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नेपाल सरकार मानव तस्करी रोकने के लिये लागू करने जा रही सख्त कानून, अब युवा महिलायें नहीं कर पायेंगी ये काम

नेपाल की युवा महिलायें इन दिनों आन्दोलन पर हैं। इसका कारण एक ऐसा प्रस्तावित सरकारी फरमान है जिसके लागू होने के बाद वे अकेले विदेश यात्रा नहीं कर पाएंगी। नेपाल सरकार के इमीग्रेशन विभाग के अनुसार यह क़ानून मानव, विशेष तौर पर महिलाओं की तस्करी को रोकने के लिए बनाया जा रहा है।

इसके अनुसार 40 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं को अफ्रीकी और मध्य-पूर्व के देशों में अकेले जाने के पहले अपने परिवार और स्थानीय प्रशासन की रजामंदी प्रस्तुत करनी होगी। इस प्रस्तावित क़ानून को महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं ने असंवैधानिक और बकवास करार दिया है। अब, बढ़ते आन्दोलनों को देख कर इमीग्रेशन विभाग ने स्पष्टीकरण जारी किया है की यह क़ानून अभी पूरी तरीके से तैयार नहीं किया गया है और यह केवल असुरक्षित महिलाओं पर ही लागू होगा। इस स्पष्टीकरण के बाद से महिला संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ता “असुरक्षित महिला” की परिभाषा पूछ रहे हैं।

लगभग हरेक दिन राजधानी काठमांडू के लगभग मध्य में स्थित मैतिघर मंडला पर सैकड़ों महिलायें इस प्रस्तावित क़ानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं और शांतिपूर्ण मार्च निकाल रही हैं। इन प्रदर्शनों में महिलायें बलात्कार पर दोषियों पर कार्यवाही न किये जाने और महिला अधिकारों के हनन का मुद्दा भी उठा रही हैं।

अधिकतर महिलायें आंकड़ों के साथ बता रही हैं कि केवल महिलायें ही तस्करी का शिकार नहीं हैं, बल्कि पुरुष भी हैं, फिर विदेश यात्रा पर रोक का क़ानून केवल महिलाओं के लिए ही क्यों बनाया जा रहा है? नेपाल के मानवाधिकार आयोग की रपट के अनुसार वर्ष 2018 में नेपाल के कुल 35000 नागरिक मानव तस्करी का शिकार बने, जिसमें 15000 महिलायें, 5000 बालिकाएं और शेष पुरुष थे।

वीमेन लीड नामक संस्था की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हिमा बिष्ट के अनुसार कट्टर पितृसत्तात्मक सोच वाला समाज कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता की महिलायें स्वतंत्र हों और आगे बढ़ें – यह प्रस्तावित क़ानून भी ऐसी ही सोच का नतीजा है। नेपाल की भूतपूर्व चुनाव आयुक्त इला शर्मा के अनुसार आजकल के शिक्षित अधिकारी महिलाओं को कमजोर मानते हैं और उन्हें एक परिपक्व नागरिक और वयस्क मानने से हिचकते हैं – लगता है कि इस क़ानून की रूपरेखा भी ऐसे ही अधिकारियों ने तैयार की है। ऐसे अधिकारी महिला सशक्तीकरण, उनकी क्षमता का विकास और महिलाओं को अधिक मौके देने के बदले पुरातनपंथी और असंवैधानिक रास्ता तलाश करते हैं।

नेपाल में यह सब उस दौर में हो रहा है, जब दुनिया में अनेक जगहों पर महिलायें आगे भी बढ़ रही हैं। वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन की मुखिया पहली बार एक महिला – अश्वेत अफ्रीकी -होने जा रही हैं। नाइजीरिया की अर्थशास्त्री और पूर्व वित्त मंत्री नगोज़ी ओकोंजो इवेअला वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन की अगली मुखिया बनाने वाली हैं। वे 25 वर्षों तक विश्व बैंक में डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट भी रह चुकी हैं।

वैश्विक व्यापार के सन्दर्भ में स्विट्ज़रलैंड के जेनेवा स्थित वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन दुनिया का सबसे शक्तिशाली संस्थान है। वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन से पहले अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति बनकर कमला हैरिस ने एक नया कीर्तिमान बना डाला। सोवियत संघ से अलग हुए देशों में से एक एस्तोनिया, ने हाल में ही क़ज़ा कल्लास के तौर पर अपना पहला महिला प्रधानमंत्री चुना है। एस्तोनिया दुनिया का ऐसा पहला देश भी है जहां वर्तमान में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों महिला हैं।

