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यूपी उपचुनाव नतीजों का एक ही सार, शीर्ष नेतृत्व बनाम प्रत्याशियों के जिम्मे से नहीं चलेगा काम

लखनऊ
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दो दिन पहले कहा था कि उपचुनाव के नतीजे 2022 के चुनाव की दिशा तय करेंगे। मंगलवार को आए नतीजों में जो विपक्ष की नुमाइश रही है, अगर यही चुनाव की दिशा है तो 2022 में भी विपक्ष की सीट विपक्ष में ही सुरक्षित नजर आ रही है। दलित से लेकर ब्राह्मण वोटों की सियासत को लेकर उपजे विवाद, कानून-व्यवस्था पर विपक्ष के आरोपों के बीच 7 में 6 सीटें जीतकर बीजेपी यह संदेश देने में सफल रही है कि जनता का उस पर भरोसा कायम है।

उपचुनाव को आम तौर पर सत्ता का चुनाव माना जाता है, लेकिन 2018 में तीन सीटों पर हुए लोकसभा उपचुनाव में सत्तारूढ़ बीजेपी को मिली करारी हार ने यह मिथक तोड़ दिया था। इसलिए 7 सीटों पर हुए उपचुनाव को लेकर जहां बीजेपी काफी सतर्क थी वहीं विपक्ष उत्साहित। जिन 7 सीटों पर चुनाव हुए वे वेस्ट यूपी, बुंदेलखंड, सेंट्रल यूपी और पूर्वांचल सहित प्रदेश के सभी हिस्सों का प्रतिनिधित्व कर रहीं थीं।

दूसरे बीजेपी के साथ सपा, बीएसपी और कांग्रेस सहित सभी प्रमुख विपक्षी दल चुनाव मैदान में थे। इसलिए 2022 के आम चुनावों के पहले इस उपचुनाव को सत्ता के सेमीफाइनल और योगी सरकार के काम-काज की परीक्षा के तौर पर पेश किया जा रहा था।

शीर्ष नेतृत्व बनाम प्रत्याशियों के जिम्मे
उपचुनाव के नतीजों के महत्व को देखते हुए सत्तारुढ़ बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर आम कार्यकर्ता तक चुनाव में पूरी जी-जान से लगा रहा। सभी 7 सीटों पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के साथ सभाएं कीं। प्रदेश संगठन महामंत्री सुनील बंसल ने खुद चुनाव प्रबंधन की हर सीट पर बैठकें की। उपमुख्यमंत्रियों की रैलियां हुईं तो मंत्रियों को कैंप करवाया गया।

देवरिया में सतीश द्विवेदी, बांगरमऊ में ब्रजेश पाठक और महेंद्र सिंह नियमित तौर पर लगे रहे। ऐसे में मुश्किल दिख रही तस्वीर को बीजेपी शानदार जीत में पलटने में सफल रहीं। दूसरी ओर, उपचुनाव को 2022 की दिशा बता रहे सपा मुखिया अखिलेश यादव प्रत्याशियों के पक्ष में प्रेस में दिए बयानों तक ही सीमित रहे।

बसपा प्रमुख मायावती भी घर से नहीं निकलीं। वहीं, कांग्रेस की यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी ने उपचुनाव भर यूपी का रुख ही नहीं किया। ऐसे में विपक्षी प्रत्याशी अपनी ताकत और मेहनत के भरोसे ही रहे। जमीन से विपक्ष के शीर्ष नेताओं की दूरी जीत से दूरी में बदल गई।

जीत से साधे बीजेपी ने कई समीकरण
उपचुनाव से मिली जीत से बीजेपी ने सरकार और संगठन पर उठ रहे तमाम सवालों के न केवल जवाब दिए हैं, बल्कि 2022 के लिए चुनावी हौसलों को और ताकत दी है। विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद प्रदेश में ब्राह्मण वोटों को लेकर सियासत गरमा गई थी। विपक्ष ने योगी सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने की तोहमत लगाई थी।

ब्राह्मण बहुल सीट देवरिया से 20 हजार वोटों से जीत हासिल कर बीजेपी ने साबित कर दिया कि ब्राह्मणों का उस पर भरोसा बरकरार है। कोरोना की आपदा से उपजे संकट में सरकार ने जनता की सेहत और सामाजिक सुरक्षा का दावा किया था, लेकिन विपक्ष इसे खोखला बता रहा था।

हाथरस में हुई घटना पर पूर देश में बवाल मचा था। इसे भी दलित बनाम ठाकुर करने की पूरी कोशिश की गई थी। लेकिन, टूंडला और घाटमपुर की सुरक्षित सीट भी बीजेपी शानदार अंतर से जीतने में सफल रही।

