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भारत के एक छोटे से द्वीप ने चीन के पसीने छुड़ा रखे हैं, जानिए कैसे ?

भारत के मुख्य भू-भाग से करीब 1400 किमी की दूरी पर स्थित अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत के लिए शुरू से ही रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं। हिन्द महासागर पर दबदबा कायम करने के लिए भारत ने इन द्वीपों का इस्तेमाल भी किया है। मलक्का स्ट्रेट के मुहाने पर स्थित होने की वजह से इन द्वीपों की strategic value और ज़्यादा बढ़ जाती है। भारत-चीन विवाद के बाद भारत सरकार ने इन द्वीपों पर अपना फोकस बढ़ाया है और अब सरकार तेजी से इन द्वीपों का सैन्यीकरण कर रही है। इसके साथ सरकार अब इन द्वीपों पर गतिविधि बढ़ाने के लिए कई चीन विरोधी ताकतों को निमंत्रण भी दे रही है। चीन इस मामले में भारत से इतना घबराया हुआ है कि वह अब थाइलैंड के बीच एक नहर (Kra Canal) का निर्माण करने के प्रोजेक्ट पर विचार कर रहा है।

यहाँ बड़ा सवाल यह है कि, आखिर चीन भारत के इन द्वीपों से इतना घबराता क्यों है? दरअसल, दुनिया के 25 प्रतिशत व्यापार के साथ-साथ चीन के कुल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा मलक्का के रास्ते ही किया जाता है। यहाँ तक कि, चीन अपनी तेल की जरूरतों को पूरा करने के लिए करीब 80 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से इम्पोर्ट करता है। भारत के पास अंडमान में इतनी सैन्य शक्ति उपलब्ध है कि वह बड़े आराम से इस मलक्का स्ट्रेट को ब्लॉक कर सकता है। यही कारण है कि चीन इन द्वीपों से इतना घबराता है। युद्ध की स्थिति में भारत आसानी से मलक्का के रास्ते चीन की अर्थव्यवस्था और सप्लाई लाइन की कमर तोड़ सकता है।

भारत चीन की इस कमजोरी को बखूबी जानता है और इसलिए भारत ने गलवान विवाद के बाद से ही तेजी से इन द्वीपों पर भारी सैन्यकरण करने की योजना बना ली है। भारत ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में लगभग 5,000 करोड़ रुपये के बुनियादी सैन्य ढांचे के विकास की योजना को फास्ट ट्रैक कर दिया है। इस योजना के तहत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अतिरिक्त युद्धपोत, टोही विमान, ड्रोन, फाइटर जेट, मिसाइल बैटरी और पैदल सैनिकों को तैनात किया जा सकेगा। जिस तरह से चीन हिन्द महासागर में अपनी दादागिरी बढ़ा रहा है, यह कदम उसे देखते हुए ही लिया गया है। भारतीय नौसेना ने पिछले साल हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति के विस्तार के तहत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में एक नए नौसेना वायु स्टेशन, “आईएनएस कोहासा” का उद्घाटन किया था। उसी दौरान अंडमान निकोबार के सैन्यीकरण की योजना शुरू की गयी थी।

बता दें कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत का एक मात्र थियेटर कमांड है जहां पर थल सेना, नौसेना, वायु सेना और कोस्ट गार्ड के सैनिक एक साथ एक कमांड में इन द्वीपों की सुरक्षा का दायित्व निभाते हैं। भारत पहले से ही इस द्वीप समूह से Sukhhoi-30 MKI, लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान Poseidon-8I और Heron-II निगरानी ड्रोन ऑपरेट करता आया है। भारत ने अंडमान और निकोबार में मौजूद नौसेना के वायु स्टेशनों को Aviation Bases में बदल रहा है, जिससे चीन पर कड़ी निगरानी रखी जा सके। भारत और ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में Mutual Logistics Support Agreement यानि MLSA पर हस्ताक्षर किए थे और अब भारत जापान के साथ भी यही समझौता करने वाला है। इस समझौते के बाद भारत और ऑस्ट्रेलिया की सेनाओं को एक दूसरे के military bases इस्तेमाल करने की छूट मिल गयी थी।

हालांकि अमेरिका, फ्रांस और सिंगापुर के साथ भारत का पहले से ही Mutual Logistics Support Agreement हो चुका है लेकिन भारत ने अभी तक इस समझौते का पूरी तरह से उपयोग नहीं किया है। किसी भी देश की नौसेना को अभी भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों का access नहीं है। अब चीन जिस तरह से अपने पाँव पसार रहा है, उसे देखते हुए भारत को MLSA समझौते का भरपूर फायदा उठाना चाहिए। अगर चीन कोई भी दुस्साहसी कदम उठता है तो, भारत को भी कई ऐसे महत्वपूर्ण रणनीतिक द्वीपों का access मिल जाएगा जिससे चीन को रोकने में आसानी होगी।

भारत यहाँ चीन को झटका देने के लिए और भी कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है। बता दें कि, भारत बंगाल की खाड़ी में ग्रेट निकोबार द्वीप समूह में एक ट्रांस-शिपमेंट बंदरगाह के निर्माण के लिए 10,000 करोड़ रुपये का निवेश करने का ऐलान कर चुका है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बन रहे इस ट्रांसशिपमेंट पोर्ट के कई लाभ हैं। पहला, यह स्थान पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्ग के निकट है। इस क्षेत्र में आसियान, चीन, जापान और भारत जैसी प्रमुख आर्थिक शक्तियां भी हैं। माना जा रहा है कि, भारत का यह पोर्ट श्रीलंका में चीन द्वारा बनाए जा रहे हंबनटोटा पोर्ट को सीधी चुनौती पेश करेगा।

हिन्द महासागर में ज़मीन की कमी होने के करण अंडमान द्वीप रणनीतिक तौर पर और ज़्यादा अहम हो जाता है। भारत इन द्वीपों का भरपूर इस्तेमाल कर आसानी से ASEAN देशों पर अपना प्रभुत्व बढ़ा सकता है। इसके साथ ही भारत चीन की आक्रामकता का भी डटकर मुक़ाबला कर सकता है। अंडमान और निकोबार द्वीप भारत के पास ऐसा ब्रह्मास्त्र हैं, जिससे आज चीन को सबसे ज़्यादा डर लगता है।

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