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बहुत बड़ा खुलासा : राजीव गांधी ने 1986 में नहीं खुलवाया था राम मंदिर का ताला !

राम मंदिर के शिलान्यास के दिन अचानक से कांग्रेस राम नाम की माला जपने लगी थी. कांग्रेस के कई नेताओं ने इस शिलान्यास का श्रेय लेने के लिए ये तक कहा कि राजीव गांधी की वजह से ही ये मंदिर बन पा रहा है. अगर वे मंदिर का ताला नहीं खोलते तो ये मंदिर नहीं बन पाता. ये दावा कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे कई नेताओं के साथ ही कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से भी किया गया था. इसके बाद इस मुद्दे पर कांग्रेस में दो फाड़ भी हुए कई नेताओं ने आलाकमान से इन नेताओं की शिकायत की और राम मंदिर पर पार्टी का स्टैंड बदलने को लेकर आगाह भी किया. मुस्लिम संगठनों ने भी सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी को कभी न वोट देने की धमकी भी दी. उसके बाद कांग्रेस ने अपने ट्विटर हैंडल से उन ट्वीट्स को डिलीट भी कर लिया. मामला आया गया हो गया था.

लेकिन अब फिर से इस मामले में एक नया मोड़ आ गया है. दरअसल कांग्रेस ने जिस राम मंदिर के ताले को खोलने का श्रेय राजीव गांधी को दिया था. अब ये बात पता चल रही है, कि राजीव गांधी ताला खोलने के पक्ष में ही नहीं थे और उन्हें इस बात की जानकारी भी नहीं थी. ताला उनकी मर्जी के बगैर खोला गया था और उसकी जानकारी उन्हें बाद में दी गई थी, जिससे वे बेहद नाराज़ हो गए थे.

जीहां फरवरी 1986 में रामजन्मभूमि का ताला खोलने से जुड़े घटनाक्रम की जानकारी राजीव गांधी को नहीं थी. ये दावा एक नई किताब में किया गया है जिसे राजीव गांधी के करीबी दोस्त वजाहत हबीबुल्लाह ने लिखा है. जम्मू-कश्मीर कैडर के आईएएस हबीबुल्लाह, उस वक्त राजीव गांधी के पीएमओ में थे.

‘टेल-ऑल’ संस्मरण ‘माई इयर्स विद राजीव गांधी ट्राइम्फ एंड ट्रेजडी’ हबीबुल्लाह की यही वो किताब है, जिसे वेस्टलैंड पब्लिकेशंस की ओर से प्रकाशित किया जा रहा है. हबीबुल्लाह की किताब के इसी साल अक्टूबर में आने की उम्मीद है. इसी किताब में वजाहत हबीबुल्ला ने ये दावा किया है. उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री से तब पूछा कि क्या वे ताला खोलने से जुड़े इन फैसलों में शामिल थे, तो राजीव का जवाब त्वरित और सीधा था-

“किसी सरकार का ये काम नहीं होता कि वो पूजा स्थलों के कामकाज तय करने जैसे मामलों में दखल दे. मुझे इस घटनाक्रम का तब तक नहीं पता था, जब तक आदेश पास होने और उस पर अमल होने के बाद तक मुझे बताया नहीं गया था.”
तब राजीव से हबीबुल्लाह ने ये भी पूछा था कि आप प्रधानमंत्री थे फिर भी आपको पता नहीं था? इस पर राजीव गांधी ने जवाब देते हुए कहा था, कि “मैं असल में था. फिर भी मुझे इस कार्रवाई के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी , और मैंने वीर बहादुर सिंह से स्पष्ट करने को कहा था. मुझे संदेह है कि ये अरुण नेहरू और फोतेदार थे जो जिम्मेदार थे, लेकिन मैं ये वैरीफाई करा रहा हूं. अगर यह सच है तो मैं कार्रवाई करने पर विचार करूंगा.”

आपको बता दें, कि वीर बहादुर सिंह उस वक्त यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री थे, जिनकी निगरानी में और उनके आदेश के बाद ही मजिस्ट्रेट ने ये फैसला लिया था. वजाहत हबिबुल्ला ने किताब में बताया है, कि उनकी ये बातचीत सितंबर 1986 में बोइंग विमान के अंदर हुई थी. वे पीएम के केबिन में राजीव के सामने बैठे थे और सूखे की मार झेल रहे गुजरात के लिए दौरे पर थे.

आपको ये भी बता दें, कि वजाहत हबीबुल्ला ने दावा किया है, कि राजीव गांधी ने तब इसके लिए जिम्मेदार मानते हुए अपने चचेरे भाई अरुण नेहरू के खिलाफ कार्रवाई की थी और नवंबर 1986 में उन्हें आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री के पद से हटा दिया था. मतलब किताब में किए गए दावों को माने, तो मंदिर का ताला खोलने में राजीव गांधी की कोई भूमिका नहीं थी, बल्कि वे इसके विरोध में थे.

अब सवाल ये, कि ये किताब और ये दावा अब और इतने दिनों के बाद क्यों किया जा रहा है? अगर वजाहत को ये पहले से जानकारी थी, तो उन्होंने इसे पहले सार्वजनिक क्यों नहीं किया? वे पहले भी टीवी डिबेट में बैठते रहे हैं. और इस मुद्दे पर कई चर्चाएं भी हुई लेकिन कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया. दूसरा राजीव गांधी के दोस्त रहे कमलनाथ को भी ये पता नहीं था ये बड़ी हैरान करने वाली बात है. कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस का राम मंदिर पर श्रेय लेने का दांव उलटा पड़ते देख उसे संभालने के लिए ये शिगुफा छोड़ा जा रहा है? क्योंकि मुस्लिम समाज इस दावे के बाद से कांग्रेस से खफा हो गया है. आने वाले दिनों में यूपी, बिहार, बंगाल में चुनाव होने हैं और इन राज्यों में मुस्लिम वोटरों की भरमार है. इसलिए कहीं कांग्रेस का ध्यान उन वोटरों की तरफ तो नहीं है. हो जो भी, अगर ये दावा सच है, तो आज के बाद राम मंदिर पर श्रेय लेने वाली कांग्रेस अब ये नहीं कह पाएगी कि मंदिर का ताला उसने खोला था इसलिए मंदिर बन रहा है.

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