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बिहार का चुनाव : शागिर्द से शिकस्त पर ऐसा बौखलाया ये बाहुबली, बदला लेने को बम से उड़वा दिया सियासी चेला

छपरा :  बिहार विधानसभा चुनाव 2020 को लेकर राजनीतिक तपन अपने चरम पर है। आप सोच रहे होंगे कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए तपन जैसे शब्द क्यों प्रयोग किए गए हैं। दरअसल, बिहार की राजनीति किसी गरमी से कम नहीं होती है। यहां चुनाव में जन समर्थन के साथ पैसा और बाहुबल का भी खेल देखने को मिलता है। चुनावी सरगर्मी के बीच हम आज राजनीति के एक ऐसे गुरु की बात करेंगे जिसे अपने ही शागिर्द से हार मिली। बदले की आग में उसने अपने शागिर्द की ही हत्या कर दी।

अपने सियासी गुरु को शिकस्त देना अशोक सिंह को पड़ा भारी

बदले की आग में शागिर्द को विधायक बने हुए छह महीने भी नहीं हुए थे कि उसके सियासी गुरु ने बम से उड़ाकर उसकी हत्या करवा दी थी। इस विधायक का नाम है अशोक सिंह। जो किसी जमाने में बाहुबली राजनेता प्रभुनाथ सिंह के शागिर्द थे और बाद में उन्हें ही चुनावी जंग में शिकस्त दे दी। माना जाता है कि इस हार के एवज में प्रभुनाथ सिंह ने अशोक सिंह पर बम से हमला करवाकर उनके चिथड़े करवा दिए थे।

वह छपरा के कहलाते ‘नाथ’

