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सीमा पर जब होता फौजी तो कैसे कटती है पत्नी की जिंदगी, जरूर पढ़ें नेहा की ये रियल स्टोरी

ये बात तो हम सभी जानते हैं कि एक फौजी की लाइफस्टाइल कितनी कठिन होती है इतना ही नहीं इस कठिन लाइफस्टाइल के दौरान भी वो बेहद ही ज्यादा खुश दिखाई देते हैं। लेकिन ये बात तो बहुत कम लोग जानते होंगे कि जिनती ज्यादा एक फौजी की जिंदगी में कठिनाईयां आती है उससे कई गुना ज्यादा उनकी पत्नियों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि इस बात का अंदाजा आप खुद भी लगा सकते हैं जब पुलवामा में शहीद हुए जवानों के परिवारों के आंसू निकल रहे थें लेकिन फिर भी उन्हे इस बात का गर्व था कि उनके पति शहीद हुए है।

ये बात तो हम सभी जानते ही होंगे कि जब कोई जवान फौज में होता है और सीमा पर तैनात होता है लेकिन क्या आपको ये पता है कि उससे कोसों दूर उसकी पत्नी की जिंदगी कैसी होती है? ये एक वाकई में बेहद बड़ा सवाल है तो आज हम आपको इस पोस्ट के जरिए यही बताने जा रहे हैं। जी हां आपको बता दें कि हाल ही में एक फौजी की पत्नी ने अपनी कहानी शेयर कि है जिसमें उन्होने बताया है कि एक फौजी की पत्नी की लाइफ कैसी होती है। दरअसल सबसे पहले तो हम आपको ये बता दें कि जिसके बारे में हम बात कर रहे हैं उनका नाम नेहा कश्यप है जो कि एक फौजी की पत्नी हैं। इन्होने ‘ह्यूमंस ऑफ बॉम्बे’ नाम के फेसबुक पेज पर लिखा उनका एक पोस्ट इन दिनों वायरल है। कई लोग इसे पढ़ चुके हैं और अब तक 10 हजार से ज्यादा बार इसे शेयर किया जा चुका है।

दरअसल नेहा ने इस पोस्ट के जरिए बताया कि वो अपने पति से पहली बार मिलने से लेकर उन तमाम अहसासों को जाहिर कर रहीं हैं जो किसी को भी भावुक कर देगा। ‘हम पहली बार तब मिले जब मैं सिंबॉयोसिस में लॉ की पढ़ाई कर रही थी और वो अकेडमी में कैडेट थे। सबकुछ बड़े मजेदार अंदाज में शुरू हुआ। मैं और मेरी दोस्त हर हफ्ते के अंत में 11 रुपए में एक बस पकड़ कर एनडीए की अकेडमी पहुंच जाया करते थे। केवल इसलिए कि वहां कैंटीन में खाना बहुत सस्ता होता था और इस दौरान हम हम दोस्त बने, लेकिन बहुत जल्द वे देहरादून के आईएमए चले गए और फिर एक ऑफिसर के तौर पूरे भारत में कई जगह उनका तबादला होता रहा।

इसके बाद नेहा ने कहा कि आप विश्वास करें या नहीं, इस सबके दौरान हम केवल चिट्ठियों के जरिए एक-दूसरे के संपर्क में रहे। वो 2002 का साल था और मोबाइल फोन अभी भारत में बस आया ही था। इसलिए हम चिट्ठियों से ही एक-दूसरे से अपनी जिंदगी, अपनी रोजमर्रा के किस्से-कहानियों को साझा करते थे, वे चिट्ठियां बचकानी होती थीं, लेकिन शानदार भी। क्योंकि उन्हीं चिट्ठियों के जरिए मैं जान सकी कि एक व्यक्ति के तौर पर वे कितने सहज और सामान्य इंसान हैं। छह साल ऐसे ही निकल गए। और आखिरकार एक दिन उन्होंने मुझे एसएमएस किया- ‘मेरे दिल में तुम्हारे लिए अहसास हैं और मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं।’

इस संदेश के साथ ही सब तय हो गया और फिर इसके बाद शादी के बाद मैं उनके साथ भटिंडा चली गई। जहां मैं घर से वकालत का काम करती थी। हम तब करीब ढाई साल साथ रहे और वाकई वो दिन खास थे लेकिन एक प्रोफेशनल होने के नाते में जानती थी कि हर दो साल पर मैं उनके साथ यहां से वहां नहीं जा सकती थी। कई जगहें जहां उनकी पोस्टिंग हुई, वो ऐसी थीं कि मैं वहां केवल पढ़ाने का काम कर सकती थी। लेकिन मैं टीचर तो नहीं हूं, वकील हूं। जिसके बाद हम दोनों ने फैसला लिया कि मैं बॉम्बे चली जाउंगी ताकि अपना कॅरियर आगे बढ़ा सकूं और वो अपनी पोस्टिंग के हिसाब से अपना काम जारी रखेंगे। ये हम दोनों के लिए बेहद मुश्किल था।

पर कुछ समय बाद चार-चार महीने पर मिलना और वो 15 दिन उनके साथ बिताना मेरे लिए जैसे सबकुछ होता था। नेहा ने आगे बताया की वे फिलहाल विमानन में हैं। कई दिन ऐसे होते हैं जब मैं अचानक बेचैनी में जगती हूं और उनसे कहती हूं कि तुम आज उड़ान मत भरो। कई दिन ऐसे होते हैं जब मुझे उनकी बहुत कमी महसूस होती है और फिर मेरी बेटी मेरा ढांढस बढ़ाते हुए कहती है कि ये जो भी हो रहा है, हमारे देश के लिए है। हमारी आदत है कि हम अपने जवानों को खो देने के बाद उन्हें याद करते हैं, उन्हें शुक्रिया कहते हैं। लेकिन हमें तो उन्हें रोज शुक्रिया कहना चाहिए। रोज उनके लिए खुशियां मनानी चाहिए।

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