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भारत की इस श्रापित नदी में जिसने किया स्नान, उसके सारे पुण्य हो गए समाप्त

भारत में नदियों की पूजा देवताओ के समान की जाती है | हिन्दू धर्म में व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी तभी पूर्ण माना जाता है जब गंगा नदी में उसकी अस्थियों का विसर्जन किया जाए | लेकिन ऐसी पवित्र नदियों के अतिरिक्त भारत में एक ऐसी नदी भी है जिसमे स्नान करने से आपके जीवन के सारे पुण्य समाप्त हो जाते है | 

भारत में सरस्वती नदी को देवतमा ( देवताओं की माता ), बुद्धितमा ( ज्ञान की माता ) और नदीतमा ( सभी नदियों की माता ) कहते है | इसलिए इसे भारत सबसे पवित्र नदी माना जाता है | लेकिन अब यह नदी सुख चुकी है | वर्तमान समय में भारत की सबसे पवित्र नदी गंगा नदी को माना जाता है | लेकिन क्या आप जानते है की ऐसी पवित्र नदियों के अतिरिक्त भारत में एक ऐसी नदी है जिसे श्रापित नदी कहा जाता है | ऐसा कहा जाता है की यदि इस नदी में स्नान कर लिया जाये तो व्यक्ति के द्वारा जीवन में अर्जित किये गए सारे पुण्य नष्ट हो जाते है |
इस नदी का नाम है कर्मनाशा | जिसका अर्थ है पुण्य कर्मो का नाश करने वाली | इस नदी का उदगम बिहार के कैमूर जिले से होता है | यह बिहार से होकर उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती है | है। कर्मनाशा सोनभद्र, चंदौली, वाराणसी औऱ गाजीपुर जिलों में बहकर अंत में बक्सर के निकट गंगा नदी में मिल जाती है | गंगा नदी में मिलने से इसका जल पवित्र हो जाता है | इससे पूर्व इसका जल श्रापित होता है | 
कहते है की भगवान राम के एक पूर्वज थे, जिनका नाम त्रिकुंश था | त्रिकुंश को एक दिन स्वर्ग की यात्रा करने का विचार आया | त्रिकुंश ने अपने कुलगुरु वशिष्ठ से कहा की आप मुझे स्वर्ग भेज दे | वशिष्ठ ने कहा की बिना मृत्यु के स्वर्ग जाना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है | इस बात से त्रिकुंश क्रोधित हो गए और वे गुरु विश्वामित्र के पास चले गए | महर्षि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ आपस में शत्रु थे | त्रिकुंश ने विश्वामित्र को भड़का दिया और कहा की गुरु वशिष्ठ ने उनका अपमान किया है |
इस बात पर विश्वामित्र भड़क गए और उन्हें सशरीर स्वर्ग में भेज दिया। देवताओं ने यह देखा तो चकित रह गए। उन्होंने त्रिशंकु को नीचे मुंह करके वापस धरती पर भेज दिया। त्रिशंकु त्राहिमाम करते हुए वापस धरती पर आने लगे। महर्षि विश्वामित्र को इस बात का पता चला तो वह उन्हें फिर स्वर्ग भेजने लगे। इस पर देवताओं औऱ विश्वामित्र के बीच युद्ध होने लगा | लेकिन त्रिकुंश अभी भी आकाश में उलटे झूल रहे थे | इस कारण त्रिकुंश के मुँह से एक लार टपक गयी | जिससे कर्मनाशा नदी उद्भवित हुई | इसके बात महर्षि वशिष्ठ के आग्रह पर देवताओ और महर्षि विश्वामित्र ने युद्ध रोक दिया और त्रिकुंश को क्षमा कर दिया | चूँकि यह नदी त्रिकुंश की स्वार्थी भावना का परिणाम है इसलिए इस नदी को श्रापित नदी कहते है |
ऐसा माना जाता है की गंगा नदी में मिलने से पूर्व यदि कोई व्यक्ति इस नदी में स्नान कर ले तो उसके सारे पुण्य एक ही क्षण में समाप्त हो जाते है | इसलिए इस नदी में स्नान करना तो दूर इसे कोई छूता भी नहीं है | ऐसा कहा जाता की यदि इस नदी में बाढ़ आ जाये तो यह नदी किसी ना किसी व्यक्ति की जान जरूर लेती है | 
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