प्रभुनाथ सिंह वह राजनेता रहे हैं, जिनका किसी जमाने में बिहार के सारण में अपनी सरकार थी। जिसे आवाम छपरा का नाथ कहती थी। सियासत का वह प्रभुनाथ इन दिनों विधायक अशोक सिंह हत्याकांड मामले में जेल की कालकोठरी में रातें गिन रहे हैं। सजा सुनाने के दौरान हजारीबाग कोर्ट में पीड़ित पक्ष के वकील ने टिप्पणी की थी कि प्रभुनाथ सिंह ने कानून व्यवस्था को कभी समझा ही नहीं, लेकिन कोर्ट ने इसे सबकुछ समझा दिया।बाहुबल के दम पर 30 साल सियासत में बने रहे
प्रभुनाथ सिंह बिहार की सियासत का वह नाम हैं जो शिखर पर पहुंचे, लेकिन उसे अपने ही शागिर्द अशोक सिंह से शिकस्त मिली। प्रभुनाथ सिंह ने कभी लालू प्रसाद यादव का हाथ थामा तो कभी नीतीश कुमार के कैंप की शोभा बढ़ाते हुए देखे गए। लेकिन सत्ता और बाहुबल के नशे में वह भूल गए कि कानून से बड़ा कोई नहीं है। सिमेंट कारोबारी प्रभुनाथ सिंह बाहुबल के दम पर करीब 30 साल सत्ता में बने रहे। छपरा के मशरख विधानसभा सीट से पहली बार प्रभुनाथ सिंह निर्दलीय 1985 में चुनाव जीते। विधायक बनने से पहले प्रभुनाथ सिंह पर आरोप थे कि उन्होंने मशरक के तत्कालीन विधायक रामदेव सिंह काका की हत्या करवाई है। 1990 में प्रभुनाथ सिंह जनता दल के टिकट पर फिर से विधानसभा पहुंचे। इस दौर में अशोक सिंह प्रभुनाथ सिंह के साया बने हुए थे। लोग कहते हैं कि अशोक सिंह ही प्रभुनाथ सिंह के असल शागिर्द थे।
शागिर्द से मिली हार को पचा नहीं पाए छपरा के ‘नाथ’
प्रभुनाथ सिंह ने कभी सोचा भी ना था कि अशोक सिंह यूं उनके शागिर्द बनकर उनकी राजनीतिक जमीन खिसका देंगे। जनता दल ने जब अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की तो प्रभुनाथ सिंह भौचक्क रह गए। पार्टी ने उनके शागिर्द कहे जाने वाले अशोक सिंह को मशरख से प्रत्याशी बनाया। अपने चेले के सामने अपनी ताकत को दिखाने के लिए प्रभुनाथ सिंह बिहार पीपुल्स पार्टी के टिकट पर चुनाव में उतरे, लेकिन काफी धनबल खर्च करने के बाद भी उन्हें करारी हार मिली। इस तरह अशोक सिंह छपरा के प्रभु की कुर्सी हथियाने में कामयाब रहे। इसके बाद अशोक सिंह पटना में रहकर अपना राजनीतिक कद बढ़ाने में जुट गए। वहीं उनके कथित गुरु प्रभुनाथ सिंह इस हार में तिल-तिल कर जलने लगे। यह वह वक्त था जब प्रभुनाथ सिंह ने समझौते को अपनाया, लेकिन साथ ही बदले के लिए सही मौके की तलाश करते रहे। 3 जुलाई 1995 को अशोक सिंह को विधायक बने हुए तीन महीने भी नहीं हुए थे कि पटना आवास पर उन्हें बम से उड़ा दिया गया। जिस वक्त अशोक को बम से उड़ाया था उस वक्त प्रभुनाथ सिंह के भाई दीनानाथ सिंह भी मौके पर मौजूद थे। इससे साफ हो गया कि इस वारदात को किसके इशारे पर अंजाम दिया गया।
नीतीश के सहयोग से संसद पहुंचे प्रभुनाथइसके बाद लगा कि छपरा में प्रभुनाथ सिंह का एकक्षत्र राज्य हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। इस हत्याकांड के बाद प्रभुनाथ सिंह का पतन शुरू हो गया। अशोक सिंह की पत्नी चांदनी कानून के सामने इंसाफ के लिए डटी रहीं। कोर्ट की हर तारिख पर उनका हौसला देखते ही बनता था। इसी बीच प्रभुनाथ सिंह समता पार्टी में चले गए और 1998 के लोकसभा चुनाव में महाराजगंज लोकसभा सीट से जीतकर संसद पहुंच गए।
लालू के साथ भी गए प्रभुनाथसांसद होने के बावजूद यह वह दौर था जब प्रभुनाथ सिंह पर कई मुकदमें दर्ज हुए। कभी डीएम को धमकाने के मामले में तो कभी चुनाव अयोग पर कॉमेंट करने को लेकर। प्रभुनाथ सिंह इस दौरान अपने ऊपर लगे दाग को हटाते रहे। इसी दौरान प्रभुनाथ सिंह सबूतों के अभाव में विधायक रामदेव सिंह काका हत्याकांड में बरी हो गए। इसी बीच वह नीतीश से अलग होकर लालू के साथ आ गए। प्रभुनाथ के सहारे लालू प्रसाद यादव राजपूत वोट को अपने पाले में करना चाहते थे, लेकिन इसमें निराशा हाथ लगी। महाराजगंज उपचुनाव में प्रभुनाथ सिंह आरजेडी के टिकट पर जीते।
बेटे और भाई को भी बनवाया विधायकइसी बीच प्रभुनाथ सिंह अपने सियासी रुतबे और बाहुबल के दम पर भाई केदारनाथ को मशरक और बनिया विधानसभा सीट से तीन बार विधायक बनवाने में सफल रहे। इसके अलावा 2014 के उपचुनाव में छपरा सीट से बेटे रणदीप को भी विधायकी के चुनाव में जीत दिलवाया। लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में बेटे की कारारी हार हुई। इसके बाद से प्रभुनाथ सिंह का सियासी पतन शुरू हो गया। क्योंकि कोर्ट में यह दबंग पूरी तरह घिरता चला गया।
अब सलाखों के पीछे कट रही जिंदगी

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