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सेना का साहस : LAC पर वो सीक्रेट मिशन, रक्षामंत्री तक को जिसकी नहीं लगी खबर !

मैं 2008 में वेस्टर्न एयर कमांड का कमांडर इन चीफ बना। इस कमान का दायरा लद्दाख से लेकर राजस्थान के मरुस्थल तक है। मेरे मातहत करीब 60 एयरफोर्स स्टेशन थे। वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास उस दुर्गम इलाक़े में हमारी सेना और पैरामिलिट्री फोर्स के जवान तैनात रहते हैं। हम सोच रहे थे कि उन जवानों को तमाम ज़रूरी चीज़ें आसानी से कैसे पहुंचाई जाएं, तभी हमारा ध्यान दौलत बेग ओल्डी की ओर गया।

हमने लद्दाख में अग्रिम इलाके में मौजूद दूसरी हवाई पट्टियों के हिसाब से भी योजना बनाई थी। इनमें थोइसे, चुशूल और फुकचे शामिल थे। लेकिन दौलत बेग ओल्डी कई वजहों से दूसरों से बेहतर दिख रहा था। एक तो यह दुनिया में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद लैंडिंग ग्राउंड है। दूसरी बात कि यह काराकोरम दर्रे से कुछ ही किलोमीटर दूर है।

यह हवाई पट्टी 1962 में चीनियों पर नज़र रखने के लिए बनाई गई थी। साथ ही, ग्लेशियर के रास्ते पाकिस्तानी घुसपैठ की कोशिश को भी वहां से रोका जा सकता था। लेकिन 1965 में वह लैंडिंग ग्राउंड बंद करना पड़ा। हम सामान वगैरह पहुंचाने के लिए वहां हेलिकॉप्टर तो भेजते रहे, लेकिन उतनी ऊंचाई तक हेलिकॉप्टर ले जाना सुरक्षित नहीं था।

1962 की जंग के बाद आर्मी के इंजीनियरों ने यह लैंडिंग ग्राउंड बनाया था। उन्होंने शानदार काम किया, लेकिन फिर एक फैसला लिया गया कि उस ऊंचाई तक दो इंजन वाला कोई एयरक्राफ्ट नहीं ले जाना है। ख़तरा यह था कि टेक-ऑफ के दौरान अगर एक इंजन फेल हो गया तो सबकी मौत तय थी।

उस समय केवल पैकेट ही एकमात्र जहाज़ था, जो दौलत बेग ओल्डी तक ले जाने लायक था। दो इंजन वाले इस विमान में यहां अपने देश में बदलाव किया गया था और इसमें एक और छोटा इंजन लगा दिया गया था। तो इस तरह यह तीन इंजन वाला जहाज़ बन गया था। लेकिन इसके उपयोग की सीमा यानी लाइफ साइकल 1965 में पूरी हो गई और इसे सेवा से हटा दिया गया।

इस तरह उस हवाई पट्टी का इस्तेमाल भी बंद हो गया। वह इलाक़ा अब भी बहुत दुर्गम है। ऑक्सिजन बहुत कम है वहां। कोई पेड़-पौधा वहां नहीं है। तब जवानों को चौकी तक पहुंचने के लिए कई दिन पैदल चलना पड़ता था।

ऐसा नहीं है कि दौलत बेग ओल्डी की हवाई पट्टी दोबारा चालू करने के लिए कोई कोशिश नहीं हुई। चीन की ओर से ख़तरे को देखते हुए उन 43 वर्षों में कम से कम पांच प्रयास किए गए थे। मैं भी चाहता था कि एयर स्ट्रिप चालू हो जाए।

इस सिलसिले में ही उन पांच प्रयासों की जानकारी मुझे मिली। लेकिन उनसे जुड़ी फ़ाइलें देखने के बाद मुझे अहसास हुआ कि अगर मैंने एक और फ़ाइल बनाई और लिखित अनुरोध किया तो आगे नहीं जा सकूंगा। वजह चाहे जो रही हो, लेकिन पहले की सभी फ़ाइलों पर मनाही कर दी गई थी।

