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बीजेपी अगर ऐसे ही तोड़ती रही दोस्ती, तो मोदी का 2024 का सपना चकनाचूर होने की पूरी गारंटी

नई दिल्ली
नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों के विरोध के बीच भाजपा अगली बार में फिर से सत्ता में वापसी कर पाएगा। यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि मौजूदा एनडीए की जो सूरत है वह 2024 के चुनाव परिणाम के आईने में ऐसी दिखेगी कि जिससे भाजपा फिर से सत्ता के शिखर पर चमक उठे। कोरोना संकट के बाद कृषि कानूनों को लेकर एनडीए अकाली दल के रूप में अपना सबसे पुराना सहयोगी गंवा चुका है।

मौजूदा हालात को देखें तो पीएम मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए से जिस तरह से एक के बाद एक सहयोगी दल साथ छोड़ रहे हैं उससे तो भाजपा के 2024 का सपने पर ग्रहण लग सकता है। 2014 से लेकर अब तक 19 दल एनडीए का साथ छोड़ चुके हैं। इसमें सबसे नया नाम राजस्थान के नेता हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का है। हनुमान बेनीवाल ने नए कृषि कानूनों को लेकर एनडीए का साथ छोड़ा है।

दक्षिण का मजबूत सहयोगी छूटा
साल 2018 में एनडीए की बड़ी सहयोगी चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) ने भी एनडीए को अलविदा कह दिया। इससे भाजपा का दक्षिण में एक मजबूत सहयोगी कम हो गया। एक के बाद एक दलों के एनडीए छोड़ने पर शरद पवार ने हाल ही में कहा था कि यदि ऐसा चलता रहा तो जल्द ही एनडीए को धूल चाटनी पड़ सकती है।

‘अब एनडीए में बचा ही क्या है?’
इससे पहले एनडीए के सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल ने भी किसानों के समर्थन में इस धड़े से अपना नाता तोड़ लिया था। पार्टी के सबसे पुराने सहयोगियों में से एक शिवसेना भी महाराष्ट्र में सीएम पद पर मतभेद के बाद एनडीए से अपनी राहें अलग कर ली थी। जब अकाली दल ने एनडीए छोड़ा तो शिवसेना ने उसे एनडीए का आखिरी पिलर बताया था। पार्टी का कहना था कि शिवसेना और अकाली दल के निकलने के बाद से एनडीए में बचा ही क्या है।

बिहार में जेडीयू पर स्थिति साफ नहीं

एनडीए के सबसे बड़े सहयोगी जेडीयू से भी भाजपा के संबंध बहुत अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। अरुणाचल में जिस तरह से जेडीयू के 7 विधायक भाजपा में शामिल हुए उससे स्थितियां पहले से बिगड़ी ही हैं। बिहार में भले ही दोनों दल मिलकर चुनाव लड़े हों लेकिन एनडीए के एक और सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी ने दोनों दलों के बीच मनभेद जरूर पैदा कर दिए हैं।

लोजपा का भविष्य स्पष्ट नहीं
एनडीए का हिस्सा होकर भी बिहार में लोजपा ने जिस तरह से जेडीयू को हरवाने का काम किया इससे जेडीयू भाजपा से ज्यादा खुश नहीं है। वहीं, बिहार में चुनाव के बाद चिराग पासवान का एनडीए में क्या भविष्य होगा इस पर साफ रूप से अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है। राम विलास पासवान की सीट पर सुशील मोदी को राज्य सभा भेज भाजपा ने चिराग को भी संदेश दे ही दिया है।

यूपीए, एनडीए से बाहर की पार्टियों की होगी अहम भूमिका
देश में कई ऐसी राजनीतिक पार्टियां हैं जो न तो यूपीए और ना ही एनडीए का हिस्सा हैं। आजतक-कार्वी इनसाइट्स लिमिटेड सर्वे के मुताबिक ऐसे अन्य दलों के खाते में 30 फीसदी वोट को साथ 129 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। ये समीकरण अगले आम चुनाव में एनडीए के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।

अन्य दलों को 201 सीटें मिलने की संभावना
सर्वे में अन्य दलों में शामिल सपा, बसपा, टीएमसी, आम आदमी पार्टी, पीडीपी, एयूडीएफ, AIMIM, आरएलडी, आजसू, एएमएमके, इनेलो, अकाली दल, टीआरएस, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, टीडीपी सहित तमाम वामपंथी दल शामिल हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि बीजेपी और कांग्रेस के इतर अन्य दलो को संयुक्त रूप से 44 फीसदी वोटों के साथ 201 सीटें मिलने की संभावना है।

2014 में एनडीए में थी शिवसेना, टीडीपी की अहम भूमिका

साल 2014 में जब एनडीए सत्ता में लौटी थी तब शिवसेना और टीडीपी ने क्रमशः 18 और 16 सीटें जीती थी। एनडीए ने 38.4 फीसदी वोटों के साथ 336 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इन दोनों दलों का वोट प्रतिशत क्रमशः 1.8 और 2.6 था। वहीं, अकाली दल ने 4 सीटें जीती थीं। लोजपा के खाते में भी 6 सीटें आई थीं। वहीं, 2019 में शिवसेना ने 2.1 फीसदी वोटों के साथ 16 सीटें जीती थीं। इस बार टीडीपी की खाली जगह को नीतीश के नेतृत्व वाली जेडीयू ने भरा। जेडीयू 16 सीटों के साथ एनडीए की मौजूदा सबसे बड़ी घटक दल है।

अब तक ये दल छोड़ चुके हैं एनडीए का साथ
2014-2016 – हजका, एमडीएमके, डीएमडीके, पीएमके, आरएसपीके, जेएसपी , जेआरएस
2017- स्वाभिमानी पक्ष (महाराष्ट्र)
2018-2019 हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा, एनपीएफ, टीडीपी, जीजेएम, केपीजेपी, रालोसपा, वीआईपी, सुभासपा
2020- शिवसेना, अकाली दल, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी
(बिहार विधानसभा चुनाव के बाद हम और वीआईपी फिर से बिहार में सरकार का हिस्सा हैं।)

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