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मोदी ने जिस ‘आरोग्य सेतु’ एप को बनाया मिशन, वो क्यों साबित हुआ फ्लॉप?

कोरोना वायरस पर क़ाबू पाने के लिए मरीज़ों का पता लगाना और उनके मूवमेंट पर नज़र रखना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए कई देशों ने मोबाइल टेक्नलॉजी का सहारा लिया और वे कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप पर ज़ोर दे रहे हैं। लेकिन क्या यह तरीक़ा फ़ायदेमंद साबित हुआ है?आइए पहले एक नज़र आंकड़ों पर डाल लें।

अमेरिका की सेंसर टावर ने 13 देशों में सरकारी सपोर्ट वाले कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप्स के डाउनलोड्स के ताजा आंकड़े दिए हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, इंडोनेशिया, इटली, जापान, पेरू, फिलीपींस, सऊदी अरब, थाईलैंड, तुर्की, वियतनाम और भारत शामिल हैं। इन देशों की कुल आबादी है क़रीब 190 करोड़। लेकिन ऐप डाउनलोड किए केवल लगभग 17 करोड़ लोगों ने। भारत में ऐसे सरकारी ऐप यानी आरोग्य सेतु को केवल 12.5 प्रतिशत लोगों ने डाउनलोड किया।

वायरस के प्रसार पर ऐप्स के ज़रिए नज़र रखने के लिए जरूरी है कि आबादी का बड़ा हिस्सा इन्हें डाउनलोड करे। भारत में तो वैसे भी इस काम में काफी चुनौती है। हाल यह है कि 2019 के अंत में देश में क़रीब 42 करोड़ मोबाइल इंटरनेट यूजर ही थे। यानी आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इससे महरूम था। अब इस तस्वीर में निरक्षरता की ऊंची दर को मिला लें, ख़ासतौर से यूपी और बिहार जैसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में। इससे पता चल जाएगा कि वायरस पर क़ाबू पाने की मोबाइल-ऐप वाली रणनीति के सामने कैसी चुनौती है।

अप्रैल तक ऐप स्टोर और गूगल प्ले से आरोग्य सेतु ऐप के लगभग 8 करोड़ 8 लाख डाउनलोड हो चुके थे। लेकिन उसके बाद सुस्ती आने लगी। अब तक क़रीब 13 करोड़ लोगों ने इसे डाउनलोड किया है। इसके साथ कई राज्यों के छोटे ऐप्स भी जुड़े होंगे। जैसे कर्नाटक का कोरोना कवच और सूरत जैसे शहरों का एसएमसी कोविड 19 ट्रैकर।

सेंसर टावर ने जिन 13 देशों का अध्ययन किया, उनमें भारत में कोरोना का प्रकोप सबसे ज़्यादा है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू रिपोर्ट के अनुसार, हार्वर्ड, पाविया यूनिवर्सिटी और ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के आईटी विशेषज्ञों ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप्स की नाकामी की वज़़ह बताई है। उनका कहना है कि जितने ज़्यादा लोग ये ऐप डाउनलोड करेंगे और इनका लगातार उपयोग करेंगे, ये उतने ही प्रभावी होंगे। अगर कोई यूजर इस ऐप का इस्तेमाल करने वाले छोटे से समूह के ही संपर्क में आए तो यह प्लैटफॉर्म बेकार हो जाएगा। यह एक तरह से नुकसानदेह भी होगा क्योंकि इसकी रीडिंग बहुत गलत आएगी और सुरक्षा का झूठा अहसास पैदा होगा।

सर्विलांस से जुड़े वैश्विक विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें ‘भरोसे’ का पहलू बेहद अहम है। जेनिफर ग्रैनिक सर्विलांस और साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट हैं। वह अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के स्पीच, प्राइवेसी एंड टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट के साथ काम करती हैं। उन्होंने ईटी प्राइम से कहा, ‘लोगों में यह भरोसा पैदा किया जाना चाहिए कि सरकार उनके डेटा का दुरुपयोग नहीं करेगी। प्राइवेट इंफॉर्मेशन दूसरों को नहीं देगी।’

जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर हेल्थ सिक्योरिटी के सीनियर स्कॉलर डॉक्टर अमेश अदलजा का कहना है कि इस महामारी से निपटने के तौरतरीक़ों में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का पहलू अहम है। उनका कहना है, ‘कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का बोझ घटाने वाली कोई भी चीज बेहद अहम होगी।’ लेकिन जब तक ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसे नहीं अपनाएंगे, तब तक इसका कोई ख़ास फ़ायदा नहीं है। ग्रैनिक कहती हैं, ‘यही कारण है कि परंपरागत तरीके से मरीजों की पहचान करना अब भी अहम है।’

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारों ने जिन ऐप्स का सहारा लिया है, उनमें से अधिकतर में सुरक्षा उपाय कमज़ोर हैं। रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए इनका दुरुपयोग हो सकता है। साइबर डिफेंस के विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर आदमी की लोकेशन से जुड़ी सूचना किसी के हाथ लग जाए तो बड़ा खतरा हो सकता है। हाल में G20 देशों की डिजिटल इकॉनमी मीटिंग में सऊदी अरब की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अल स्वाहा ने कहा था, ‘दुनिया पिछले 90 वर्षों के सबसे बड़े स्वास्थ्य और आर्थिक संकट का सामना कर रही है। ऐसे में एक डिजिटल क्राइसिस नहीं होना चाहिए।’

दिलचस्प है कि आयरलैंड के कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। इस कोविड ट्रैकर ऐप को जुलाई में लॉन्च किया गया। इसे करीब 13 लाख लोगों ने डाउनलोड किया। यानी देश के लगभग 37 प्रतिशत लोगों ने। ई-हेल्थ आयरलैंड के सीईओ फ्रैन थॉमसन इसका श्रेय सरकार पर लोगों के भरोसे को देते हैं।

टोरंटो यूनिवर्सिटी में संक्रामक रोगों के वैज्ञानिक डॉ इसाक बोगोख इस राय से सहमत हैं। वह पिछले हफ्ते लॉन्च किए गए कनाडा के कोविड 19 कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप कोविड अलर्ट पर नज़र रख रहे हैं। डॉ बोगोख ने ईटी प्राइम से कहा, ‘कनाडा के अधिकतर लोगों को हमारे संस्थानों पर भरोसा है। कनाडा में हम नस्ल और आमदनी जैसे कुछ अहम डेटा भी जुटाते हैं, लेकिन इस तरह के आंकड़े जुटाने का सुरक्षा और नैतिकता से भी नाता है। मसलन लोगों की पहचान छिपाए रखने के लिए आप क्या करेंगे? डेटा किसे मिलेगा? इसका किस तरह उपयोग होगा?’

भारत के लिए भी यह एक चुनौती है। मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नलॉजी के रिव्यू में भारत के अब तक के रवैये पर सवाल उठाए गए। एमआईटी कोविड ट्रेसिंग ट्रैकर दुनियाभर में ऑटोमैटिक ट्रेसिंग की हर कोशिश की डिटेल्स जुटाता है। भारत के आरोग्य सेतु का प्रदर्शन एक एमआईटी सर्वे में खराब रहा। इसे पांच में से केवल दो स्टार मिले। भारत में न तो प्राइवेसी लॉ है और न ही पर्सनल डेटा की सुरक्षा करने वाला कोई कानून। ऐसे में नागरिकों के डेटा के दुरुपयोग से निपटने का कानूनी रास्ता बहुत लचर है।

भारत की ऑफिशियल पॉलिसी तो यही है कि लोग चाहें तो आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड करें, न चाहें तो न करें। लेकिन हक़ीक़त काफी अलग है। भारत सरकार के कर्माचरियों के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया है। गृह मंत्रालय के ताजा दिशानिर्देशों को देखते हुए प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर की कई बड़ी कंपनियां इसे अपने कर्मचारियों के लिए अनिवार्य बना रही हैं।

कुछ ग्लोबल एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसी देश की सरकार को इन ऐप्स को अनिवार्य नहीं बनाना चाहिए। ऐसा करने पर लोग या तो फोन घर में छोड़ देंगे या ऑफ कर देंगे। भरोसा हो तो लोग खुद ऐसे ऐप डाउनलोड करेंगे। विश्वास न हो तो कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का कोई भी तरीका कारगर नहीं हो सकता।’

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