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बिहार चुनाव परिणाम के बाद अगले 6 महीने रहने वाले हैं खास, जानें कारण

नई दिल्ली
पिछले छह महीनों से बिहार चुनाव को लेकर जो सियासी तपिश महसूस की जा रही थी। वहां के नतीजे आने के बाद वो खत्म होने की बजाय और बढ़ जाएगी। दरअसल, अगले छह महीने सियासी नजरिये से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। इस दरम्यान वेस्ट बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। तमाम पार्टियों का अब सारा फोकस इन्हीं राज्यों पर रहेगा। ये राज्य एक तरह से सियासी रणभूमि में तब्दील हो जाएंगे, जिसका असर पूरे देश के राजनीतिक परिदृश्य में महसूस किया जा सकेगा।

वेस्ट बंगाल : BJP के लिए करो या मरो की स्थिति
2014 से लेकर अब तक बीजेपी ने भले ही कामयाबी के नए कीर्तिमान बनाए हों, लेकिन वेस्ट बंगाल में सत्तारूढ़ होना उसके लिए अभी भी एक ख्वाब बना हुआ है। इस ख्वाब को पूरा होते देखने के लिए बीजेपी में इतनी बेचैनी नहीं होती, अगर उसे वहाां सत्ता की उम्मीद न दिख रही होती। पिछले कुछ सालों में बीजेपी ने इस राज्य में आक्रामक तेवर के साथ न सिर्फ अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वह टीएमसी के बाजू दर बाजू खड़ी दिखी। 42 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में अगर सत्तारूढ़ टीएमसी को 22 सीट मिलीं थी तो बीजेपी महज उससे चार सीट ही पीछे रही थी। कुल पड़े वोट में उसका 40 प्रतिशत हिस्सा था। यह प्रदर्शन इसलिए और भी ज्यादा उल्लेखनीय हो जाता है कि जिस राज्य को वामदलों का गढ़ माना जाता है, उन्हें इस चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली। कांग्रेस को महज दो सीट पाकर ही संतुष्ट होना पड़ा। विधानसभा सीटवार इन नतीजों का अगर विश्लेषण किया जाए तो बीजेपी को 122 सीटों पर बढ़त हासिल थी और टीएमसी को 166 पर। यानी वहां की लड़ाई टीएमसी और बीजेपी के बीच सिमटती दिखने लगी है। बीजेपी को लगता है कि इससे अच्छा मौका, उसके पास कोई दूसरा नहीं हो सकता।

असम : करवट लेती क्षेत्रीय राजनीति से सबमें बेचैनी
अस्मिता के सवाल पर असम में नई राजनीतिक इबारत लिखने की परंपरा पुरानी है। 80 के दशक में घुसपैठियों को बाहर करने के सवाल पर खड़े हुए छात्र आंदोलन और उस आंदोलन से निकली असम गण परिषद के सत्ता तक पहुंचने की कहानी अभी बहुत ज्यादा पुरानी नहीं हुई है कि एक बार फिर वहां क्षेत्रीय राजनीति में उबाल आता दिख रहा है। पिछले चुनाव में बीजेपी ने पहली बार असम को जीतकर न केवल इतिहास रचा था बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों में सत्ता तक पहुंचने का रास्ता भी तैयार किया था। अब बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी सत्ता बनाए रखने की होगी। अगर वह ऐसा नहीं कर पाई तो पिछली कामयाबी को उसके लिए इत्तेफाक माना जाएगा और जो असम पूर्वोत्तर राज्यों में उसके लिए एंट्री प्वाइंट बना था, वह एग्जिट प्वाइंट भी बन सकता है। इस बीच वहां सीएए के मु्द्दे पर खड़े हुए आंदोलन के बाद फिर एक नई पार्टी-असम जातीय परिषद अस्तित्व में आ गई है। इसके पीछे वही ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और असम जातीयतावादी छात्र परिषद हैं, जिन्होंने कभी असम गण परिषद का गठन किया था। यहीं से राज्य के सियासी समीकरण भी बदलने की संभावना देखी जा रही है। वहां पहले से भी कई क्षेत्रीय दल हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में भी एक गठबंधन तैयार करने की कवायद शुरू हो गई है।

