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दिल्ली में छोड़े हरियाणा-पंजाब वाले साथी, बीजेपी ने बिहारियों से निभाई यारी, क्यों ?

भारतीय जनता पार्टी ने अपने दो सहयोगी दलों, पंजाब के अकाली दल और हरियाणा के जननायक जनता पार्टी को याद नहीं किया. दिल्ली विधानसभा सीटों पर टिकट के आवंटन में बीजेपी का अकाली दल और जजपा के साथ गठबंधन नहीं बन पाया. वहीं दूसरी तरफ बिहार के जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी को सीट देने के लिए सहमति बन गई.

जबकि, दिल्ली के सिख, पंजाब के उलट किसान वर्ग से नहीं बल्कि व्यापारी वर्ग से हैं और राजनीति में उनकी भागीदारी पड़ोसी राज्य की तरह आक्रामक नहीं है. 1984 में कांग्रेस द्वारा धोखा दिए जाने के बाद सिखों को, वोट बैंक के रूप में दिवंगत भाजपा नेता मदनलाल खुराना उन्हें बीजेपी की ओर खींच लाए. बहुत लंबे समय तक राष्ट्रीय राजधानी में पार्टी के मामलों के शीर्ष पर रहे खुराना, प्रवासी पंजाबी समुदाय से थे और सिखों को पार्टी के करीब लाने के लिए सामान्य प्रवासी बातों का उपयोग किया. यह वह समय था जब सिख कांग्रेस से अलग हो गए और भाजपा के साथ चले गए. यहां तक कि डॉ. मनमोहन सिंह भी साल 1999 में दक्षिण दिल्ली सीट से विजय कुमार मल्होत्रा से चुनाव हार गए थे.

हालांकि, जैन हवाला मामले में नाम आने के बाद खुराना का दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से हटना, भाजपा में एक आत्मघाती फैसला था. जाट समुदाय से आने वाले साहिब सिंह वर्मा ने खुराना की जगह ली. 1998 के विधानसभा चुनावों में खुराना को भाजपा नेता के रूप में दूसरी पारी नहीं खेलने दी गई और इसके बजाय सुषमा स्वराज को लाया गया था. इस दौरान खुराना ने 5 सीटों पर इनेलो के साथ गठबंधन के लिए मजबूर किया जो वो हार गए. दरअसल, खुराना ने यह जाट समुदाय से एक मजबूत नेता के रूप में उभर रहे साहिब सिंह वर्मा के कद को कम करने के लिए किया था, जो अब तक बीजेपी से साथ नहीं थी. उनके उभरने तक भाजपा मुख्य रूप से उत्तर भारतीय राज्यों हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी यूपी में एक शहरी बनिया-पंजाबी-उच्च जाति पार्टी बन गई थी.

चौधरी चरण सिंह और बाद में चौधरी देवीलाल के प्रभाव को देखते हुए, सिखों के बाद जाटों ने भी कांग्रेस को छोड़ने का फैसला किया और चले गए. साहिब सिंह के उदय के बाद ही दिल्ली के जाट और अन्य ओबीसी समुदाय गुर्जरों ने पार्टी के साथ पहचान बनाई. ऐसे में चौटाला या दिल्ली के बाहर के किसी अन्य जाट के पार्टी दखल संभावना कम हो गई. वैसे भी राष्ट्रीय राजधानी में अकालियों का हित विधानसभा या लोकसभा चुनावों की तुलना में गुरुद्वारा की राजनीति पर अधिक केंद्रित रहा है. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति से स्वतंत्र दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की राजनीति, दिल्ली की क्रिकेट बॉडी डीडीसीए की तरह ही पेचीदा है. पहले खुराना और बाद में अरुण जेटली ने गुरुद्वारा चुनावों में अकाली नेताओं को संरक्षण देकर दिल्ली के सिख मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की. जेटली के निधन के बाद, दिल्ली में अकालियों ने भाजपा के भीतर एक संरक्षक खो दिया. ऐसे में उनके पास कोई बातचीच करने को कुछ बचा नहीं.

दरअसल, वर्तमान भाजपा नेतृत्व ने अकाली दल के सिख वोटों को प्रभावित करने के दावे में बहुत योग्यता नहीं देखी, क्योंकि 2015 में आम आदमी पार्टी ने सभी सिख-वर्चस्व वाली सीटें जीती थीं. अकाली नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने जीत दर्ज की और उपचुनावों में भी भाजपा के कमल पर ही चुनाव लड़ा था. यह बहस का विषय भी है कि क्या राष्ट्रीय राजधानी के सिख और जाट ने कभी अकाली दल या इंडियन राष्ट्रीय लोक दल (चौटाला खानदान का एकजुट संगठन) के साथ पहचान बनाई थी वह भी तब जबकि प्रवासी मतदाता अभी भी चुनावी परिदृश्य पर हावी हैं? यह ध्यान रखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय राजधानी की किसी भी सीट से लोकसभा के सदस्य के रूप में चुने गए एकमात्र सिख 1980 में नई दिल्ली से कांग्रेसी चरणजीत सिंह थे.

बहरहाल, सच तो यह है कि शहर की बदली हुई जनसांख्यिकी और चुनावी प्रोफाइल को देखते हुए सिख और जाट पहचान वाले दलों की पहचान तेजी से अप्रासंगिक होती जा रही है. आप नेतृत्व ने भी इस बार आश्चर्यजनक रूप से हरि नगर, राजौरी गार्डन और जंगपुरा की 3 सिख सीटों से गैर-सिखों को मैदान में उतारा है, हालांकि चांदनी चौक से प्रहलाद सिंह साहनी को मैदान में उतारा है. क्या यह दिल्ली के चुनावों में सिख मतदाताओं की बढ़ती अप्रासंगिकता का संकेत है? शायद हां, इन कॉलोनियों में से अधिकांश का जनसांख्यिकीय प्रोफाइल पिछले कुछ वर्षों में बदल गया है. तो जाट-गुर्जर बहुल ग्रामीण दिल्ली है जो अब प्रवासियों द्वारा कब्जा की गई अनधिकृत कॉलोनियों का रूप ले रही है.

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