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बीजेपी के पास बंगाल जीतने का सुनहरा मौका, पर पहले सुलझाने होंगे आंतरिक कलह

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में अब काफी कम वक्त बचा है। पिछले लोकसभा चुनावों में जिस तरह से बीजेपी ने प्रदर्शन किया था उसने बंगाल की राजनीति में बीजेपी को मुख्य विपक्षी दल बना दिया है। बीजेपी ने जितनी तेजी से बंगाल की राजनीति में अपना सिक्का जमाया है उससे ये कहा जाने लगा है कि बंगाल में बीजेपी के सत्ता में आने की संभावनाएं बढ़ गई हैं, लेकिन बीजेपी के लिए आंतरिक गतिरोध और एक बड़े नेता की कमी उसकी जीत की राह में बड़ा रोड़ा है। ऐसे में बीजेपी को यदि जीतना है तो उसे इन मसलों का समाधान करते हुए अपनी चुनावी रणनीति तैयार करनी होगी।

पूरे देश में अपना प्रसार कर रही बीजेपी की नजर काफी पहले से ही पश्चिम बंगाल में ममता के किले पर थी। बूथ स्तर तक पहुंच बनाने में भाजपा काफी हद तक कामयाब भी रही है। 2014-2019 के बीच बीजेपी का वोट प्रतिशत 10-12  प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इस वोट प्रतिशत के दम पर ही बीजेपी ने बंगाल में 2019 लोकसभा चुनावों में 18 सीटें जीतीं थीं। बीजेपी इस पूरी बढ़त के बाद राज्य की राजनीति में दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है। लेफ्ट समेत कांग्रेस को साइडलाइन करते हुए बीजेपी मुख्य विपक्षी दल का तमगा हासिल कर चुकी है।

जीतने की उम्मीद

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनावों की जीत के लिए अपना अभियान छेड़ रखा है। अगर लोकसभा के लिहाज से ही देखा जाए तो वो राज्य की कुल 294 सीटों में से करीब 125 सीटों पर अपनी तगड़ी पहुंच बना चुकी है। बीजेपी का लक्ष्य 2021 में करीब 220 सीटें जीतने का है। आंतरिक सर्वे के आधार पर पार्टी इसकी पूर्ति होने दावा भी कर रही है। वहीं, वोटों के बढ़ते प्रतिशत के तौर पर देखा जाए तो बीजेपी के जीतने की संभावनाएं काफी ज्यादा है, लेकिन बीजेपी की जीत की राह में काफी रोड़े हैं जो इन चुनावों में बीजेपी को पीछे भी ले जा सकते हैं। ऐसे में उसे इन पर विशेष ध्यान देना होगा।

अंदरखाने कई धड़े

पश्चिम बंगाल बीजेपी के संगठन में एक बड़ी समस्या पार्टी का भीतर से कई धड़ों में बंटना है, क्योंकि बीजेपी इस वक्त लगातार अपने संगठन को मजबूत करने पर काम कर रही है। ऐसे में टीएमसी समेत कांग्रेस और लेफ्ट के नेता भी बीजेपी का दामन थाम रहे हैं। बीजेपी भी उन्हें हाथों-हाथ ले रही है लेकिन इसमें सबसे बड़ी मुश्किल इस बात को लेकर भी है कि बीजेपी के ही लोग उन्हें स्थानीय स्तर पर स्वीकार नहीं कर रहे हैं। वो कार्यकर्ता जो कल तक इन नेताओं के खिलाफ कैंपेन कर रहे थे अब इन्हें, उन्हीं के साथ काम करना पड़ रहा है जो कि बेहद ही आश्चर्यजनक स्थिति हैं। इसे वो लोग भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं  जिससे एक आंतरिक असंतोष भी पैदा हो रहा है।

अगर पश्चिम बंगाल के सीएम पद की कुर्सी पर बीजेपी को अपना कब्जा जमाना है तो उसे एक विश्वसनीय चेहरे की आवश्यकता होगी जो कि बंगाल की राजनीति के एक प्रमुख चेहरे यानी ममता बनर्जी के सामने टिक सके। ममता लगभग पिछले 10 सालों से राज कर रही हैं। इस दौरान उनके खिलाफ विरोध तो है लेकिन राज्य की राजनीति में जनता के पास सीएम पद के लिए कोई विक्लप नहीं है। इस स्थिति में बीजेपी पर जनता भरोसा कर सकती है लेकिन सीएम का चेहरा न होना बीजेपी के लिए मुश्किल साबित होगा क्योंकि पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पास कोई बड़ा स्थानीय नेता भी नहीं है।

हालांकि, बीजेपी ने बिना सीएम के चेहरे के कई चुनाव जीते हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कई चुनावों में उसके हारने की वजह भी कोई विश्वसनीय चेहरे का न होना है।

बीजेपी का अपना सर्वे तो उसकी जीत का दावा कर रहा है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर बीजेपी के लिए जनाधार बढ़ने के साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं जो उसके मिशन बंगाल 2021 पर एक ब्रेक लगा सकती है।

बीजेपी को अगर ममता के किले को ढहाना है तो उसे अपने जनाधार को तो मजबूत करना ही होगा, लेकिन एक बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं के आंतरिक असंतोष का सकारात्मक हल ढूँढना भी है। बहराल बीजेपी को पश्चिम बंगाल की जनता के सामने ममता के विकल्प के तौर पर एक विश्वसनीय चेहरा खड़ा करना होगा, जो जनता के बीच ममता को चुनौती दे सके।

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