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तीसरे विश्वयुद्ध की सुनिए धमक, तन गई मिसाइलें, होने वाली है अंत की शुरुआत !

चीन ने इस महीने दक्षिणी चीन सागर में युद्ध अभ्यास शुरू किया तो अमेरिका ने क्षेत्र में अपने विमान वाहक पोत भेज दिए। चीनी कंपनी हुवावे, कोरोना और हॉन्गकॉन्ग को लेकर दोनों महाशक्तियों में जो तनाव शुरू हुआ, साउथ चाइना सी उसकी अगली कड़ी है। और इसका असर केवल इस इलाक़े तक ही सीमित नहीं रहेगा। समूची दुनिया इसकी चपेट में आ सकती है।

अमेरिका और चीन के बीच जिस तरह से तनाव बढ़ रहा है, उससे तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात बन रहे हैं। कहा जा रहा है कि एक तरफ लोकतंत्र के समर्थक अमेरिका, ब्रिटेन और जापान हैं। दूसरी तरफ साम्यवादी चीन। कोरोना से जूझ रही दुनिया के लिए इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियां नहीं हो सकतीं। जब सभी का ध्यान और संसाधन महामारी से निपटने पर होने चाहिए था, तब युद्ध की आशंकाओं पर बातें हो रही हैं।

इसमें एक तरफ हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, जो पहले ही अमेरिका फर्स्ट का नारा बुलंद कर चीन विरोधी नीतियों को अंजाम दे रहे हैं। दूसरी तरफ खड़े चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग भी ग्रेट चाइनीज ड्रीम का नारा लगाकर चीनी राष्ट्रवाद को उग्र चेहरा दे रहे हैं।

अमेरिका और चीन के बीच हालिया तल्खी व्यापार को लेकर शुरू हुई। अमेरिका में एक वर्ग लंबे वक़्त तक मानता आया था कि चीन के साथ व्यापार बढ़ाने पर वहां खुलापन बढ़ेगा और शायद लोकतंत्र का रास्ता भी बनेगा। लेकिन अभी तक यह ख्याली पुलाव ही साबित हुआ है। ख़ासतौर पर शी चिनफिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद।

चिनफिंग का चीन तो और अधिक अपने में सिमटा है, जो चाहता है कि उसकी पहुंच दुनिया के हर हिस्से तक हो, लेकिन उसके बारे में किसी को पता न चले। इसने अमेरिका के सब्र के बांध को तोड़ दिया। ट्रंप के अमेरिका के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करना। कोरोना की दस्तक के पहले हम इसी बारे में ख़बरें सुन रहे थे कि दुनिया ट्रेड वॉर झेलने जा रही है।

व्यापार की यह कड़वाहट कोरोना ने बढ़ा दी। ट्रंप और उनके अधिकारियों का खुलेआम आरोप कि महामारी के वायरस चीन की लैब में बने, ड्रैगन को भड़काने के लिए काफी थे। फिर आप देखिए कि कोविड-19 जितनी तेज़ी से यूरोप और अमेरिका पहुंचा और जान-माल की जिस बड़े स्तर पर हानि हुई, उससे चीन विरोधी भावना को बल मिला।

अब तो यह बात सामने आ रही है कि चीनी दबाव से विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अछूता नहीं रह पाया। दुनिया के सबसे बड़े प्रोडक्शन हब ने जिस तरह से खराब क्वॉलिटी के मेडिकल सामानों का निर्यात किया, उससे भी पश्चिमी राष्ट्र चीन की आलोचना करने लगे।

इसी बीच, चीन ने पड़ोसी देशों से बखेड़ा खड़ा कर लिया। पड़ोसियों के साथ उसका उग्र व्यवहार पहले से चिंता का विषय है। ताइवान में जब चीन विरोधी राष्ट्रपति निर्वाचित हुई तो उसे झटका लगा। ताइवान ने जिस तरह कोरोना को नियंत्रित किया है, उसे सब जगह प्रशंसा मिली। चीन को यह भी बर्दाश्त नहीं हुआ और उसके विमानों ने ताइवान की वायु सीमा की संप्रभुता का उल्लंघन किया।

