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न गारंटी और न वारंटी.. चीन के अवैध द्वीपों का हाल अब बिलकुल ‘चाइनीज माल’ जैसा !

चीन द्वारा बनाए गए कृत्रिम द्वीप अब डूबने के कगार पर है। दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक नीति रोज ही देखने को मिलती है। कभी किसी देश के एक्सक्लूसिव इकोनोमिक जोन में घुसने के वजह से तो कभी कृत्रिम द्वीप बनाने को। इन सभी का मकसद सिर्फ और सिर्फ समुद्री जल क्षेत्र के लिए बने अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ाना तथा अपनी प्रभुता स्थापित करना है। परन्तु अब ना तो चीन के पड़ोसी देशों पर आक्रामक रुख काम आ रहा और ना चीन अपनी गुंडागर्दी उस तरीके से दिखा पा रहा है जैसा पहले दिखाता था। इसकी एक वजह है चीन द्वारा बनाए गए कृत्रिम द्वीपों का कमजोर हो कर ढहने की खबर आना।

The National Interest की रिपोर्ट के अनुसार ऐसी अफवाह उड़ रही है कि चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर पर दबदबा बनाए रखने के लिए निर्माण किए गए नए द्वीपों का कंक्रीट अब उखड़ रहा है और उनकी नींव कठिन जलवायु में अब स्पंज बनती जा रही है। रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि अगर कोई सुपर-टाइफून आता है और इन द्वीपों से सीधा टकराता है तो इनका बचना मुश्किल है।

बता दें कि वर्ष 2013 से ही बीजिंग दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा ठोकने और विवादित क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए मानव निर्मित कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर रहा था, जिसे मिलिट्री बेस की तरह इस्तेमाल किया जा सके। इस दौरान चीन ने 5 बिलियन डॉलर से अधिक का खर्च किया।

चीन ने 7 द्वीपों को बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था जिसमें से मुख्यत: Spratly island group के Fiery Cross, Subi और Mischief reefs प्रमुख हैं। चीन ने इन द्वीपों का निर्माण अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए किया था। यही वजह है कि इस Spratly द्वीप पर वियतनाम, फ़िलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी दावा करते हैं।

South China Morning Post की रिपोर्ट के अनुसार जब चीन ने 2013 से 2016 के बीच इन द्वीपों का निर्माण शुरू किया था, तब कई टन रिफ को बर्बाद कर उन्हें इन द्वीपों के नींव में लगाया था। अब यही रिफ स्पंज में तब्दील हो रहे है जिससे इन द्वीपों के डूबने के आसार बढ़ गए हैं ।

वर्ष 2013 में सात कृत्रिम द्वीपों को चीन ने नियंत्रित कर उन पर मिलिट्री बेस तथा हवाई पट्टी बनाई जिससे अमेरिका से युद्ध की स्थित में दक्षिण चीन सागर पर उसका प्रभुत्व बना रहे। नए बंदरगाह और रिसप्लाई में मदद मिलने के बाद चीन इस क्षेत्र में एक तरह से अजय हो जाता और वह अन्य देशों के भी भागों पर भी अतिक्रमण करने की योजना में लग जाता।

2014 में चीन ने वियतनाम के विशेष आर्थिक क्षेत्र में एक ऑयल प्लेटफॉर्म तैनात किया था, जिससे चीनी और वियतनामी सेना के बीच गतिरोध पैदा हुआ था।लेकिन अब कुछ भी चीन के रास्ते नहीं जा रहा है।

पहले तो पड़ोसी देशों पर से China का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और वे China के खिलाफ एक हो रहे हैं तो वहीं अमेरिका जापान भारत और ऑस्ट्रेलिया मिल कर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को China के प्रभाव से निकालने में लगे हैं। 2016 में तो एक ट्रिब्यूनल ने international arbitration ruling में इन द्वीपों पर चीन के दावे को खारिज कर इंडोनेशिया के पक्ष में फैसला सुनाया था। बता दें कि फिलीपींस ने 2013 में ही ट्रिब्यूनल के सामने चीन के बढ़ते कदम को लेकर गुहार लगाई थी। वर्ष 2016 में फैसला आने के बाद भी और यह साबित होने के बाद भी कि China United Nations Convention on the Law of the Sea नहीं मान रहा, ड्रैगन ने किसी की नहीं सुनी।

पर अब China का अपना बनाया हुआ कृत्रिम द्वीप भी ढहने के कगार पर हैं। China द्वारा खर्च किया गया धन उसी समुद्र में डूब सकता है जिसपर वह अपना दावा करता है। यह विडंबना ही है कि चीन ने पांच बिलियन डॉलर से अधिक खर्च कर इन द्वीपों को बनाकर अमेरिका से अधिक ताकतवर दिखने की कोशिशें लेकिन अमेरिका को तो कुछ नहीं हुआ लेकिन इन द्वीपों की नींव अब हिल चुकी है।

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