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मोदी की रैली में मॉब लिंचिंग से बाल-बाल बचीं महिला पत्रकार, सोशल मीडिया पर साझा की पूरी कहानी

मोतिहारी। बिहार चुनाव में रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली को कवर करने पहुंची महिला पत्रकार मीना कोटवाल कथित तौर पर भीड़ द्वारा मॉब लिंचिंग से बाल-बाल बच गईं। मीना कोटवाल ने सोशल मीडिया पर अपने साथ हुई घटना का पूरा ब्यौरा साजा किया है। मीना कोटवाल ने फेसबुक पोस्ट में बताया कि कैसे वहां मौजूद लोगों से जब बात करना शुरू किया तो उसे चोट पहुंचाने की कोशिश की गई।

महिला पत्रकार ने अपने पोस्ट में लिखा, ‘कल मेरे साथ क्या हुआ? मैं मोतिहारी के गांधी मैदान में ‘The Shudra’ के लिए पीएम की रैली को कवर करने गई थी। वहां मैं मीडिया गैलरी में न जाकर सबसे पीछे जाने की सोची ताकि कुछ लोगों की राय जान सकूं। पीछे पहुंचकर मैंने उनसे बात करनी शुरू की और इस दौरान काउंटर सवाल भी पूछे। रैली में आए लोगों से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास, जातिवाद, पलायन, गरीबी, महिलाओं की बदहाली आदि पर सवाल पूछ ही रही थी जो वहां के कुछ लोगों को नागवार गुजरी। उन्होंने मुझे टारगेट करना शुरू कर दिया। चारों तरफ से मुझे अकेला घेर मोदी-मोदी चिल्लाना शुरू कर दिया।’

‘सैकड़ों लोग मुझ अकेली महिला को घेर फब्तियां कसने लगे। मैं उनपर चिल्लाते हुए वहां से जैसे-तैसे निकली। वहां से कुछ दूर आगे जाकर खुद को शांत किया और फिर एक बुजुर्ग से बात करने लगी। इस दौरान वहां एक युवा आए जो मुझसे विनती करने लगे कि मुझसे भी मेरे मुद्दों पर बात कीजिए। मैंने उनसे पूछा कि क्या मुद्दा है आपका? वे बताने लगे कि मेरे पास रोजगार नहीं है आप मुझे अपने प्लेटफॉर्म पर बोलने का मौका दीजिए। मुझे लगा कि इनसे बात करनी चाहिए और मैंने अपना माइक उनकी तरफ कर दिया और सवाल किया कि बताइए क्या समस्या है आपकी?’

‘वह युवा अपनी बदहाली और बेरोजगारी पर बात करने लगा। इस दौरान फिर वहां भीड़ लग गई और लोग मोदी-मोदी का नारा लगाने लगे। युवा अपनी बात न रख पाने के कारण व्यथित हो गया और उसने असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया जिसपर मैंने उसे डांटा और कहा कि ऐसी भाषा की कोई जगह नही है यहां…गलती का एहसास होने पर उसने माफी मांगी लेकिन तब तक वहां मौजूद लोग उसपर टूट पड़े और उसकी पिटाई शुरू कर दी। मैं सबकुछ भूल उसे बचाने के लिए कूद पड़ी। वहां मौजूद लोग फिर मेरी तरफ आए और धक्का-मुक्की करने लग गए। मुझे अनाप-शनाप बोलने लग गए। The Shudra को दलाल मीडिया कहने लगे।’

‘इतना ही नहीं उन्होंने मुझे अपशब्द कहा, तमाम तरह की बदतमीजी की, माइक पर ‘शूद्र’ लिखा देख कई आपत्तिजनक बातें कही। कुछ देर के लिए मैं वहां ब्लैंक सी हो गई। मैं डर गई क्योंकि लिंचिंग पर कई खबरें और लेख लिखे हैं मैंने। वो सारा दृश्य मेरी नजरों के सामने अचानक आने लग गया।’

