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महामारी से एक पैसे की पुड़िया की जंग, किसकी होगी जीत ?

जब भी कहीं कोई नई महामारी फैलती है, तो उसका इलाज भी जल्द ही ढूंढ लिया जाता है। नई दवा के बनने तक डॉक्टर परहेज करने की सलाह देते हैं। सरकार कहती है कि घबराहट में आकर खरीदारी न करें। लेकिन इन सबसे लोगों की घबराहट कम नहीं होती। उन्हें लगता है कि सरकार ने जादुई दवा की जानकारी छिपा रखी है। फिर लोग ख़ुद ऐसी दवा ढूंढने लगते हैं। और ख़ुद ही डॉक्टर भी बन जाते हैं।

कई साल पहले फैली बर्ड फ्लू वाली महामारी तो आपको याद ही होगी। ओसेल्टैमिवीर उसके इलाज के लिए ऐसी ही अचूक दवा बताई गई थी। आज कोरोना से निपटने के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन यानी HCQ पर दांव लगाया जा रहा है। असल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कोरोना का झटपट इलाज चाहते थे। उन्हें हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन में यह ख़ूबी दिखी। इसलिए इस दवा की मांग आसमान छूने लगी।

भारत के पास इस दवा का स्टॉक था, इसलिए अमेरिका ने उस पर इसे भेजने का दबाव बनाया। दूसरे देश भी भारत से HCQ मांग रहे हैं। इससे एक डर बना कि कहीं भारतीयों के लिए ही यह दवा कम न पड़ जाए।

पेरू से आई दवाई
अगर आप थोड़ी खोजबीन करें तो पाएंगे कि HCQ का नाता काफी समय पहले फैली एक दूसरी महामारी की अचूक मानी जाने वाली दवा से भी है। 1950 के दशक में HCQ को क्लोरोक्वीन के मुकाबले कम टॉक्सिक दवा के तौर पर तैयार किया गया था।

क्लोरोक्वीन से मलेरिया का इलाज होता। कुनैन के गुणों से लैस लेकिन टॉक्सिक इफेक्ट वाली सिंथेटिक दवा क्लोरोक्वीन 1934 में बनाई गई। कुनैन पेरू में पाए जाने वाले सिनकोना नाम के पेड़ की छाल से बनाई जाती थी। बहुत तेज कंपकंपी के साथ आने वाले तेज बुखार में मांसपेशियों को आराम देने में इसका इस्तेमाल होता।

अब आप सोच रहे होंगे कि पेरू में पाया जाने वाला सिनकोना यूरोप कैसे पहुंचा? इसे एक से दूसरे महाद्वीप तक ले जाने का काम ईसाई पादरियों ने किया। यूरोप में लोग इसे रामबाण दवा मानने लगे थे। 1820 तक कुनैन दस्त, गले में खराश, दिमागी दिक्कत, नामर्दी और दांत दर्द की कारगर दवा के तौर पर तैयार की जाती थी। इस बात का जिक्र रोहन देबरॉय ने अपनी किताब मलेरियल सब्जेक्ट्स में किया है।

कुनैन में ऐसी ताकत होने का दावा किया जाता था कि वह सिकंदर को मलेरिया से बचाकर इतिहास बदल सकती थी। ऐसे ही दावे ब्रिटेन के साम्राज्यवादी विस्तार के लिए किए जाते हैं। कुनैन का अभाव मच्छरों से भरे, गर्म और नमी वाले देशों में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार की राह में रोड़ा था। ब्रिटिश सरकार के भारतीय दफ्तर में काम करने वाले लेखक और खोजी क्लेमेंट्स मार्कहैम ने कुनैन के बीज लाने के लिए पेरू जाने का फैसला किया था।

सिनकोना के बीज नीलगिरि के साथ बंगाल और आज के म्यांमार और तब के बर्मा के पहाड़ी इलाकों में लगाए गए। उसके नाजुक पौधों को कुनैन के उत्पादन लायक पेड़ बनने में थोड़ा समय लगा। फिर सवाल उठा कि मरीजों को यह बेहद कड़वी दवा दी कैसे जाए।

तब मरीजों को कुनैन देने का जाना-माना तरीका उसको टॉनिक वॉटर में चीनी के घोल में मिलाने वाला था। वैसे भी जिन और टॉनिक से जुड़े मिथकों का ब्रिटिश राज से नाता था। और यह ड्रिंक बड़े शहरों के ब्रिटिश कारोबारी समुदाय में मशहूर थी।

