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भारत के लिए चीन की सोच- विशाल, प्रभावशाली और ऐसा देश जिससे नहीं ले सकते पंगा

अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेन्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि चीन भारत को एक प्रतिद्वंदी के रूप में देखता है, और भारत के उदय को अपने लिए एक बड़ा खतरा मानता है। चाहे बॉर्डर पर भारत के खिलाफ आक्रामकता दिखानी हो, या फिर अपनी मीडिया के माध्यम से भारत के खिलाफ एक Propaganda War चलाना हो, चीन ने हमेशा से ही भारत पर हावी होने की रणनीति अपनाई है। हालांकि, इन सब के बावजूद चीनी सेना या चीनी सरकार भारत को अपना “दुश्मन” मानने से इंकार करती आई है। भारत को दुश्मन की बजाय एक प्रतिद्वंदी मानकर चीन ने भारत की कोई तरफदारी नहीं की है, बल्कि यह उसकी कमजोरी को दिखाता है। भारत अपने आप में आज एक ऐसी विशाल और प्रभावशाली ताकत बन चुका है कि चीन चाहकर भी भारत को एक “दुश्मन” का दर्जा नहीं दे सकता।

चीन के विवाद सिर्फ भारत के साथ ही नहीं है। चीन ने ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों के साथ भी सींग उलझाए हुए हैं। इन देशों के साथ संवाद के दौरान चीन की भाषा बेहद अपमानजनक ही रहती है। उदाहरण के लिए एक बार चीनी मीडिया ने ऑस्ट्रेलिया के लिए “चीनी जूते पर चिपकी Chewing Gum” जैसे शब्दों का उपयोग किया था। इसके अलावा चीनी मीडिया और सरकार समय-समय पर डोनाल्ड ट्रम्प, स्कॉट मॉरिसन, बोरिस जॉनसन जैसे वैश्विक नेताओं के खिलाफ सीधे तौर पर बयान या लेख लिखती रही है। हालांकि, आज तक कभी चीनी मीडिया प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाते हुए कोई लेख नहीं लिख पायी है। इसके साथ ही चीनी सरकार ने भारत के लिए कभी अपमानजनक या निकृष्ट कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल करने का जोखिम मोल नहीं लिया है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर इसका कारण क्या है?

यह बात खुद चीनी लोगों को पता है कि भारत कोई छोटा-मोटा, ऐसा-वैसा देश नहीं है, बल्कि आने वाले 3 से 4 दशकों में आर्थिक तौर पर उसे पछाड़ने की क्षमता रखने वाला देश है। चाहे आबादी की लिहाज से बात करें या फिर क्षेत्रफल के आधार पर आंकलन करें, भारत हर पैमाने पर चीन की बराबरी के लायक है। भारत में स्किल की कोई कमी नहीं है। भारत पहले ही IT और फ़ार्मा क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित कर चुका है। आज भारत में अंग्रेजी बोलने वाले लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा है, और ऐसे में भारतीय लोग चीनी जनता के मुक़ाबले बाकी दुनिया के साथ बेहतर ढंग से तालमेल बना पाते हैं।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है और दुनिया के अधिकतर देशों में भारत की सॉफ्ट पावर का कोई मुक़ाबला नहीं है। UK, कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में भारतीय मूल के लोग बेहद प्रभावशाली माने जाते हैं। इन सब मामलों में भारत के सामने चीन अपने आप को बौना पाता है। भारत का कद इतना बड़ा है कि चीन चाहकर भी भारत को नज़रअंदाज़ करने की भूल नहीं कर सकता।

भारत को छोड़ दें तो चीन शायद ही दुनिया में किसी और देश को अपने प्रतिद्वंदी के तौर पर स्वीकार करता है! ऐसा इसलिए क्योंकि अहंकार से भरपूर चीनी सेना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया में सिर्फ अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहती है, और उसे भारत के अलावा कोई और ऐसा देश नहीं दिखाई देता जो चीन के इस राह में रोड़ा बन सके। भारत में आज जिस प्रकार मोदी सरकार ने सैन्य और राजनीतिक स्तर पर इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उसने चीनी सेना और चीनी सरकार को बेहद प्रभावित किया है। यही कारण है कि दुनिया के खिलाफ बेहद असभ्य कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल करने वाले चीनी राजनयिक भारत पर बोलते हुए अपने शब्दों को तोलना शुरू कर देते हैं। भारत का कद, ऐतिहासिक विरासत, आर्थिक और सैन्य शक्ति और अपार क्षमता ही ऐसे कुछ कारण है जिसकी वजह से चीन भारत को एक “दुश्मन” नहीं बल्कि एक प्रतिद्वंदी मानने के लिए विवश है।

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