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बिहार में डूब रही है नीतीश की नाव, क्या साथ डूबने को बीजेपी भी तैयार ?

जहां एक ओर महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में भाजपा को आशा के विपरीत परिणाम मिले हैं, तो बिहार में हुए उपचुनावों में एनडीए को काफी गहरा झटका लगा है. बिहार में 5 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे, जिसमें राजद को दो सीटों पर जीत मिली है. दरौंदा विधानसभा में निर्दलीय प्रत्याशी कर्णजीत सिंह जीते. वहीं, किशनगंज सीट पर एआईएमआईएम कैंडिडेट कमरुल होदा चुने गए. जदयू ने केवल नाथनगर की सीट जीतकर अपनी लाज बचाई, वो भी आखिरी राउंड में. लोकसभा में एनडीए ने 40 में से 39 सीटों पर कब्जा किया था लेकिन उपचुनाव में तस्वीर बदल गई. जाहिर है, राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले सत्ताधारी जेडीयू-बीजेपी गठबंधन के लिए रुझानों से अच्छे संकेत नहीं मिल रहे हैं. अब इसकी वजह क्या है, ये हम आपको बताते हैं.

पहले जून-जुलाई के बीच चमकी बुखार के कारण बिहार के कई क्षेत्रों में बच्चों की असामयिक मृत्यु हुई, जिसके कारण नितीश कुमार की सरकार को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा. मुजफ्फरपुर में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के कारण बड़ी संख्या में बच्चों की मौत ने नीतीश कुमार के कुशासन की पोल खुल गयी थी. बिहार में यह बीमारी काफी पहले से है लेकिन नीतीश कुमार ने अपने 13 साल के शासनकाल में इस बीमारी से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया.

कुछ दावों की माने तो इस बीमारी के कारण पहले भी मासूमों की मौत हो चुकी हैं. इतनी मौतों के बाद भी नीतीश सरकार ने इस मामले को गंभीरता से कभी नहीं लिया. हमेशा उन्होंने सब कुछ ठीक होने का ढोंग किया. यही नहीं हर बार की तरह उन्होंने बस मृतकों के परिवार को मुआवजा देने की घोषणा कर अपनी ज़िम्मेदारी से पलड़ा झाड़ लेना उनकी राजनीति का हिस्सा रहा है.

इसके अलावा जब बिहार बाढ़ से प्रभावित था तब भी नीतीश सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह सही तरीके से नहीं किया था और तो और इसके लिए भी वो केंद्र सरकार की और देख रहे थे. नीतीश कुमार ने केंद्र से मदद की दरकार की लेकिन अपने स्तर पर कोई उचित कदम नहीं उठाये. हर बार नीतीश कुमार स्थिति का आंकलन करने की बजाय और उचित कदम उठाने की बजाय पल्ला झड़ने की भरपूर कोशिश करते हैं. स्थिति तो इतनी दयनीय हो गयी कि स्वयं उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बाढ़ में फंसे हुए दिखाई दिये. परंतु नितीश कुमार की असफलता यहीं तक सीमित नहीं है.

यही नहीं जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का जहां पूरा देश समर्थन कर रहा था, तो जेडीयू ने इसका विरोध किया था. राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर पर लाए गए बिल पर चर्चा के दौरान जेडीयू के सदस्यों ने वॉकआउट किया था. बाद में आलोचनाओं के बाद जेडीयू ने यू-टर्न लिया था लेकिन तब तक इस पार्टी को काफी नुकसान पहुंच चुका था.

वैसे भी अपनी पार्टी के हित के लिए नीतीश कुमार अपने सहयोगी का विरोध करने से भी नहीं झिझकते. सच तो यह है कि किसी को नहीं पता कि वे वास्तविक रूप से किस पार्टी या विचारधारा की ओर अपनी निष्ठा रखते हैं. ऐसे में बिहार के उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं है.

नीतीश कुमार की असफलता अब खुलकर सामने आ रही है. यदि भाजपा समय रहते नहीं चेती, तो जदयू के साथ गठबंधन 2020 में बिहार चुनाव में भाजपा के लिए काफी हानिकारक होगा. सियासी जानकारों का कहना है कि भाजपा को अविलंब नीतीश कुमार साथ छोड़कर बिहार में अपना जनाधार सशक्त करने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इस बार नीतीश तो डूबेंगे ही, और अगर भाजपा न चेती तो उन्हे भी साथ ले डूबेंगे.

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