इसी तरह एक दूसरे पड़ोसी जापान ने जब फैसला किया कि अब वह चीन की ग्लोबल सप्लाई चेन से दूर होगा तो परेशान ड्रैगन ने एक पुराने मुद्दे सेंकाकू द्वीप का मुद्दा उठा दिया। दक्षिणी चीन सागर में चल रहा तनाव सबके सामने है। यहां फिलीपींस और वियतनाम के साथ चीन ने तनातनी बढ़ा रखी है। उसने यहां कृत्रिम द्वीप बनाए हैं। उसकी बढ़ती आर्थिक ताकत के कारण सभी चुप रहे। यहां तक कि उसने इंटरनैशनल कोर्ट के निर्णय को भी मानने से इनकार कर दिया। ऑस्ट्रेलिया से भी रिश्ते खराब कर लिए।

अंतरराष्ट्रीय तनाव और ज्यादा तल्ख हो गया, जब चीन मई में भारत की सीमाओं पर सैन्य अभ्यास के बहाने लद्दाख में अतिक्रमण करने लगा। वैसे तो भारत के साथ उसका सीमा विवाद पुराना मामला है। तिब्बत के मुद्दे पर आपसी अविश्वास और सीमा समस्या के कारण 1962 में दोनों के बीच युद्ध तक हो चुका है।

लेकिन 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बीजिंग यात्रा और तत्कालीन चीनी शीर्षस्थ नेता देंग शेयओपिंग के बीच बातचीत के चलते दोनों देशों के रिश्तों में कुछ सुधार आया। इसी की बुनियाद पर 1993, 1996 और 2005 में दोनों पक्षों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान और आपसी विश्वास बनाए रखने के कई कदम उठाए गए। हालांकि इनके बावजूद सीमा पर समय-समय पर तनाव जारी रहा। डोकलाम में एक बड़ा गतिरोध था और इस बार गलवान में तो हद हो गई।

चीन का पड़ोसियों से यह व्यवहार भी अमेरिका के साथ उसके तनाव की बड़ी वजह है। मसलन भारत के मामले में अमेरिका उसके साथ खड़ा है। फ्रांस ने भी भारतीय पक्ष लिया। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के क्वॉड ने भी मोर्चा मजबूत करने की बात कही है।

संदेह में पूरा देश
एक पार्टी से नियंत्रित चीन को लेकर अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों की चिंताएं कई प्रकार की हैं। यह आशंका लगातार जताई जाती रही है कि चीन अपनी कंपनियों के जरिये जासूसी कराता है। उसके ऐप्स पर गाज इसी वजह से गिरी। यह भी कहा जाता है कि एजुकेशन एक्सचेंज प्रोग्राम की आड़ में उसने पश्चिम के शिक्षण संस्थानों में अपने जासूस भेजे। तकनीक का ग़लत इस्तेमाल उन तकनीक को हासिल करने में किया, जो उसके पास नहीं थीं। ताज़ा मामला हुवावे का है। कई देशों ने इस पर बैन लगा दिया है।

चीन की एक चाहत है, दुनिया में नंबर वन बनने की। इसके लिए उसने जो रास्ता चुना है, वह उसके इतिहास और संस्कृति से होकर जाता है। उसके यहां एक कहावत है, जिसका अर्थ निकलता है कि मूर्ख बनकर रहो ताकि तुम्हारे इरादे के बारे में किसी को पता न चल सके। चीन ने पिछले दशक तक यही किया। अब जब उसका यह मुखौटा उतर रहा है तो इरादे भी सामने आने लगे हैं।

लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या हम तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं। अगर एक नज़र में देखें तो अमेरिका का प्रभाव वाकई घट रहा है। चीन का वर्चस्व बढ़ा है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति खराब हुई है। चीन ने ग्लोबल सप्लाई चेन में ख़ुद को सबसे बड़ी कड़ी बना लिया है। अमेरिका महामारी से त्रस्त है और चीन उससे आगे बढ़ चला है। ये स्थितियां संकटपूर्ण ज़रूर हैं। युद्ध की भी आहट दे रही हैं, लेकिन युद्ध होता नज़र नहीं आ रहा। वैश्विक अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी चीज़ है बातचीत और उसके लिए दरवाजे हमेशा खुले हुए हैं।

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