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पत्रकारिता का पतन : देश के अन्नदाताओं को ‘डकैत’ लिख रहे दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संपादक!

गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसक घटनाओं के बाद एक बार फिर पत्रकारिता का पतन देखने को मिल रहा है।

कई पत्रकार हमेशा की तरह सुरक्षा व्यवस्था के मामले में सरकार की नाकामी पर सवाल खड़े करने के बजाए अपने हक़ के लिए लड़ रहे प्रदर्शनकारियों को ही कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।

ऐसे ही पत्रकारों में एक नाम दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संपादक एलपी पंत का है, जिन्होंने सारी हदें पार करते हुए किसानों के लिए बेहद अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया है। उन्होंने किसानों को “डकैत” तक बता दिया है।

उन्होंने ट्वीट कर कहा, “दिल्ली पुलिस से दिल्ली वालों की अपील… डकैतों से बॉर्डर खाली कराइए…!”

किसानों के ख़िलाफ़ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने पर सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने आपत्ति जताई है।

सौरभ यादव नाम के एक फेसबुक यूज़र ने पंत के ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “अबतक सोचता था कि गलत को गलत ना बोलना किसी की व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है इसलिए उस पर दवाब नहीं डालना चाहिए”।

सौरभ ने लिखा, “लेकिन पुराने जमाने में धूर्त लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता था जिससे लोग शर्मिंदा होकर सही रास्ते पर आ जाएं अब क्यों नहीं होना चाहिए ऐसा? ये महाशय दैनिक भास्कर के संपादक हैं और कल से लगातार किसानों को डकैत, दंगाई, भेड़िए कह रहे हैं”।

पंत ने जिस तरह से प्रदर्शनकारी किसानों को डकैत की संज्ञा दी है उससे पता चलता है कि वह दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसक घटनाओं के लिए सीधे तौर पर सभी प्रदर्शनकारी किसानों को ज़िम्मेदार मानते हैं।

लेकिन क्या उनके मानने से वह सारे किसान भी कसूरवार हो जाएंगे जो इस घटना की आलोचना कर रहे हैं?

पंत आखिर उन किसानों की बात क्यों नहीं सुन रहे हैं, जो इस बात का दावा कर रहे हैं कि दीप सिद्धू के उकसाने पर कई किसान गुमराह हो गए और लाल किले के अंदर घुस गए। अगर वह सच में ये चाहते हैं कि दिल्ली में हिंसा न भड़के तो उन्हें हिंसा के लिए उकसाने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई की मांग करनी चाहिए।

उन्हें दिल्ली पुलिस से अपील करनी चाहिए कि दीप सिद्धू जैसे लोगों को तत्काल प्रभाव से गिरफ्तार करे और उससे पूछताछ कर हिंसा की साज़िश का पता लगाए।

वह ऐसा करने के बजाए तमाम नागरिकों को मिले शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को रौंदने की अपील कर रहे हैं। आख़िर वह ऐसा क्यों कर रहे हैं?

इस सवाल का जवाब शायद कांग्रेस और किसान नेताओं के उन आरोपों से मिल सकता है, जिसमें ये दावा किया जा रहा है कि हिंसा को भड़काने की सरकार ने साज़िश रची थी।

किसान नेता ये आरोप इसलिए भी लगा रहे हैं क्योंकि हिंसा को भड़काने में दीप सिद्धू का नाम काफी आगे है और दीप सिद्धू पहले बीजेपी के काफी करीबी रह चुके हैं।

पंत जिस तरह से पूरे किसान आंदोलन को ही ख़त्म करने की बात कर रहे हैं उससे तो ये पता चलता है कि वह सरकार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं!

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