तो मैंने तय किया कि कोई लिखा-पढ़ी करनी ही नहीं है। मैंने फिर आर्मी में अपने समकक्ष अफसरों से बात की। एयरफोर्स के चुनिंदा अफसरों को बताया। इस तरह हवाई पट्टी की स्थिति और तैयारियों के बारे में फटाफट जानकारी जुटाई गई। यह पूरी जानकारी मौखिक ही थी।

हमें पता चला कि वहां ग्राउंड पर कोई बड़ी टूट-फूट नहीं हुई है। हमें उड़ान के दौरान कुछ एहतियात बरतनी थी, क्योंकि एएन-32 विमान 14000 फुट से ज्यादा ऊंचाई पर लैंड करने लायक नहीं होता। लैंड करने से ज्यादा दिक्कत वहां से टेक-ऑफ करने में थी। हम चिंता में थे कि अगर एक इंजन बंद हो गया तो क्या होगा। फिर हमने चुपचाप स्पेशल ट्रेनिंग ली ताकि सुरक्षा उपाय बेहतर किए जा सकें। हमने कई सूरतों पर गौर किया था। मसलन, अगर इंजन बंद किए बिना एक टायर बदलना पड़ा तो क्या करेंगे।

हमने उड़ान भरने के लिए 31 मई 2008 की तारीख तय की। वक़्त करीब आया तो मैंने उस समय के वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल फली होमी मेजर और तब के आर्मी चीफ जनरल दीपक कपूर से बात की। यह बातचीत दिल्ली के एयरफोर्स गोल्फ कोर्स में हुई। मैंने दोनों से मौखिक अनुमति ली। मैंने मिशन की जानकारी प्रदीप नायक को भी दी थी, जो तब वायु सेना उप प्रमुख थे। रक्षा मंत्री को तो तब पता चला, जब हमने मिशन पूरा कर लिया।

फिर वह अहम दिन आया। एएन-32 विमान में हम पांच लोग थे। एयरफोर्स के दो पायलट, एक नेविगेटर, एक गनर और मैं। हमने चंडीगढ़ से उड़ान भरी थी। हम सुबह नौ बजे से ठीक पहले दौलत बेग ओल्डी पहुंच गए थे। पूरा मिशन सीक्रेट था। मेरी पत्नी को किसी तरह कुछ अंदाज़ा हो गया था, लेकिन विमान में सवार दूसरे लोगों की पत्नियों को इस मिशन की जानकारी नहीं थी।

वहां पहाड़ी पर हम कुछ देर रहे। लौटते वक्त आर्मी के एक सीनियर अफसर भी हमारे साथ आ गए। दौलत बेग ओल्डी से टेक-ऑफ करना अब तक याद है। ऐसा लगा कि हम ऊंट पर सवार हैं। ग्राउंड पूरी तरह समतल नहीं था और हिचकोले से लग रहे थे। इसके बावजूद विमान टेक-ऑफ कर गया। वहां से हम थोइसे उतरे। उसके बाद चंडीगढ़ में हमने लैंड किया। एक और जहाज़ भी था, जो हम पर नज़र रखने के लिए उड़ रहा था। चंडीगढ़ से हम तुरंत ही दिल्ली आ गए। इस तरह दौलत बेग ओल्डी एयर स्ट्रिप को हमने दोबारा चालू कर दिया।

चीनियों को जब इसका पता चला तो वे सन्न रह गए। बाद में 2013 में चार इंजनों वाला सी-130 हरक्युलिस विमान वहां ले जाया गया। हमने साबित किया है कि हम सक्षम हैं। वैसे भी 1962 पुरानी बात है, अब हम 2020 में हैं।

(रिटायर्ड एयर मार्शल पीके बरबोरा से बातचीत पर आधारित)

लेख साभार- नवभारत गोल्ड

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