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तुर्की और चीन के लिए बज गई खतरे की घंटी, इस अफ्रीकी देश से भारत करने जा रहा रक्षा साझेदारी

भारत और मोरक्को- दोनों देशों के बीच की दूरी बेशक 8 हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा हो, लेकिन दोनों देशों की साझेदारी वैश्विक राजनीति में भारत के कद को बढ़ाने में अहम साबित हो सकती है। हाल ही में भारत और मोरक्को के विदेश मंत्रियों के बीच एक virtual बैठक का आयोजन हुआ था, जिसके बाद यह खबर आई कि दोनों देश जल्द ही एक डिफेंस पैक्ट पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। मोरक्को रणनीतिक तौर पर बेहद अहम देश है और भारत-तुर्की विवाद के परिप्रेक्ष्य में इस देश के साथ भारत की साझेदारी पूरे क्षेत्र की भू-राजनीति को बदल देने की क्षमता रखती है।

मोरक्को अफ्रीका के सबसे स्थिर देशों में से एक है और इस देश के माध्यम से भारत आसानी से उत्तरी अफ्रीका पर अपना प्रभुत्व बढ़ा सकता है। मोरक्को स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर के ठीक दक्षिण में स्थित है, और यही स्ट्रेट अटलांटिक महासागर को भू-मध्य सागर से जोड़ती है। यूरोप से व्यापार करने के लिए Suez Canal के बाद स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर ही सबसे अहम ट्रेड रूट माना जाता है। अगर भारत मोरक्को के साथ अपने सुरक्षा संबंध और मजबूत करता है तो भारत आसानी से यहाँ बैठकर तुर्की जैसे देशों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

Indo-pacific क्षेत्र के बाद भू-मध्य सागर ही वह जगह है जहां सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संघर्ष देखने को मिल रहा है। यहाँ तुर्की ने पिछले कुछ समय में ग्रीस, इटली, इजरायल और फ्रांस जैसे देशों के साथ पंगा लिया हुआ है और भू-मध्य सागर के एक बड़े हिस्से पर अपना दावा भी ठोका हुआ है। तुर्की भू-मध्य सागर में UNCLOS के लागू होने का विरोध करता है, और आए दिन उसकी research vessels विवादित जल सीमा में सर्वेक्षण करती दिखाई देती है। किसी विवाद की सूरत में भारत मोरक्को में बैठकर आसानी से तुर्की के ट्रेडिंग रूट पर प्रहार कर तुर्की की अर्थव्यवस्था को पंचर करने की स्थिति में आ सकता है। ऐसे में इस देश की रणनीतिक महत्ता बेहद ज़्यादा है, जिसे अब भारत पहचान भी रहा है।

उदाहरण के लिए वर्ष 2015 में मोरक्को के राजा King Mohammed VI भारत के दौरे पर आए थे, जिसके बाद दोनों देशों की साझेदारी को एक नया आयाम मिला है। 2015 के बाद से दोनों देशों के बीच 23 बार मंत्री स्तर पर वार्ता हो चुकी है और अलग-अलग क्षेत्रों में करीब 40 MoUs पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं।

रणनीतिक तौर पर यह देश भारत के अन्य साथियों जैसे सऊदी अरब और UAE के बेहद करीब रहा है। हाल ही में जब सऊदी अरब द्वारा तुर्की के सामान का बहिष्कार करने की मांग उठाई गयी, तो मोरक्को ने भरपूर साथ देते हुए अपने यहाँ तुर्की के सामान पर अनौपचारिक पाबंदी लगा दी थी। मोरक्को ने तुर्की से आयात होने वाले सामान पर Import duty को 90 प्रतिशत से बढ़ा दिया था। वर्ष 2019 में मोरक्को ने तुर्की से करीब 2.24 बिलियन का सामान आयात किया था, और मोरक्को के इस नए फैसले के बाद अब तुर्की को यह बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। मोरक्को अमेरिका के भी बेहद करीब है और ऐसे में भारत-मोरक्को के सम्बन्धों को विकसित करने में भारत के सामने कोई रणनीतिक चुनौती उभरकर आने के आसार कम ही हैं।

मोरक्को के साथ अपनी साझेदारी को बढ़ाकर भारत चीन के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी कर सकता है। चीन शुरू से ही Atlantic-Europe के बीच ट्रेड रूट्स पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है ताकि उसके BRI प्रोजेक्ट्स को जल्द ही सफलता मिल सके। क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चीन पुर्तगाल के Azores द्वीप पर मौजूद अमेरिका के Lajes military base पर अपना कब्जा जमाना चाहता है। पुर्तगाल में चीन लगातार अपना निवेश भी बढ़ा रहा है और हाल ही में एक पुर्तगाली कंपनी Mota-Engil ने अपने 30 प्रतिशत शेयर्स एक चीनी कंपनी को बेचने का भी ऐलान किया था। यह दिखाता है कि ऐसे वक्त में भारत-मोरक्को के बीच होने वाले इस डिफेंस पेक्ट से क्षेत्र में चीन को बड़ा रणनीतिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

मोरक्को और भारत प्राकृतिक साझेदार हैं। दोनों देश इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। मोरक्को में पिछले कुछ सालों में लोकतन्त्र भी मजबूत हुआ है। दोनों देशों की साझेदारी दोनों ही देशों को बड़ा “diplomatic boost” प्रदान कर सकती है। उम्मीद है कि आने वाले सालों में दोनों देश अपने सम्बन्धों की अहमियत समझकर द्विपक्षीय रिश्तों को और मजबूत करने पर ध्यान केन्द्रित करेंगे!

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