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बिहार : सैनिटाइजर-स्कैनर खरीदने में सरकारी स्कूलों का कोष खत्म, सिर्फ आदेश और मास्क दी सरकार

स्कूल खोलने की हरी झंडी ने बिहार के सरकारी स्कूलों में छात्रों का कोष खाली कर दिया है। राज्य में आठवीं से ऊपर के स्कूल सोमवार से खुल रहे हैं। सरकार ने इन स्कूलों के लिए कोरोना को देखते हुए कई गाइडलाइन जारी किये हैं, जिनके पालन के लिए स्कूलों को अच्छी-खासी राशि खर्च करनी पड़ेगी। सरकार ने इसके लिए स्कूलों को कोई अतिरिक्त बजट नहीं दिया है। सिर्फ जीविका के माध्यम से प्रत्येक छात्र के लिए दो-दो मास्क की व्यवस्था की है।

मीडिया  ने जब इसकी पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। स्कूलों को कोरोना गाइडलाइन का पालन करने के लिए सामग्री छात्र कोष की मदद से खरीदनी पड़ी है। जिन स्कूलों में छात्र कोष में पैसे थे, उन्होंने तो सामग्री खरीद ली, लेकिन जिन स्कूलों के छात्र कोष में पैसे नहीं हैं, उनके सामने दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है।

सरकार ने सिर्फ आदेश और मास्क दिया
बिहार सरकार के कोविड गाइडलाइन का पालन स्कूलों को हर हाल में करना है क्योंकि यह खतरनाक संक्रमण से लड़ाई का मामला है। आदेश के बाद ही प्रदेश के सभी जिलों के जिला शिक्षा पदाधिकारियों ने स्कूलों को आदेश के साथ सरकार की कोविड गाइडलाइन को भी भेज दिया। इस गाइडलाइन के हिसाब से स्कूलों को क्लास को सैनिटाइज करने के लिए सैनिटाइजेशन मशीन, थर्मल स्कैनर, हैंड वॉश के लिए लिक्विड, वॉश रुम की सफाई के लिए केमिकल के साथ सैनिटाइजर की व्यवस्था करनी है। सरकार की तरफ से स्कूलों को हर छात्र के हिसाब से दो-दो मास्क भेज दिया गया है। इसकी जिम्मेदारी भी जीविका और स्वास्थ्य विभाग को दी गई है।

अलग से बजट होता, तो नहीं खाली होता छात्रों का कोष
सरकारी स्कूलों में बच्चों की फीस में विभिन्न मद का पैसा लिया जाता है। इसमें स्पोर्ट्स शुल्क, परीक्षा शुल्क, सफाई व साज सज्जा शुल्क शामिल है। फीस से जो पैसा बचता है, स्कूल उसे छात्रों के कोष में रखती है। इससे स्कूल में स्पोर्टस के सामानों की खरीद के साथ छात्रों की बौद्धिक क्षमता के विकास के लिए सामान खरीदे जाते हैं। कोविड गाइडलाइन के लिए सामान खरीदने में ही स्कूलों ने इस बजट को साफ कर दिया है।

मीडिया  ने जब पटना, गया, गोपालगंज, छपरा के साथ अन्य जिलों के 25 से अधिक स्कूलों के प्रधानाध्यापकों से बात की तो नाम व पहचान न बताने के आग्रह पर बताया गया कि सरकार की तरफ से कुछ नहीं दिया गया है। एक छात्र को दो मास्क दिया जाएगा, यही धुलकर पहनना है। स्कूल के लिए तो कोई बजट ही नहीं है। सब कुछ स्थानीय स्तर पर खरीदना है, वह भी विद्यालय के ही फंड से। कई स्कूलों ने तो बताया कि फंड ही नहीं है, जितना कोविड से लड़ाई को लेकर डिमांड किया गया है।

इस मसले पर पटना के जिलाधिकारी डॉ. चंद्रशेखर सिंह का कहना है कि स्कूलों को हर हाल में कोविड गाइडलाइन का पालन करना है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर उन्हें अपने फंड से खरीदारी करने का निर्देश दिया गया है। मास्क, स्वास्थ्य विभाग और जीविका की तरफ से दिया जा रहा है।

