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सऊदी अरब ने लिख दी इमरान की किस्मत में बर्बादी, पाकिस्तान में गृहयुद्ध हुआ पक्का !

नई दिल्ली. आज जब हमें दुनिया भर से नकारात्मक खबरे मिल रहीं हैं। स्वास्थ्य से लेकर अर्थव्यवस्था तक में हालत खराब है। नेपाल सरीखे पड़ोसी तक हमें आंखें दिखा रहे हैं तो उस समय एक ऐसी खबर आई है जिसे हम सकारात्मक कह सकते हैं। आतंकवाद व आतंकियों के आका व उसके रहनुमा पाकिस्तान से सऊदी अरब के रवैए में गजब का बदलाव हैं। इस्लाम धर्म व इस्लामी देशों की आड़ में पाकिस्तान हमें विश्व स्तर पर लगातार घेरने की कोशिश करता आया है। इस बार जम्मू कश्मीर के मुद्दे को लेकर दोनों के संबंधों में थोड़ी खटास पड़ती दिखाई दे रही है।

भारत द्वारा वहां अनुच्छेद 370 समाप्त कर देने के बाद पाकिस्तानी मंत्री शाह महमूद कुरेशी ने जो कि अपनी बदजुबानी के लिए दुनिया भर में कुख्यात हैं कुछ ऐसा कह दिया जिससे सऊदी अरब उनसे खास नाराज हो गया है।  वहां के भावी प्रमुख क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नाराजगी को दूर करने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को वहां दौड़ कर जाना पड़ा। उन्हें अभी तक शाह ने मिलने के लिए समय नहीं मिला है। इस देश के आर्थिक हालात की खस्ता हालात को देखते हुए पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरेशी चीन के विदेश मंत्री वांग यी के दर पर मत्था टेकने के लिए भागे गए।

दोनों के पाकिस्तान से दशको से आपसी रिश्ते काफी मधुर रहे हैं। जब 1971 का युद्ध हुआ तो सऊदी अरब ने बांग्लादेश को आजाद करने के बाद भी भारत की कड़ी आलोचना करते हुए उसे हर तरह से गलत करार देते हुए पाकिस्तान के अंदरूनी मामलो में दखलंदाजी कहा था। यहां तक आरोप था कि भारत पाकिस्तान के टुकड़े करना चाहता है जो कि गैर इस्लामिक हैं।

युद्ध के दौरान पाकिस्तान की मदद करने के लिए सऊदी अरब ने उसे 75 लड़ाकू विमान भी उधार दिए थे। जब भारत ने 90,000 पाकिस्तानी सैनिको को बंधक बनाया तो सऊदी अरब अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उन्हें रिहा करने के लिए दबाव डालने लगा। जब भारत ने ढाका में अत्याचार की इंतहा करने वाले 195 लोगों पर मुकदमा चलाने का फैसला किया तो सऊदी अरब ने उसका विरोध करते हुए भारत को उन्हें मुकदमा चला कर सजा देने से रोका।

युद्ध समाप्त होने पर बरबाद हो गए पाकिस्तान को अपने पैरो पर खड़ा करने के लिए वह सामने आया व उसने पाकिस्तान को 10 लाख पौड़ की रकम दी ताकि वह युद्ध के लिए हथियार खरीद सके। इस पैसे से पाकिस्तान ने एफ-16 लडाकू विमान व मिसाइले अमेरिका से खरीदी। जब पाकिस्तान पर परमाणु विस्फोट करने के बाद दुनिया भर में प्रतिबंध लगाए गए तो इस देश ने उसको उधार तेल व मोटी विदेशी मुद्रा देकर उसे आर्थिक रूप से बरबाद होने से रोका।

पिछले दो दशको में देखा गया है कि जब भी पाकिस्तान पर आर्थिक संकट मंडराया है तो सऊदी अरब ने सबसे आगे आकर उसको मदद की। वह उसे पैसा न होने पर उधार तेल देता रहा। यह वजह थी कि जब पहली बार नवाज शरीफ का प्रधानमंत्री पद से तख्ता पलट कर उन्हें मौत की सजा देने की कोशिश की गई थी तब सऊदी अरब ने उन्हें बचाते हुए अपने यहां शरण दी। इतना ही नहीं पाकिस्तान में इस्लामी आतंकवाद को पनपाने का काम कर रहे हजारो मदरसो को सऊदी अरब बहुत मोटी आर्थिक मदद दे रहा है। वहीं पाकिस्तान की मदद करने आए इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी की सोच में कुछ समय से बदलाव आ रहा है। सऊदी अरब इसका प्रमुख है।

जब 1990 में पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दिया तो दिखावे के लिए ही वही ओआईसी ने सार्वजनिक तौर पर इस तरह की घटनाओं की आलोचना करनी शुरू कर दी। जब पिछले साल मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत दिया जाने वाला विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किया तो पाकिस्तान बौखला गया। उसने ओआईसी पर भारत के इस कदम की भर्त्सना करने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया। मगर भर्त्सना तो दूर रही भारतीय कूटनीति सफलता तब नजर आई जब सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात ने इस कदम की भर्त्सना करना तो दूरा रहा कमोवेश ऐसे बयान जारी किए जोकि भारत के इस कदम को उसका अंदरूनी मामला करार दे रहे थे।

पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद टर्की व मलेशिया को छोड़कर किसी इस्लामी देश ने भारत के इस कदम की आलोचना नहीं की। सऊदी अरब के भावी शासक अल सलमान के सक्रिय होने के बाद उनकी व सऊदी अरब की सोच में भारत के प्रति अंतर आया है। वे अपने देश की अर्थव्यवस्था को सिर्फ तेल तक ही सीमित नहीं रखना चाहते हैं। उनकी तरह संयुक्त अरब अमीरत के क्राउन प्रिंस व होने वाले शासक मोहम्मद बिन भारत के साथ अपने आर्थिक रिश्ते सुधार कर भारत में भारी निवेश करना चाहते हैं। चीन, अमेरिका व जापान के बाद सऊदी अरब भारत का चौथा सबसे बड़ा आर्थिक भागीदार है।

भारत अपनी जरूरत का 18 फीसदी तेल व सात फीसदी पैट्रोलियम गैस सऊदी अरब से खरीदता है। भारत का यह अनुभव रहा है कि इस्लामी देश होने के कारण सऊदी अरब अभी तक पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी रखता आया है व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसका समर्थन करता रहा है। भारत में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सऊदी अरब ने वहां सबसे बड़ी अलअस्क नामक मस्जिद में उनको बुलाकर उनका सम्मान किया व कुछ समय पहले सऊदी अरब की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी आर्मको ने भारतीय कंपनी रिलायंस में हिस्सेदारी हासिल की।

इस सबकी एक बड़ी वजह अरब क्षेत्र में बदलता राजनीतिक संतुलन है व तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयब एर्दोगन द्वारा मुस्लिम देशों के नेता बनने की कोशिश के कारण सऊदी अरब उससे व पाकिस्तान से नाराज होना है। तुर्की ने कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन किया था। यह तो समय ही बताएगा कि सऊदी अरब व पाकिस्तान के संबंधों में मौजूदा तनाव कब तक रहते है व कहां तक जाते हैं। उसने पाकिस्तान को उधार दिए गए कर्ज को भी वापस मांग लिया हैं।

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