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न मोदी और न नीतीश.. सीमांचल में तो ओवैसी ने कर दी कांग्रेस की धुलाई

इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में यदि किसी ने सभी को धता बताते हुए अपना डंका बजवाया है, तो वे कोई और नहीं, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी हैं। जब चुनाव के दौरान ये कयास लगाए जा रहे थे कि AIMIM महागठबंधन के प्रचंड बहुमत के सपनों को करारा झटका दे सकती है, तो कई लोगों ने इस बात का उपहास उड़ाया था, और अनेकों एक्ज़िट पोल्स ने इस बात से साफ इनकार किया था कि ओवैसी चुनाव में समीकरण बदल पाएंगे। लेकिन चुनाव के परिणाम तो कुछ और ही बता रहे हैं। न केवल ओवैसी का डंका बजा है, बल्कि कई सीटों पर, विशेषकर सीमांचल क्षेत्र में उनकी पार्टी ने कांग्रेस के वोट काटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

बिहार की 20 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने वाली AIMIM के 14 उम्मीदवार सीमांचल इलाके की सीटों पर थे, जो कांग्रेस के चुनाव समीकरण को बदल कर रख दिए। बता दें कि 2015 के चुनाव में सीमांचल इलाके में अकेले 9 सीटों पर जीत दर्ज कर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि जेडीयू को 6 और आरजेडी को 3 सीटें मिली थीं। परन्तु इस बार इस पार्टी को इस इलाके में बड़ा झटका लगा है। ये वही पार्टी है जिसके कारण 2019 में स्थिति में अचानक बदलाव आया था जब AIMIM के क़मरूल हूडा ने उपचुनाव में किशनगंज में जीत हासिल की और कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था।

महागठबंधन ने असदुद्दीन ओवैसी पर आरोप लगाया है कि बिहार में जो एंटी एनडीए वोट थे, उसे बांट दिया। इन आरोपों का जवाब देते हुए ओवैसी बोले,” अब नाच न जाने तो आंगन टेढ़ा, कर्नाटक की दो सीट हार गए तो वहां मैं गया था. मध्‍य प्रदेश में हार गए तो क्‍या वहां मेरी पार्टी लड़ी. गुजरात में हार गए तो मैं गया था क्‍या? इन लोगों का एक गुरूर है कि तुम कैसे हो गए हमारे सामने. यही तो जम्‍हूरियत की खूबसूरती है कि हर कोई किसी के सामने खड़ा हो सकता है और हम खड़े हुए. उन लोगों की आवाज बनने की कोशिश की जिन्‍हें वह दबा रहे थे.”

गौर करें तो, सीमांचल क्षेत्र में AIMIM अच्छे खासे मुस्लिम वोट्स पाने में सफल रही है, जिसने पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया क्षेत्र में कांग्रेस को कमजोर कर दिया है। सीमांचल इसलिए भी बहुत अहम है, क्योंकि इनमें से अधिकतम विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर मुस्लिम जनसंख्या बहुमत में है, और यहाँ पर या तो कांग्रेस या फिर आरजेडी का ही वर्चस्व रहा है। इनके वर्चस्व को अभी तक कोई भी पार्टी ढंग से चुनौती नहीं दे पाई है, और इसीलिए बिहार में इन्हें इस क्षेत्र में सबसे अधिक लाभ प्राप्त हुआ है।

लेकिन असदुद्दीन ओवैसी के आगमन से सारे किये कराए पर पानी फिर गया।

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