तमिलनाडु: नए प्रयोगों का गवाह बनेगा यह राज्य
दक्षिण भारत का यह राज्य इस बार कई नए राजनीतिक प्रयोगों का गवाह बन सकता है। वैसे यह राज्य लंबे समय से दो क्षेत्रीय पार्टियों की राजनीति तक ही सिमटा रहा है। एक-एआईए डीएमके और दूसरा-डीएमके। इन्हीं दो पार्टियों के बीच सत्ता की अदला-बदली होती आई है। कांग्रेस और बीजेपी भी इन्हीं क्षेत्रीय दलों की बैसाखी के सहारे यहां चलते आए हैं। एक बात जो ध्यान में रखने लायक है, वह यह है कि इस राज्य का राजनीतिक नेतृत्व फिल्मी दुनिया से निकलता आया है। यहां का चुनाव इस बार यहां के दो बेहद लोकप्रिय फिल्मी सितारों की राजनीति में एंट्री की वजह से खास माना जा रहा है। इनमें से एक हैं रजनीकांत , जो यहां भगवान की तरह पूजे जाते हैं। उन्होंने अभी तक डायरेक्ट राजनीति में एंट्री नहीं की, वे पर्दे के पीछे से दलों का समर्थन करते रहे हैं लेकिन इस बार उनके सीधे तौर पर पार्टी बनाकर राजनीति में आने की संभावना है। तमिलनाडु के अलग-अलग शहरों में रजनीकांत के लिए उनके समर्थकों की ओर से अभी नहीं तो कभी नहीं के पोस्टर लगा दिए गए हैं। उधर, दूसरे फिल्म स्टार कमल हसन ने खुलकर एलान कर दिया है कि वह 2021 के चुनाव में उतरेंगे। उन्होंने अपनी अलग पार्टी भी बना ली है। वह रजनीकांत के साथ गठबंधन के लिए प्रयासरत हैं।

केरल : अस्तित्व बचाने की होगी लड़ाई
यहां का मुकाबला रोचक तो होगा लेकिन सियासी तस्वीर दूसरे राज्यों से बिल्कुल अलग है। यहां एलडीएफ और यूडीएफ दो मुख्य गठबंधन हैं। सत्ता की लड़ाई इन्हीं के बीच है। देश के दूसरे राज्यों में इन गठबंधनों में शामिल दल बीजेपी को रोकने के लिए एक साथ आने से गुरेज नहीं करते, लेकिन केरल में उन्हें साथ आना इसलिए गंवारा नहीं कि इसके जरिए उनके अस्तित्व को खतरा बन सकता है। बीजेपी फिलहाल यहां बड़ी ताकत के रूप में नहीं उभर पाई है। वामदलों ने अभी बिहार में कांग्रेस के साथ महागठबंधन का हिस्सा बनकर चुनाव लड़ा है और वेस्ट बंगाल में भी वह कांग्रेस के साथ गठबंधन करने जा रहे हैं लेकिन केरल में दोनों अलग-अलग पालों में खड़े हैं। दूरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों जब सोनिया गांधी द्वारा विपक्ष के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की गई थी तो उसमें केरल की वाम मोर्चा सरकार के मुख्यमंत्री को नहीं बुलाया गया था। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पहली बार विधानसभा की एक सीट पर जीत दर्ज की थी। केंद्र सरकार ने गवर्नर के रूप में जब आरिफ मुहम्म्द खान को यहां नामित किया तो उसे केरल की राजनीति से ही जोड़कर देखा गया। वैसे बीजेपी के लिए यहां कुछ गंवाने का खतरा नहीं है।

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