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40 वर्षों में चीन से आखिर कैसे पिछड़ गया भारत, क्या सरकारें नहीं हैं जिम्मेदार?

पहले डोकलाम फिर पूर्वी लद्दाख और इस बीच में सैकड़ों अन्य घुसपैठ के बीच केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार देश में विपक्ष के निशाने पर है। सरकार पर आरोप लग रहा है कि वह चीन का समुचित जवाब नहीं दे रही है। लेकिन क्या यह सच्चाई है कि पिछले 6 वर्षों में ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री काल में चीन से भारत कमजोर हो गया है, जो चीन आए दिन उसे आंखें दिखाता है, बल्कि, भारतीय भूभाग कब्जाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।

आंकड़े कहते हैं कि ऐसा नहीं है। चीन ने पिछले 40 वर्षों के दौरान सुदृढ़ प्रबंधन के जरिए भारत को हर क्षेत्र में मात दी है। अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरीकरण, रेल और परिवहन और सैन्य क्षमता जैसे सभी क्षेत्रों में भारत को मीलों पीछे कर दिया। भारत गरीबी हटाओ के नारों से ज्यादा आगे नहीं बढ़ सका। इस भारी उठापटक के लिए 1980 के बाद भारत में बनीं सरकारें गंभीर रूप से जिम्मेदार हैं। इनमें कांग्रेस और 90 के दशक में रही गठबंधन की सरकारें भी शामिल हैं। सच्चाई तो ये है कि सरकारों की नीतिगत जड़ता और वोट जुटाऊ योजनाओं के कारण भारत को उपभोक्ता बाजार के रूप में खड़ा कर दिया गया है। देश को चीनी उत्पादों के खिलाफ आजादी पाने का उपाय करने के लिए विरोधाभासी और स्वार्थी लोगों के बीच नाकों चने चबाने होंगे।

चीन वर्तमान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और खुद को एक महाशक्ति मानता है। हालांकि 1980 के दशक में सुधारों के पहले भारत और चीन की अर्थव्यवस्था में कोई ज्यादा अंतर नहीं था। बल्कि कई मोर्चों पर भारत चीन से आगे था लेकिन भारतीय राजनेताओं में इच्छाशक्ति की भारी कमी और चीन के प्रयासों ने इसमें बड़ा अंतर पैदा कर दिया है। इसलिए जंग सिर्फ सीमा पर ही नहीं है। युद्ध इन क्षेत्रों में भी लड़े जाने चाहिए।

अर्थव्यवस्था

वर्तमान में चीन की अर्थव्यवस्था 13608अरब डालर की जीडीपी बन चुकी है तो भारत 2718 अरब डालर की जीडीपी वाला देश है। 1980 में भारत 186.3 अरब डालर की जीडीपी के साथ चीन (191.1 अरब डालर) के आसपास था। हालांकि औसत भारतीय चीन की तुलना में करीब 40 फ़ीसदी अधिक अमीर था। चीन के प्रति व्यक्ति $195 के मुकाबले भारतीय उसके पास $260 थे।

रेल और परिवहन

परिवहन के क्षेत्र में चीन ने भारी प्रगति की है। 1974 में उनके विमानों के जरिए केवल 700000 यात्रियों ने यात्रा की जबकि भारतीय विमानों पर 3000000 यात्रियों ने सफर किया था। अब, चीनी विमान भारतीय विमानों के मुकाबले करीब 4 गुना अधिक उड़ान भरते हैं। यह संख्या 2018 में चीन के लिए 61.14 करोड़ और भारत के लिए 16 करोड़ थी। रेल नेटवर्क के मामले में तब चीन भारत से पीछे था। 1980 के दशक में भारत का रेल नेटवर्क 61240 किलोमीटर का था, जबकि चीनी रेल नेटवर्क 51700 किलोमीटर था। 2017-18 तक भारत का नेटवर्क मामूली बढ़त के साथ 68442 किलोमीटर हो सका। इसके विपरीत चीन का रेल नेटवर्क दोगुनी रफ्तार से 127000 किलोमीटर हो गया। सड़क मार्ग का भी ऐसा ही हाल है। हैरत इस बात की भी है कि अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने सड़क और रेल परियोजनाओं के विकास में गति को आगे बढ़ाया लेकिन 2004 के बाद 10 सालों तक रही कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने दोनों क्षेत्रों की इस बढ़त को गंवा दिया। आगे बढ़ने के बजाय सरकार पीछे लौट पड़ी।

शिक्षा और शहरीकरण

शहरीकरण के मामले में भी भारत की चीन से पीछे छूट गया है। चीन में करीब 60 फ़ीसदी लोग शहरों में रहते हैं जबकि 35 फ़ीसदी भारतीय आबादी शहरों में है। उस समय जब दोनों देश स्वतंत्र हुए थे 17 फ़ीसदी भारतीयों की तुलना में केवल 12 फ़ीसदी चीन के लोग शहरों में रहते थे। औद्योगिकरण बढ़ने के साथ चीन में शहरीकरण भी बड़ा है।
1980 तक चीन ने साक्षरता में भी भारत से बढ़त बना ली। उस वक्त तक चीन की दो-तिहाई आबादी साक्षर थी, जबकि हमारी आबादी में 5 में से 2 लोग ही साक्षर थे। भारत की साक्षरता तेजी से बढ़कर 74% तक तो पहुंची लेकिन इसी अवधि में चीन की साक्षरता दर बढ़ाकर 97 फीसद ही हो गई।

औद्योगिक शक्ति

भारत में कहा जाता है कि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बड़े उद्योगों की स्थापना की और भारत में औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। सच यह भी है कि आजादी भारत और चीन को आसपास ही मिली थी। तब भारत में चीन की तुलना में ज्यादा औद्योगिक केंद्र थे, लेकिन अब चीन को दुनिया का कारखाना कहा जाने लगा है। दोनों देशों द्वारा कार उत्पादन की संख्या में परिवर्तन इसे दिखाते हैं। मोटर वाहन निर्माताओं के अंतरराष्ट्रीय संगठन के डाटा से पता चलता है कि हम 1999 में चीन से ज्यादा पीछे नहीं थे। उस वक्त भारत ने 5.3 लाख कारें और चीन ने 5.7 लाख कारों का निर्माण किया। परंतु पिछले साल चीन ने 2.1 करोड़ कार उत्पादन किया तो भारत में सिर्फ 3600000 कारें ही बनाई हैं।

मोबाइल उत्पादन की स्थिति भी भारत और चीन के औद्योगीकरण में फर्क को दिखाने के लिए काफी है। वर्तमान में दुनियाभर की सभी बड़ी कंपनियां चीन में मोबाइल और उसके उपकरण बनाती हैं। विदेशी कंपनियों के आने की वजह से पहुंची तकनीक ने चीन में भी बड़ी संख्या में मोबाइल निर्माता कंपनियों का विकास हुआ। इसके विपरीत भारत में एक भी स्वदेशी मोबाइल निर्माता नही बन सका।
हालांकि, वर्तमान में भारत मोबाइल निर्माण में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है लेकिन इसमें एक भी भारतीय कंपनी नहीं है। दक्षिण कोरिया की सैमसंग और चीन की कंपनियां ही भारत में मोबाइल का निर्माण कर रही हैं। मोबाइल एप्स के विकास में भी भारतीय सॉफ्टवेयर निर्माता बहुत पीछे हैं।

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