीकों का ही अपमान हो?

यह विरोध-प्रदर्शन दिल्ली पुलिस महासंघ के बैनर तले था। इसमें राष्ट्र को कलंकित करने वाली ट्रैक्टर परेड के दौरान उपद्रव में जान की बाजी लगाकर सुरक्षा में तैनात रहे पुलिसकर्मियों के साथ उनकी मां, बहन, पत्नी, भाई के साथ मासूम बच्चे भी शामिल थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर के साथ पुलिसकर्मियों के स्वजन हाथों में ‘हम किसी के दुश्मन नहीं, हमारा काम है शांति व्यवस्था बनाए रखना और हम हर हाल में वही करते हैं’ लिखे हुए प्लेकार्ड थे –

उदाहरण के लिए प्रदर्शन में शामिल घायल कांस्टेबल संदीप ने बताया “पुलिस ने काफी संयम से काम लिया। हमें आदेश था कि हर हाल में कलाकारों और आम लोगों की भीड़ से रक्षा करना है। अगर हम लोगों ने भी पलटकर जवाब दिया होता तो आज और बुरा हाल होता”

इसी प्रदर्शन में शामिल एक और कांस्टेबल अमित भाटी ने बताया, “उपद्रवियों ने मेरे ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाया, फिर लाठी से हमला किया। हमले से मेरा हेलमेट टूट गया। जान बचाने के लिए लाल किला की खाई में कूदा, जिससे मेरा पैर टूट गया। मैं भी किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूं। पर ऐसा किसान नहीं जो बेवजह जवानों के खून का प्यासा बन जाए। प्रदर्शनकारियों के मुंह से शराब की बू आ रही थी, जितने भी टकराये सभी नशे में थे।”

सोशल मीडिया पर कई हृदयविदारक वीडियो सामने आए, जिसमें दिख रहा था कि गोलियां न चलाने पर विवश पुलिसवाले किस प्रकार से उपद्रवियों की लाठियों और तलवारों से अपने आप को बचाने के लिए किस प्रकार से भाग रहे थे। कुछ लोग तो अपने आप को बचाने के लिए लाल किले और सड़क मार्ग के बीच में बने गड्ढों में कूदने का प्रयास कर रहे थे। इसके बावजूद राहुल गांधी की काँग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी के नेता दिल्ली पुलिस को ही दोषी ठहरा रहे हैं। क्या पुलिसकर्मियों के कोई अधिकार नहीं है?

इस प्रदर्शन में पिछले वर्ष के पूर्वोत्तर दिल्ली के दंगे में मारे गए हेड कांस्टेबल रतन लाल की तस्वीरें भी दिखाई दी, जिससे स्पष्ट पता चलता है कि बात अब आत्मसम्मान की है। क्या दिल्ली पुलिस का आत्मरक्षा करना भी अपराध है? जिस प्रकार से उन पर लाल किले में ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ पर दमन करने के झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाए हैं, वो न केवल निराधार हैं, बल्कि आरोप लगाने वालों की निकृष्ट मानसिकता को भी जगजाहिर करता है।

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