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भारतीय महासागर में गहरी डुबकी लगाया भारत, नतीजा- चीन को कायदे से समझ आ गई ‘बात’

हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते कदम को रोकने के लिए अब भारत ने तैयारी शुरू कर दी है। यह किसी से छुपा नहीं है कि चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (पीएलएएन) दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर  लेकर दक्षिण अमेरिका में गैलापागोस द्वीपसमूह तक अपने पांव फैला चुका है।  परन्तु अब भारत पेपर ड्रैगन पर लगाम लगाने के लिए तैयार हो चुका है और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में Deep Ocean Mission शुरू करने जा रहा है।

द हिंदू के अनुसार, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया है कि भारत भी एक महत्वाकांक्षी परियोजना “Deep Ocean Mission” शुरू करने जा रहा है, जिसका उद्देश्य पानी के नीचे की खनिजों, ऊर्जा और समुद्री विविधता की खोज करना है।

इस महत्वाकांक्षी कदम के साथ, भारत IOR के अपने विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) या कॉन्टिनेंटल शेल्फ़ का पूरी तरह से दोहन करना चाहता है।

नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि चीन को यह नहीं भूलना चाहिए कि IOR भारत का प्रभाव क्षेत्र है और पेपर ड्रैगन को इस समुद्री स्थान पर किसी भी दुस्साहस से पहले दो बार सोचना चाहिए।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम राजीवन ने कहा कि इस “भविष्यवादी और गेम चेंजर” मिशन के लिए आवश्यक कदम उठाया जा रहा है, और इसे अगले 3-4 महीनों में लॉन्च किए जाने की संभावना है।

यह मिशन लगभग 4,000 करोड़ यानी 539 मिलियन का होगा जिससे भारत IOR में अपने विशाल EEZ पर अधिकार की मुहर लगाने जा रहा है।

राजीवन ने यह भी कहा कि यह मिशन गहरे समुद्र क्षेत्र में विभिन्न तकनीकों को विकसित करने पर भी जोर देगा।  उन्होंने बताया कि इस कदम से आईओआर में भारत की स्थिति मजबूत होगी जहां चीन सहित अन्य शक्तियां भी सक्रिय हैं। इस महत्वाकांक्षी मिशन के साथ, नई दिल्ली वास्तव में IOR में अपनी रणनीतिक का फायदा उठाने की कोशिश कर रह है। बता दें कि  सितंबर 2016 में, भारत ने हिंद महासागर में पॉली-मेटैलिक सल्फाइड (पीएमएस) का पता लगाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सीबेड अथॉरिटी (आईएसए) के साथ अगले 15 वर्षों के लिए अनुबंध किया था।

भारत को इस खोज के लिए मध्य हिंद महासागर में 1,50,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक विशाल क्षेत्र आवंटित किया गया है। इस 15-वर्षीय अनुबंध के तहत, भारत को आवंटित क्षेत्र में विशेष रूप से पीएमएस का पता लगाने का एक औपचारिक अधिकार है।  पीएमएस में महत्वपूर्ण धातुएं जैसे लोहा, तांबा, जस्ता, चांदी, सोना और प्लैटिनम शामिल हैं, और इसलिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।

कई लोगों के लिए, भारत का नवीनतम कदम रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नहीं लग सकता है। परन्तु यहां असली बात यह है कि दिल्ली ने आईओआर में अपने अधिकार का दावा करने के लिए एक ऐसे समय में शुरुआत की है जब भारत सहित कई देश चीनी की गुंडई और विस्तारवाद से जूझ रहे हैं।

इसके अलावा, यह सर्वविदित है कि चीन मछली पकड़ने और अन्य समुद्री संसाधनों पर अपना हक जमाने के लिए आक्रामकता दिखता है। दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के साथ आसियान के सदस्यों के साथ या पूर्वी चीन सागर में जापान के साथ चीन के विवाद मुख्य रूप से समुद्री संसाधनों पर ही केन्द्रित है, जो अनिवार्य रूप से अन्य देशों के समुद्री क्षेत्र में आते हैं। इसी तरह चीन हिंद महासागर में समुद्री संसाधनों का दोहन करना चाहता है।

पिछले साल ही भारतीय नौसेना ने एक चीनी जहाज ‘शी यान 1’ को खदेड़ा था, जो संभवतः एक जासूसी जहाज था तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर के पास भारतीय समुद्री जल में संदिग्ध अनुसंधान गतिविधियों को अंजाम दे रहा था।

अब, अपने EEZ में अपनी रिसर्च गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में कदम उठा कर भारत IOR में चीन को चेतावनी दे रहा है। नई दिल्ली का ड्रैगन के लिए स्पष्ट संदेश है कि आईओआर में आपकी कोई हिस्सेदारी नहीं है और भारत के ईईजेड से दूर रहें।

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