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रूसी वैक्सीन पर एक्सपर्ट्स को भरोसा नहीं, पूरे पांच हैं इसके कारण

नई दिल्‍ली
रूस ने ऐलान किया है कि वह बुधवार को कोरोना के खिलाफ बनी वैक्‍सीन का आधिकारिक लॉन्‍च करेगा। अगर ऐसा होता है तो यह कोरोना महामारी के खिलाफ बनी दुनिया की पहली वैक्‍सीन होगी। लेकिन रूस के दावों पर दुनिया भर के तमाम जानकार सवाल उठा रहे हैं कि क्‍या वाकई रूस इतने कम समय में कोरोना की वैक्‍सीन तैयार कर पाया है।

रूस में इस समय कोरोना के 8 लाख कन्‍फर्म केस हैं। इस लिहाज से रूस अमरिका, ब्राजील और भारत के बाद कोरोना से सबसे ज्‍यादा प्रभावित चौथा देश है। वहां गमाल्‍या इंस्टिट्यूट के अलावा वेक्‍टर स्‍टेट रिसर्च सेंटर ऑफ वायरोलॉजी ऐंड बायोटेक्‍नॉलजी इसकी वैक्‍सीन पर काम कर रहे हैं। यह जो वैक्‍सीन है वह गमाल्‍या की बनी है जो रजिस्‍ट्रेशन के तीन से सात दिन के अंदर नागरिकों पर इस्‍तेमाल के लिए उपलब्‍ध हो सकेगी। लेकिन इस सब के बीच जानकारों को रूस के इस दावे में पांच झोल नजर आ रहे हैं-

पहले कहा सितंबर अब अचानक अगस्‍त

अगस्‍त के शुरू में रूस के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री मिखाइल मुराश्‍कोव ने मीडिया को बताया था कि वैक्‍सीन के क्लिनिकल ट्रायल पूरे हो गए। उम्‍मीद है कि सितंबर में वैक्‍सीन का सीरियल प्रडक्‍शन शुरू हो जाएगा। लेकिन अब अचानक 12 अगस्‍त को लॉन्‍च संदेह पैदा करता है। क्‍योंकि वैक्‍सीन बनने में अमूमन वर्षों और दशकों लग जाते हैं। पर दुनिया भर में कोरोना की भयानक महामारी की वजह से मेडिकल बिरादरी तेजी में लगी है पर रूस इतनी जल्‍दी लॉन्‍च करने की स्थिति में आ गया यह बात कुछ हजम नहीं हो रही।

फेज 2 और 3 के डेटा नहीं
इस वैक्‍सीन के क्लिनिकल ट्रायल पूरे होने का दाव करने वाले इंस्टिट्यूट ने अब तक दूसरे और तीसरे फेज के ट्रायल के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं। ये दोनों फेज यह तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं कि वैक्‍सीन कितनी कारगर और सुरक्षित है। डब्‍लूएचओ ने भी कहा है कि उसके पास रूस की वैक्‍सीन के केवल फेज वन के आंकड़े हैं। डब्‍लूएचओ ने रूस से आग्रह किया है कि वह सभी मानकों का पालन करे।

एक महीने पहले खत्‍म हुआ है फेज वन
ट्रायलसाइट नाम की एक न्‍यूज वेबसाइट का कहना है कि फेज वन खत्‍म हुए अभी एक महीने से ज्‍यादा नहीं हुआ है। इस हिसाब से ट्रायल फेज दो में होने चाहिए। इसलिए बहुत मुमकिन है कि रूसी फेज तीन के क्लिनिकल ट्रायल के बिना ही इसे उतारने वाले हैं।

फेज तीन इसलिए सबसे अहम है क्‍योंकि इसमें ही परखा जाता है कि बड़े पैमाने पर इंसानों में इस्‍तेमाल के लिए वैक्‍सीन कितनी सुरिक्षत है। तमाम दूसरी कंपनियां तीसरे फेज में कम से कम 30 हजार वॉलंटियर पर ट्रायल कर रही हैं। उन्‍हें पूरा होने में वर्षों नहीं तो कम से कम कुछ महीनों का तो वक्‍त चाहिए।

वास्‍तव में टेस्टिंग हुई या नहीं !
रूस की इतनी जल्‍दबाजी से ही संदेह के बादल उठ रहे हैं। अमेरिका के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी ऐंड इन्‍फेक्शियस डिजेज के डायरेक्‍टर डॉ. एंथनी फॉसी ने तो यहां तक कह दिया कि, ‘मैं उम्‍मीद करता हूं कि चीन और रूस के वैज्ञानिक किसी को वैक्‍सीन लगाने से पहले वास्‍तव में उसकी टेस्टिंग करेंगे।’ जुलाई में ऐसी खबरें मिली थीं कि रूसी सभ्रांत वर्ग के कुछ लोगों ने ‘अपने जोखिम’ पर अप्रैल में इस वैक्‍सीन का खुद पर प्रयोग करवाया था।

हथियारों की तरह कहीं ‘वैक्‍सीन की रेस’ तो नहीं
दुनिया विश्‍व शक्तियों के बीच हथियारों की दौड़ देख चुकी है। कोरोना के खिलाफ वैक्‍सीन बनाने में भी वही तेवर देखे जा सकते हैं। कुछ जानकार इसे ‘वैक्‍सीन राष्‍ट्रवाद’ का नाम भी दे रहे हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे अंतरिक्ष में मानव को भेजने और चांद पर इंसान के पहले कदम को लेकर रूस और अमेरिका के बीच होड़ लगी थी।

यह है रूस का जवाब
इन सब सवालों के जवाब में रूस के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय के महामारी विशेषज्ञ निकोलई ब्रिको ने कहा है कि दरअसल रूस ने यह वैक्‍सीन एकदम जीरो से नहीं शुरू की है। इसीलिए हम इतने कम समय में इसे लॉन्‍च करने की स्थिति में आ गए हैं। गमाल्‍या रिसर्च सेंटर में इस तरह की वैक्‍सीन बनाने में माहिर है।

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