एक पैसे की पुड़िया
असल चुनौती हर किसी तक दवा पहुंचाने की थी। लेकिन ब्रिटिश कारोबारी उलझन में थे कि दवा से मुनाफा कमाएं या धर्म खाते से इसे बांटा जाए। मलेरिया पर काबू पाने से साम्राज्य के विस्तार में मदद मिलेगी, इस आधार पर सप्लाई के लिए बीच का रास्ता निकाला गया।

फिर एक पैसे की पुड़िया में कुनैन बेची जाने लगी। इस पुड़िया में कुनैन के पांच दाने होते। कुनैन की पुड़ियों को देशभर में डाक से भेजा जाता। पुड़िया बनाने का काम बंगाल के कलकत्ता और झारखंड के हज़ारीबाग में होता था। यह काम वहां के बाल सुधार गृह में बंद बच्चे और जेलों में बंद कैदी करते। इसके बाद ये पुड़िया भारत और बर्मा के डाकघरों में भेज दी जाती।

कुनैन की पुड़ियों को डाकघरों में इसलिए भेजा जाता, ताकि इसका बड़ा डिस्ट्रिब्यूशन चैनल बने। सोचा यह भी गया था कि अगर भारतीयों को उनके बीच का कोई शख्स कुनैन गटकने के लिए कहेगा तो वे उसकी बात मानेंगे। इस मामले में ब्रिटिश अफसरों का आदेश उनके जितना कारगर नहीं होगा।

रॉय बताते हैं कि पोस्टमास्टरों को एक रुपये की कुनैन की बिक्री पर एक आना दिया जाता था। आज के सौ पैसे वाला एक रुपया पुराने जमाने में सोलह आने का होता था। कुनैन बेचने के काम में स्थानीय लोगों के बीच प्रभावशाली सरपंचों, गांवों के मुखिया और स्कूल मास्टरों की भी मदद ली जाती थी।

कुनैन पिछली सदी में जिस तरह पुड़ियों में बिका करती थी, उसी तरह आज आप शैंपू और हेयर ऑयल को सैशे में बिकता देख रहे हैं। आज की तरह तब भी लोगों की खरीदने की क्षमता के हिसाब से तरह-तरह की पैकिंग में कुनैन बेची जाती थी।

कुनैन की गोलियां कांच की बोतलों में भी बिकती थीं, जो निगलने में कम कड़वी लगती थीं। भारत जैसे देश में एक बड़ी बीमारी पर काबू पाने में बड़ी आबादी का साथ पाना बड़ी उपलब्धि थी।

हक़ीक़त और फ़साना
1930 के दशक में तो कुनैन इसी तरह एक पैसे की पुड़िया में बिकती रही। लेकिन बाढ़ से देश के बड़े हिस्से में तबाही मचने पर एक पैसे वाली कुनैन की पुड़िया गरीबों की पहुंच से बाहर हो गई। आज की बात करें तो पब्लिक हेल्थ के मोर्चे पर अभी जो ऊहापोह वाली स्थिति दिख रही है, उसमें भूख और बीमारी से लड़ाई में आदमी पहले दवा नहीं, खाना चुनता है।

कुनैन मुफ्त में बांटे जाने की मांग बढ़ने लगी, लेकिन ब्रिटिश शासकों ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। 1934 में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक ख़बर छपी थी कि ब्रिटिश लोग कुनैन का अपना स्टॉक एम्सटर्डम के कीना ब्यूरो को बेचने जा रहे हैं। आजकल जिस तरह क्रूड की ग्लोबल सप्लाई को तेल निर्यातक देशों का संगठन ओपेक कंट्रोल करता है, उसी तरह यह कीना ब्यूरो तब कुनैन की ग्लोबल सप्लाई को कंट्रोल करने की कोशिश करता था।

क्लोरोक्वीन की खोज होने से दवा की सप्लाई बढ़ने की उम्मीद बंधी लेकिन उसके टॉक्सिक इफेक्ट के चलते बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू होने में वक्त लगा। इसलिए कम घातक HCQ की खोज बड़ी बात मानी गई। HCQ के तुरंत बाद मच्छर मारने में कारगर कीटनाशक DDT की खोज हुई।

एक समय लगा कि दुनिया से मलेरिया का खेल बस खत्म होने वाला है, लेकिन धीरे-धीरे मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों पर यह दवा ही बेअसर होने लगी और इस बीमारी ने दोबारा सिर उठा लिया। महामारी के इलाज की रामबाण दवा हमेशा सच से ज्यादा मिथक रही है। सच कहें तो पब्लिक हेल्थ सर्विसेज के बारे में व्यापक योजना बनाने के सिवा इनका कोई इलाज नहीं।

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