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पंजाब निकाय चुनाव: कांग्रेस ने किया BJP का सूपड़ा साफ, जानिए आम आदमी पार्टी का क्‍या है हाल?

चंडीगढ़
पंजाब निकाय चुनाव के नतीजों में कांग्रेस की बल्‍ले-बल्ले हो गई है। पार्टी ने 53 साल बाद बठिंडा नगर निगम में जीत दर्ज कर ली है। अब कांग्रेस को चार नगर निगमों में जीत मिली है जबकि तीन अन्य नगर निगमों में आगे हैं। अधिकारियों ने बताया कि बठिंडा, कपूरथला, होशियारपुर एवं पठानकोट नगर निगमों में कांग्रेस को जीत मिली है जबकि पार्टी बटाला, मोगा एवं अबोहर नगर निगम में आगे चल रही है।

बड़ी दावेदार बनकर उभर रही आप

आम आदमी पार्टी ने बटाला में तीन सीटों पर बढ़त ले रखी है। पार्टी ने होशियारपुर में भी तीन सीटों पर लीड हासिल की है। मोगा में AAP ने चार सीटों पर बढ़त बना रखी है। पार्टी पहली बार निकाय चुनाव लड़ रही है। प्रदेश निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को मोहाली नगर निगम के दो मतदान केंद्रों पर पुनर्मतदान के निर्देश दिये थे। इसलिये इस पूरे नगर निगम में मतों की गिनती का काम गुरुवार को किया जाएगा।

109 नगर परिषदों और पंचायतों के लिए चुनाव
ध्यान रहे कि पंजाब के आठ निगमों के 109 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में चुनाव के लिए मतदान रविवार को हुए थे। इस वोटिंग में 71.30 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। पिछली बार 2015 में जब 122 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के चुनाव हुए थे तब 78.60 प्रतिशत मतदान हुए थे। यानी, 2015 के मुकाबले 2021 में 7.21 प्रतिशत कम वोटिंग हुई।

इस बार अकाली दल को हुए नुकसान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2015 में अकेले शिरोमणि अकाली दल ने 34 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में अपना अध्यक्ष बनवाया था। उस वक्त अकाली दल का बीजेपी के साथ गठबंधन भी था और तब दोनों दलों ने मिलकर 27 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में संयुक्त रूप से अध्यक्ष बनाए थे। वहीं, अकेले बीजेपी की बात करें तो उसे आठ नगर परिषदों में जबकि कांग्रेस को पांच में अपना अध्यक्ष बनाने में सफलता मिली थी।

नतीजों के मायने

आज के नतीजे को राज्य में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुआई की जीत माना जा सकती है। हालांकि, कुछ राजनीतिक पंडित इसे कृषि कानूनों के खिलाफ केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ नाराजगी के तौर पर देख रहे हैं। अकाली दल ने कृषि कानूनों के विरोध में केंद्र की एनडीए सरकार और बाद में गठबंधन से भी नाता तोड़ लिया था। उसे बीजेपी के साथ रहने में नुकसान होने का डर था, लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि अकाली की अलग होने की रणनीति भी काम नहीं आई।

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