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15 अगस्त विशेष : स्वतंत्र भारत का पहला दिन ऐसे बिताये थे गांधी जी

15 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कलकत्ता में थे. कई दिनों से हिंदू-मुस्लिम दंगों की आग में झुलस रहे इस शहर में उनकी कोशिशों के चलते काफी हद तक अमन कायम हो गया था. आजादी के दिन की उनकी गतिविधियां :

1 – लंदन की अपनी मित्र अगाथा हैरीसन को पत्र

ओल्ड जॉर्डन हॉस्टल

बीकंसफील्ड बक्स के पास, एसडब्ल्यू-2

यह पत्र मैं चरखा कातते हुए लिख रहा हूं. तुम्हें पता है कि आज जैसे बड़े अवसरों को मनाने का मेरा तरीका यह है कि मैं भगवान को धन्यवाद देता हूं और इसलिए पूजा करता हूं. पूजा के साथ उपवास रखना भी जरूरी है अगर फलों का रस लेने के बाद भी ऐसा कहा जा सकता है. और इसके बाद गरीब-गुरबों के संघर्ष से जुड़ने और समर्पण के लिए चरखा कातना जरूरी है. इसलिए मुझे जितना चरखा मैं रोज कातता हूं उससे कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए और अपने दूसरे कामों के साथ जितना हो सके उतना इसे करना चाहिए.

मुझे अमृत (राजकुमारी अमृत कौर) के हाथों सुबह चार बजे तुम्हारा पहला पत्र मिला. उसके द्वारा मुझे तुम्हारा दूसरा पत्र भी मिला. इसे पश्चिम बंगाल के गवर्नर, राजाजी लेकर आए थे लेकिन वे खुद नहीं आ सके. उनके घर को उनके प्रशंसकों ने बहुत बड़ी संख्या में घेरा हुआ है. इसलिए वे अपने ही घर में कैदी हो गए हैं. उन्होंने अपने सचिव के हाथों राजकुमारी (अमृत कौर) का पैकेट भिजवा दिया.

तुमने विंटर्टन के भाषण में मेरा जिक्र किया लेकिन तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि उसे मैंने नहीं पढ़ा है. इंडिपेंडेस बिल पर हुई बहस के दौरान हुए भाषणों को भी मैं नहीं पढ़ सका. मुझे अखबार पढ़ने का समय ही नहीं मिलता. उनके कुछ हिस्से या तो मुझे पढ़कर सुनाए जाते हैं या मैं कभी-कभार उनपर नजर मार लेता हूं. इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन मेरे बारे में अच्छा या बुरा कहता है अगर मैं बुनियादी रूप से सही हूं. तुम्हें और मुझे तो जितना अच्छे से हो सके अपने काम करने चाहिए और खुश रहना चाहिए. इसलिए अखबारों से छुट्टी. अब मैं चरखा बंद करने वाला हूं और मुझे और काम करने हैं.

सभी हमारे मित्रों को मेरा प्यार. मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कार्ल हीथ इतने स्वस्थ थे कि तुम्हारे द्वारा बताए सम्मेलन की अध्यक्षता कर सके. मेरी कितनी इच्छा है कि मैं तुम्हें यहां जो चल रहा है उसके बारे में बताऊं. शायद होरेस बताएंगे. वे कुछ दिनों तक मेरे साथ थे और कल रात ही गए हैं.

प्यार.

बापू

2 – रामेंद जी सिन्हा को लिखी चिट्ठी, सिन्हा ने बापू को लिखा था कि कैसे दंगों को रोकने की कोशिश में उनके पिता की जान चली गई.

रामेंद्र जी सिन्हा

गोपाल मलिक लेन, बोबाजार

कलकत्ता

प्रिय मित्र,

मुझे आपकी बात माननी पड़ेगी कि आपके पिता में वीरों वाली अहिंसा थी. ऐसे लोग कभी नहीं मरते. उनके लिए शरीर के नाश का कोई अर्थ नहीं है. इसलिए ऐसे वीर पिता की मृत्यु के लिए आपका या आपकी मां का या फिर किसी का भी शोक करना ठीक नहीं है. अपनी इस मृत्यु से उन्होंने ऐसी समृद्ध विरासत छोड़ी है जिसके बारे में मुझे आशा है कि आप सब लोग खुद को उसके योग्य साबित करेंगे. सबसे अच्छी सलाह मैं यही दे सकता हूं कि आज हमें जो आजादी मिली है उसको बनाए रखने के लिए आप सबको हरमुमकिन कोशिश करनी चाहिए. और जो पहला काम आप कर सकते हैं वह है अपने पिता की वीरता का अनुकरण.

अहिंसा से भरी वीरता कई तरह से दिखाई जाती है. इसके लिए जरूरी नहीं है कि आपको किसी हत्यारे के हाथ मरना पड़े. इसमें कोई दोराय नहीं कि अगर आप के प्रियजनों की मृत्यु के लिए आपको उचित न्याय मिलता है तो यह भी अपने आप में बड़ी मुश्किलों से हासिल हुई आजादी को बनाए रखने में एक योगदान होगा.

आपका

एमके गांधी

3 – पश्चिम बंगाल के मंत्रियों को सलाह’

आज से आपको कांटों का ताज पहनना है. सत्य और अहिंसा को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कोशिश करते रहें. विनम्र रहें. धैर्यवान बनें. इसमें कोई शक नहीं कि ब्रिटिश राज ने आपकी कड़ी परीक्षा ली है, लेकिन आगे भी यह परीक्षा बार-बार होती रहेगी. सत्ता से सावधान रहें. सत्ता भ्रष्ट बनाती है. इसकी चमक-दमक में खुद को फंसने मत दें. आपको याद रखना है कि आपको भारत के गांवों में रह रहे गरीब की सेवा के लिए यह सत्ता मिली है. ईश्वर आपकी सहायता करे.’