जापान की ओलंपिक मंत्री और भूतपूर्व ओलपियन सिको हाशिमोतो को टोक्यो ओलंपिक 2020 ओर्गानिसिंग कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। हाशिमोतो स्पीड स्केटर के तौर पर चार शीत ओलंपिक खेलों में हिस्सा ले चुकी हैं और एक कांस्य पदक भी जीता है। उन्होंने ट्रैक साइकिलिस्ट की हैसियत से तीन ग्रीष्म ओलंपिक में भी हिस्सा लिया है। वे प्रधानमंत्री योशिहिदा सुगा के मंत्रिमंडल की मात्र दो महिला मंत्रियों में से एक हैं।

टेनिस के ग्रैंड स्लैम, ऑस्ट्रेलियन ओपन में सेरेना विलियम्स को सेमी फाइनल में हराने के बाद जापानी टेनिस स्टार नाओमी ओसाका ने सिको हाशिमोतो के ओलंपिक कमेटी के अध्यक्ष बनाने पर कहा की यह सही में बहुत खुशी की बात है और लैंगिक समानता का एक उदाहरण भी। ओसाका ने आगे कहा की महिलाओं को लगभग हरेक क्षेत्र में बहुत युद्ध केवल मर्दों से बराबरी के लिए लड़ने पड़ते हैं, यह एक जीत है पर बहुत सारे क्षेत्रों में अभी भी समानता बहुत दूर है।

सिको हाशिमोतो को अध्यक्ष नियुक्त करने के बाद कमेटी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है की लैंगिक समानता और विविधता के आदर्शों को इन खेलों में पूरी तरह से अपनाया जाएगा। इन्टरनॅशनल ओलंपिक कमेटी के चेयरमैन थॉमस बाश ने भी इस खबर पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि लैंगिक समानता का यह एक आदर्श उदाहरण है।

महिलाओं के हरेक क्षेत्र में परचम लहराने के बाद भी यह दुखद तथ्य है की इस समय दुनिया के अधिकतर हिस्सों में महिलायें अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन कर रही हैं। महिलाओं द्वारा शुरू किये गए आन्दोलनों में प्रायः अधिक संख्या में लोग शामिल होते हैं, ऐसे आन्दोलन अहिंसक रहते हैं और अधिकतर मामलों में सफल भी रहते हैं।

महिलाओं द्वारा आन्दोलनों की शुरुआत का इतिहास पुराना है, और ऐसा लगातार होता रहा है। हाल के वर्षों में अल्जीरिया, लेबनान, बेलारूस, अमेरिका, सूडान, मेक्सिको, फिलीपींस, अमेरिका, भारत, ब्राज़ील और इरान में ऐसे आन्दोलन किये जा चुके हैं या फिर किये जा रहे हैं। हमारे देश में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरुद्ध दिल्ली के शाहीन बाग़ के आन्दोलन की चर्चा पूरी दुनिया में की गई, और प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने वर्ष 2020 के दुनिया के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों की सूचि में बिलकिस दादी को भी शामिल कर इस आन्दोलन को अंतर्राष्ट्रीय सम्मान दिया। इस आन्दोलन का आरम्भ 15 दिसम्बर 2019 की ठिठुरती रात में लगभग 50 महिलाओं ने किया था।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एरिका चेनोवेथ और जोए मार्क्स ने 2010 से 2014 के बीच दुनियाभर में किये गए बड़े आन्दोलनों का विस्तृत अध्ययन किया है। इनके अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक अहिंसक आन्दोलनों की अगुवाई महिलाओं ने की है। इनके अनुसार महिलाओं की अगुवाई वाले आन्दोलन अपेक्षाकृत अधिक बड़े और अधिकतर मामलों में सफल रहे हैं। महिलाओं के आन्दोलन अधिक सार्थक और समाज के हरेक तबके को जोड़ने वाले रहते हैं, इनकी मांगें भी स्पष्ट होती हैं। महिलायें आन्दोलनों के नए तरीके अपनाने से भी नहीं हिचकतीं।

खबर साभार : जनज्वार 

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