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गठबंधन की राजनीति : पहली बार एकराय नजर आ रहे अखिलेश, प्रियंका और माया

यूपी गठबंधन और जाति-धर्म की राजनीति के लिए चर्चित है। लेकिन, लगता है अब सूबे में गठबंधन की राजनीति का दौर खत्म होने को है। नेताओं की बयानबाजी तो इसी ओर इशारा कर रही है। हालांकि, राजनीति में कब सब कुछ उलट-पुलट हो जाए, नहीं कहा जा सकता। फिर भी अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी और मायावती का आत्मविश्वास तो यही दर्शा रहा है कि ये सब के सब गठबंधन की राजनीति से तौबा करने वाले हैं। सभी प्रमुख नेता गठबंधन की राजनीति न करने पर एकमत हैं।

एक अंग्रेजी अखबार में खबर छपी है। यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव अपने नए आवास में अकेले टेनिस खेलते हैं। वह ऐसा पिछले दो सालों से कर रहे हैं। एकल गेम्स ने इन दो सालों में उन्हें इतना आत्मविश्वासी बना दिया है कि वह अब हर रोज नए लोगों को हराने के लिए न्योता भेजते हैं। उनके साथ खेलते हैं, जीतते हैं। …और अपने आत्मविश्वास को दोगुना करते हैं। सपा प्रमुख का यह आत्मविश्वास नए साल पर सपा दफ्तर में भी दिखा। मंत्रोच्चारण और बैंड बाजे के साथ नववर्ष का अभिनंदन किया गया। मंच पर अकेले सपा अध्यक्ष ही थे। जोशीले कार्यकर्ताओं को उन्होंने संबोधित किया- खुद में आत्मविश्वास पैदा करें। 2022 में सपा की सरकार बनेगी। अखिलेश यादव के गठबंधन की राजनीति के अब तक के अनुभव खट्टे ही रहे हैं, इसलिए उन्होंने दोहराया-सपा अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी।

अखिलेश ही क्यों? इन दिनों यूपी की राजनीति का चर्चित चेहरा बनीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का भी आत्मविश्वास देखने लायक है। वह भी कार्यकर्ताओं में जोश भर रही हैं। एलान भी कर चुकी हैं यूपी का विधानसभा चुनाव कांग्रेस अकेली लड़ेगी। ट्विटर पर उनकी टिप्पणियां और अपलोड किए वीडियो खूब कमेंट और लाइक बटोर रहे हैं। लगता है कांग्रेस महासचिव इससे उत्साहित और उर्जस्वित हो रही हैं। या फिर लखनऊ, रायबरेली और अमेठी में सक्रिय प्रियंका समर्थकों की भीड़ और उनके ओजस्वी नारों से ओत-प्रोत हो आत्मविश्वास बटोर रही है। आत्मविश्वास का स्रोत क्या है इसे तो वह ही जानें। लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस यूपी में अब अकेले मोर्चा संभालने की तैयारी में जुटी है।

बसपा प्रमुख मायावती गठबंधन की राजनीति का उस्ताद मानी जाती हैं। वह कई बार गठबंधन की राजनीति का स्वाद भी चख चुकी हैं। लेकिन, लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश से नाता तोड़ने के बाद वह भी एकला चलो की राह पर हैं। वैसे भी दस सांसदों की जीत से माया अभी तक आत्मविश्वास से भरी हैं। उनके उत्साह में कोई कमी नहीं है। वह ट्विटर पर खूब सक्रिय हैं। प्रेस कान्फ्रेंस का झंझट भी खत्म। हर रोज कुछ न कुछ ऐसा लिखती हैं जो आखिरकार, अखबारों की सुर्खियां बन ही जाता है। यह अलग बात है कि खुद बसपा सुप्रीमों पहले यह कह चुकी हैं किउनके समर्थक ट्विटर और फेसबुक नहीं जानते-समझते।

सूबे में भाजपा सरकार अपना दल के साथ गठबंधन धर्म निभा रही है। एक अन्य सहयोगी दल ओमप्रकाश की सुभासपा पिछले साल गठजोड़ तोड़ चुकी है। ऐसे में सिर्फ भाजपा ही जो आगामी विधानसभा चुनाव में अपना दल के साथ चुनाव में उतर सकती है। हालांकि पार्टी नेताओं का आत्मविश्वास इतना अधिक बढ़ा हुआ है कि उन्हें किसी से गठजोड़ की जरूरत महसूस नहीं होती। वैसे भी मोदी सरकार के ताबड़तोड़ फैसलों और राममंदिर निर्माण की घोषणा ने पार्टी नेताओं को जर्बदस्त उत्साह से भर दिया है। सूर्य उत्तरायण होते ही राम मंदिर निर्माण की तैयारियां दिखने लगेंगी। इससे भी नेताओं का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है।

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