मीना ने आगे लिखा, ‘किसी तरह मैंने खुद को संभाला और टीम की मदद से बाहर निकली। मैंने पहले यह देखने की कोशिश की कि वह युवा जो बेरोजगारी पर बात कर रहा था कहां है? कहीं लोग उसे लगातार पिट तो नहीं रहे हैं! मैंने देखा कि वह युवा भाग रहा है और भीड़ में कुछ लोग उसका पीछा कर रहे हैं। इस दौरान मैंने कोशिश की कि मुझे कहीं से पुलिस या फोर्स से कोई सहायता मिले। लेकिन सबसे पीछे जहां मैं खड़ी थी वहां आसपास कोई फोर्स या पुलिस मुझे नहीं दिखी। मैंने फिर साहस बटोरा और कैमरा ऑन कर उनका वीडियो बनाने लगी, तब मैंने सोचा कि शायद वे कैमरा देख डर जाएं और मैं कैसे भी यहां से निकल जाऊं।’

‘लेकिन मेरा यह उपाय तब कारगर साबित नहीं हो पाया और धक्का-मुक्की के दौरान मेरा ट्राइपॉड टूट गया। मेरा फोन नीचे गिर गया, मैंने हिम्मत कर फोन उठाया और तेज कदमों से निकलने की कोशिश की। वे सब गिद्धों की तरह मेरा पीछे किये जा रहे थे और तमाम आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहे थे। ऐसे बुरे अनुभव से मैं पहली बार गुजर रही थी, मैं डर भी गई थी क्योंकि सैकड़ों जाहिल लोग हर तरह से मेरे सम्मान को ठेस पहुंचा रहे थे। वहां भीड़ ने मेरे लिए जैसे एक सजा तय कर दी। मैं तेज कदमों से आगे आगे भाग रही थी और वे सभी मेरा पीछा करते हुए तमाम तरह की फब्तियां कस रहे थे।’

‘गंदी हंसी हंस रहे थे, मुझे वहां अकेला देखकर अपनी मर्दवादी कुंठा का जैसे प्रदर्शन कर रहे थे। सबके चेहरे मुझे गिद्ध जैसे दिख रहे थे। मेरा साहस जैसे जवाब देने लग गया था। फिर एकबार मैंने चारों तरफ अपनी नज़र दौड़ाई, तो कुछ सौ मीटर की दूरी पर पुलिस फोर्स दिखी। मैं उनकी तरफ दौड़ी, भीड़ भी मेरे पीछे दौड़ी। पुलिस फोर्स के जवान यह दृश्य देखकर मेरी तरफ आए। भीड़ भी मेरे पीछे आई। मैंने वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों से विनती की कि कृपया मुझे बचा लीजिए मैं मीडियाकर्मी हूं। ये लोग मुझे डरा रहे हैं, आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं।’

महिला पत्रकार ने आगे लिखा, ‘उस भीड़ की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। सामने पुलिस फोर्स देखकर भी उनमें किसी तरह का डर नहीं था। वे वहां भी मुझपर फब्तियां कसे जा रहे थे, नारेबाजी कर रहे थे। इन सबके बीच सुरक्षाकर्मी मुझे वहां से निकालकर रोड पर ले आई। कुछ लोग अभी भी मेरा पीछा कर रहे थे बिना किसी डर के…कुछ चेहरें मुझे अभी भी याद है। वे लोग बहुत दूर तक मेरे पीछे आए थे। वे मुझे आतंकित करना चाह रहे थे। मेरे सच बोलने के साहस को तोड़ना चाह रहे थे। मेरे कर्तव्य से मुझे डिगाना चाह रहे थे। जैसे मैं उनकी नजरों में कोई अपराध कर रही थी। एक महिला का ऐसा करना उन्हें नागवार गुजर रहा था।’

‘एक व्यक्ति ऐसा भी था जो सफारी सूट में था। उसने अंत-अंत तक मेरा पीछा किया। उसकी आंखें मुझे डराने की भरपूर कोशिश कर रही थी लेकिन मैं उन जैसे तमाम जाहिलों को बता देना चाहती हूं कि मैं डरूंगी नहीं। मैं फिर से रिपीट करती हूं कि डरूंगी नहीं। नहीं डरूंगी कभी तुम जैसे लोगों से, I repeat’

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