4 – सी राजगोपालाचारी से मुलाकात

प. बंगाल के नए राज्यपाल सी राजगोपालाचारी ने गांधीजी से मुलाकात करके उन्हें कलकत्ता में हो रहे दंगों को रोकने पर बधाई दी थी. सारी दुनिया गांधीजी के इस काम को चमत्कार कह रही थी लेकिन उनका कहना था कि उन्हें तब तक तसल्ली नहीं होगी जब तक हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के साथ सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे और अपने घर लौटकर पहले की तरह ही जिंदगी बसर नहीं करने लगेंगे. उनका कहना था कि अभी भले ही जोश दिखाया जा रहा हो, लेकिन जब तक दिल पूरी तरह नहीं मिलते तब तक आगे फिर हालात बिगड़ने की आशंका है.

5 – कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के साथ बातचीत

दो बजे, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ सदस्यों के साथ गांधीजी की बातचीत हुई. इसमें गांधीजी ने कहा कि राजनीतिक कार्यकर्ता साम्यवादी हों या समाजवादी, उन्हें आज से सारे मतभेद भुलाकर बड़ी कोशिशों से हासिल इस आजादी को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए. उनका कहना था, ‘क्या हम इस आजादी को बिखरने देंगे?’ दरअसल देश में हिंदू-मुस्लिम एकता के मुद्दे पर वह मजबूती नजर नहीं आ रही थी जो ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ाई में दिखी थी. आजादी के मौके पर आयोजित समारोह के बारे में गांधीजी का कहना था, ‘मैं इस जश्न में शामिल नहीं हो सकता, मुझे यह अच्छा नहीं लग रहा.’

6 – छात्रों से बातचीत

गांधीजी ने विस्तार से इस पर बात की कि क्यों अब टकराव तुरंत रुकना चाहिए. उनका कहना था, ‘हमारे पास अब दो देश हैं और दोनों में ही हिंदू और मुस्लिम नागरिकों को रहना है. अगर ऐसा है तो इसका मतलब है टू नेशन थ्योरी या द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा का अंत. छात्रों को विचार करना चाहिए और अच्छी तरह से विचार करना चाहिए. उन्हें ख्याल रखना चाहिए कि उनसे कोई गलत काम न हो.’ गांधी जी ने यह भी कहा कि भारत में रहने वाले किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए परेशान करना गलत है कि उसका धर्म अलग है. छात्रों को एक ऐसा नया भारत बनाने के लिए हरमुमकिन कोशिश करनी चाहिए जिस पर हर कोई गर्व करे.

गांधीजी ने हिंदुओं और मुसलमानों के फिर मेलजोल पर कलकत्ता को बधाई दी. हिंदुओं और मुसलमानों ने एक जैसे जोश के साथ तिरंगा लहराया और नारे लगाए. इससे भी बड़ी बात यह हुई कि मुसलमान अपने हिंदू दोस्तों को मस्जिदों में ले जा रहे थे और हिंदू अपने मुसलमान मित्रों को मंदिरों में. इन खबरों ने गांधी को खिलाफत आंदोलन के समय की हिंदू-मुस्लिम एकता की याद दिला दी. बल्कि कहा जाए तो इस एकता का महत्व खिलाफत के समय की एकता से भी ज्यादा था. इसकी सीधी वजह यह थी कि हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को ही दंगों का जहर पीना पड़ा था. उसके बाद दोस्ती का यह अमृत तो उन्हें और भी अच्छा लगना चाहिए था. गांधीजी ने उम्मीद जताई कि हावड़ा सहित पूरा कलकत्ता सांप्रदायिकता के इस राक्षस से हमेशा के लिए पूरी तरह आजाद हो जाएगा.

हालांकि वे इन खबरों से दुखी थे कि लाहौर में सांप्रदायिक उन्माद की यह आग अब भी धधक रही है. उन्होंने उम्मीद जताई कि कलकत्ते के इस उदाहरण का पंजाब और भारत के बाकी हिस्सों पर भी असर होगा. इसके बाद गांधीजी ने चटगांव में हुए दंगों का जिक्र किया और कहा कि यह पूरे बंगाल का कर्तव्य है कि वह चटगांव के लोगों के दर्द को अपना दर्द समझे.

इसके बाद गांधीजी ने एक और घटना का जिक्र किया. भारत की आजादी की खबर सुनकर उस दिन खुशी से झूमते लोगों की एक विशाल भीड़ ने गवर्नर हाउस पर कब्जा कर लिया था और राज्यपाल राजाजी वहां से बाहर नहीं निकल पा रहे थे. गांधीजी ने कहा कि उन्हें खुशी है कि अगर यह सिर्फ जनसाधारण के हाथ में आई ताकत का संकेत हो. लेकिन अगर लोग यह सोच रहे हैं कि वे सरकारी या किसी दूसरी संपत्ति के साथ जो चाहे कर सकते हैं तो उन्हें बहुत दुख होगा. गांधीजी का कहना था कि यह आपराधिक अराजकता होगी. उन्होंने उम्मीद जताई कि ये लोग राजभवन को जितना जल्दी हो सके, खुद ही खाली कर देंगे. गांधीजी ने लोगों को चेताया कि उन्हें इस आजादी का बुद्धिमानी और संयम के साथ इस्तेमाल करना है.

(कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी से)

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