जाहिर है इन नतीजों को सरकार व संगठन और मजबूती से अपने काम-काज पर जनविश्वास के मुहर के तौर पर पेश कर सकेगा। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर स्वतंत्र देव सिंह के सामने यह पहली बड़ी परीक्षा थी। नतीजे उनकी सांगठनिक पकड़ को और मजबूत बनाएंगे।

सपा : गढ़ बचा पर मुश्किलें अब भी

खुद को 2022 के सत्ता का दावेदार बता रही समाजवादी पार्टी मलहनी की अपनी परंपरागत सीट संघर्ष के बाद बचाने में सफल रही पर जीत का अंतर घट गया। उन्नाव की बांगरमऊ सीट पर सपा जहां 2017 में दूसरे नंबर पर थी, वहीं इस बार तीसरे नंबर पर खिसक गई। सपा के लिए इसलिए भी इसे झटका माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव के ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस की कद्दावर नेता अनु टंड सहित कई कांग्रेसियों को पार्टी जॉइन करवाई थी।

बुलदंशहर सीट सपा ने गठबंधन में आरएलडी को दी थी, जिसकी जमानत जब्त हो गई। हालांकि, उपचुनाव में सपा को 23 फीसदी से अधिक वोट मिले हैं, लेकिन बीजेपी से यह करीब 13 फीसदी कम हैं। जानकारों का कहना है कि विभाजित विपक्ष में इस अंतर को पाटने के लिए सपा को अपनी साइकल एक्सप्रेस-वे से उतारकर गांव की पगडंडियों की ओर बढ़ानी होगी और शीर्ष नेतृत्व को ‘वर्क फ्रॉम होम’ छोड़कर फील्ड पर निकलना होगा।

हालांकि, सपा के राष्ट्रीय सचिव राजेंद्र चौधरी मानते हैं कि बिना किसी प्रचार के भी सपा ने अपनी सीट सुरक्षित रखी है। उनका आरोप है कि बीजेपी को जीत नहीं मिली, बल्कि सत्ता का भरपूर दुरुपयोग कर सीएम और मंत्रियों ने अपनी कुर्सी बचाई है। सपा पूरी तैयारी के साथ 2022 चुनाव में उतरेगी और जनता का उसे समर्थन मिलेगा।

बीएसपी: बेस के बाद भी रेस से दूर
उपचुनाव से आम तौर पर परहेज करने वाली बीएसपी ने 18 फीसदी से अधिक वोट बटोरे हैं। बीजेपी से नजदीकी के आरोपों और पार्टी से खिसकते नेताओं के बीच बीएसपी ने साबित कर दिया कि उसने अपना बेस बचाकर रखा है। लेकिन, जीत की रेस से वह अब भी काफी दूर हैं।

बुलंदशहर में 2017 की तरह इस बार भी बीएसपी दूसरे नंबर पर रही लेकिन घाटमपुर में उसे कांग्रेस ने पीछे छोड़ दिया। मलहनी में बीएसपी तीसरे से चौथे नंबर पर खिसक गई। 2022 में जिस बीजेपी से उसको लड़ाई लड़नी है, उसका वोट प्रतिशत बीएसपी का दोगुना है। इसलिए पार्टी को दलित वोटों के बेस में अन्य वर्गों के वोट का जोड़ बढ़ाना होगा।

जानकारों का कहना है कि पार्टी प्रमुख मायावती सहित दूसरे आलाकमान को जनता के बीच सक्रियता बढ़ानी होगी। आलाकमान कल्चर से अस्तित्व तो बचा रहेगा पर प्रासंगिकता नहीं।

कांग्रेस : चेहरों की चमक जमीन पर बेअसर
पार्टी के शीर्ष चेहरों के दौरों और आक्रामक आरोपों से उम्मीद तलाश रही कांग्रेस के लिए इनकी चमक अभी जमीन पर बेअसर ही दिख रही है। चुनाव को लेकर पार्टी कितनी गंभीर थी, इसे इससे समझा जा सकता है कि टूंडला में कांग्रेस प्रत्याशी का पर्चा तक खारिज हो गया। कांग्रेस को अपने बूते 7.50 फीसदी वोट मिले हैं।

उन्नाव व घाटमपुर में कांग्रेस मुख्य प्रतिद्वंदी बनकर उभरी लेकिन बाकी चार सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई। इससे साफ है कि पार्टी के कर्णधारों को औपचारिक दौरों से बाहर निकलकर यूपी को स्थायी ठिकाना बनाना होगा। संगठन के कील-कांटे दुरुस्त करने होंगे।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने शानदार जीत के बाद कहा, ‘मोदी-योगी की लोकप्रियता और कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम के चलते शानदार जीत मिली है। सीएम योगी ने 24 घंटे परिश्रम कर प्रदेश के हर नागरिक का कोरोना काल में ध्यान रखा, जिस पर जनता ने अपनी मुहर लगाई। मैं भाजपा के जानदार और शानदार कार्यकर्ताओं को नतमस्तक होकर आभार व्यक्त करता हूं।’

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