जहां छात्रों की संख्या कम, वहां बड़ी चुनौती
प्रधानाध्यापकों ने बताया कि जिन विद्यालयों में छात्रों की संख्या कम है, वहां फीस भी कम आती है, जिससे छात्र कोष में अधिक पैसा नहीं होता है। अब एक साथ 10 हजार रुपए की खरीद भारी पड़ रही है। पटना के एक प्रधानाध्यापक ने कहा कि अगर विद्यालय के कोष में पैसा नहीं है, तो खुद पैसा लगाकर सामान खरीदना होगा, क्योंकि विभाग की तरफ से कुछ नहीं दिया जा रहा है।

10 हजार रुपया से अधिक का है बजट
प्रधानाध्यापकों के मुताबिक थर्मल स्कैनिंग मशीन की कीमत 35 सौ से 4 हजार रुपए तक है। क्लास को सैनिटाइज करने वाली मशीन भी 4 हजार से नीचे नहीं मिल रही है। सैनिटाइजर के लिए भी पांच लीटर का पांच सौ रुपया लग रहा है। हैंड वॉश के लिए दो सौ रुपए का अलग खर्च है। टॉयलेट के साथ अन्य साफ सफाई में भी पांच सौ रुपए का खर्च है। सैनिटाइजर और हैंडवॉश लिक्विड के साथ साफ-सफाई का खर्च तो हर माह होगा। एक प्रधानाध्यापक ने तो बताया कि थर्मल स्कैनर की बैटरी भी बहुत जल्दी खत्म हो जाती है, यह भी एक खर्च लगातार होगा।

ऐसे समझें स्कूल का बजट
स्कूल में सामान्य छात्रों की फीस 240 रुपए है, जबकि दलित और SC/ST से 160 रुपए लिया जाता है। यह फीस पूरे एक साल की होती है, जिसे दो बार में लिया जाता है। इसे छमाही और सालाना फीस कहा जाता है। हर छात्र की फीस से आए धन को दो मद में रखा जाता है। एक विकास कोष और दूसरा छात्र कोष के नाम से जाना जाता है।

स्कूल का विकास कोष
विकास कोष विद्यालय का अलग अकाउंट होता है। छात्रों से 40-40 रुपए साल में दो बार लिया जाता है। एक वर्ष में एक छात्र से 80 रुपए लिए जाते हैं। प्रत्येक माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय में क्षेत्रीय विधायक की अध्यक्षता में एक विद्यालय प्रबंध समिति होती है, जिसकी अनुशंसा पर ही विकास कोष की राशि खर्च की जाती है।

स्कूल का छात्र कोष
फीस में ली गई विकास कोष की राशि को छोड़कर, शेष राशि छात्र कोष में जमा होती है। जिसका खर्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक तथा विद्यालय के वरीय शिक्षक के द्वारा किया जाता है। विद्यालय की जरुरतों, जैसे – रजिस्टर, अन्य स्टेशनरी, बिजली, पंखा-बल्ब का भी इसी से खर्चा होता है।

  • 9वीं और 10वीं में मात्र 240 रुपए है शुल्क
  • विकास शुल्क : 80 रुपए (छह माह पर 40-40 रुपए)
  • क्रीडा शुल्क : 8 रुपए (छह माह पर 4-4 रुपए)
  • निर्धन कोष : 4 रुपए (छह माह पर 2-2 रुपए)
  • बिजली कोष : 16 रुपए (छह माह पर 8-8 रुपए)
  • बालचर : 16 रुपए (छह माह पर 8-8 रुपए)
  • परीक्षा शुल्क : 75 रुपए (25 की दर से तीन परीक्षा के लिए)
  • विज्ञान कोष : 16 रुपए (छह माह पर 8-8 रुपए)
  • नामांकन शुल्क : 20 (सिर्फ एक बार 9वीं में)
  • शिक्षक कल्याण कोष : 5 रुपए (वर्ष में एक बार)

SC/ST को 80 रुपए माफ
कुल 240 रुपए के वार्षिक शुल्क में 80 रुपए का विकास शुल्क माफ है। उन्हें सालभर में कुल 160 यानी कि अन्य बच्चों को जहां छह माह पर दो बार 120-120 रुपए देना होता वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के बच्चों को सिर्फ 80-80 रुपए देने हैं।

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