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राजस्थान में फिर से जीवंत होगी राजशाही परम्परा, जैसलमेर में नए महारावल का आज राजतिलक

देश में लोकतंत्र की स्थापना को भले ही कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन पूर्व रियासतों में आज भी राजशाही परम्पराओं का निर्वहन किया जा रहा है। ऐसी ही एक परम्परा की तैयारी में इन दिनों जैसलमेर के लोग जुटे हैं। महारावल ब्रजराजसिंह के निधन के बाद शाही परिवार में रिक्त हुए महारावल के पद पर उनके पुत्र चैतन्यराज की ताजपोशी शुक्रवार को की जाएगी। इस आयोजन के माध्यम से एक बार फिर जैसलमेर में शाही परम्पराएं जीवन्त हो उठेगी। इसके लिए जैसलमेर के विश्व प्रसिद्ध सोनार दुर्ग को सजाया जा रहा है।

जैसलमेर के महारावल ब्रजराज सिंह की 28 दिसम्बर को 52 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। शाही परम्पराओं के अनुसार, महारावल के पद को रिक्त नहीं रखा जाता है। ऐसे में उसी दिन उनके बड़े पुत्र चैतन्यराज सिंह के तिलक कर एक बार औपचारिकता निभा दी गई थी। अब मुहुर्त देख शुक्रवार को उनका विधि विधान से राजतिलक किया जाएगा। इसके लिए सोनार फोर्ट में बड़े स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं। फोर्ट को सजाया जा रहा है। साथ ही इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों को आमंत्रण पत्र भेजा गया है।

मुगल भी नहीं जीत पाए थे जैसलमेर को
थार के मरुस्थल में जैसलमेर की स्थापना भारतीय इतिहास के मध्यकाल के प्रारंभ में साल 1178 के लगभग यदुवंशी भाटी के वंशज रावल-जैसल ने की थी। रावल जैसल के वंशजों ने यहां भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक बिना वंश क्रम को भंग किए हुए 770 साल तक सतत शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है। जैसलमेर राज्य ने भारत के इतिहास के कई कालों को देखा व सहा है। यह राज्य मुगल साम्राज्य में भी लगभग 300 वर्षों तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफल रहा।

जैसलमेर शहर पर खिलजी, राठौर, मुगल, तुगलक आदि ने कई बार आक्रमण किया था। लेकिन वे कभी इसे जीत नहीं पाए। भाटियों के इतिहास का यह संपूर्ण काल सत्ता के लिए संघर्ष का काल नहीं था। वरन अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष था, जिसमें ये लोग सफल रहे। भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना से लेकर समाप्ति तक भी इस राज्य ने अपने वंश गौरव व महत्व को यथावत रखा। भारत की स्वतंत्रता के बाद यह भारतीय गणतंत्र में विलीन हो गया। भारतीय गणतंत्र के विलीनीकरण के समय इसका भौगोलिक क्षेत्रफल 16,062 वर्ग मील के विस्तृत भू-भाग पर फैला हुआ था।

पूरी दुनिया से आते हैं सैलानी जैसलमेर

बीकानेर में अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब्‍दी के बीच बनाए गए थे। संकरी गलियों वाले जैसलमेर के ऊंचे-ऊंचे भव्य आलीशान भवन और हवेलियां सैलानियों को मध्यकालीन राजशाही की याद दिलाती हैं। शहर इतने छोटे क्षेत्र में फैला है कि सैलानी यहां पैदल घूमते हुए मरुभूमि के इस सुनहरे मुकुट को निहार सकते हैं। पूरे साल यहां पर्यटकों का जमावड़ा रहता है। जैसलमेर पूरी दुनिया में पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र है।

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