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आरे के जंगल नहीं काटने चाहिए थे, लेकिन ये एक दिन के पर्यावरण प्रेम की नौटंकी क्यों?

मुंबई में आरे के जंगल नही काटने चाहिए थे, मैं भी मानता हूं पर ये एक दिन के पर्यावरण प्रेम की नौटंकी क्यों? आपको क्या लगता है यूं पेड़ों को पकड़कर रोते हुए खिंचाई गई तस्वीरों से देश का पर्यावरण बचने वाला है. मैने बचपन से गांव देखे हैं. आज भी याद है अपने गांव के लोग जो गाहे बगाहे कभी भी और कहीं भी पौधे रोप दिया करते थे. पौधे रोपना उनकी आदत में था. उन्हें कभी किसी सरकारी मदद की जरूरत नही पड़ी. फिर चाहे कोई भी सरकार रही हो. कांग्रेस की. बीजेपी की या फिर खिचड़ी. वे तालाबों और जोहड़ों की पूजा करते थे. कुओं की परिक्रमा करते थे. पेड़ लगाना उनके लिए पुण्य सरीखा था. उन्हें किसी छपास का शौक नही था. ये एक दिन के “अखबारी” आंसू बहाने वाले लोगों से पर्यावरण का कोई भला नही होना है. आज के आंसू बहाते हुए यही लोग आपको अगली सुबह से मैकडोनाल्ड और सबवे की दुकानों में पिज्जा बर्गर की दावत पर छपास की अगली योजना बनाते नजर आएंगे. अगर आपको ये जानना है कि पर्यावरण कैसे बचेगा तो आज का इंडियन एक्सप्रेस पढ़िए.

आज इंडियन एक्सप्रेस ने बिहार के बांका जिले के दो ब्लाकों की अद्भुत कहानी छापी है. कभी जबरदस्त सूखे से प्रभावित रहे इन ब्लाकों में अब चमत्कार हो चुका है. अब यहां पानी के सोते बहते हैं. ये बांका जिले के कटोरिया और चांदन ब्लॉक हैं. यहां पर गुजरे 10 साल में 10 पंचायतों ने अपने दम पर “तालाब” क्रांति की शुरुआत की. इस गांव के 70 साल के एक किसान अनिरुद्ध प्रसाद सिंह ने ये बीड़ा अपने कंधों पर उठाया. उन्होंने दिन-रात गांव में तलाब और जोहड़ बनाने का अभियान छेड़ा. धीरे धीरे लोग साथ आए. आज कटोरिया और चांदन के दोनो ही ब्लॉकों में करीब 150 तालाब, चेक डैम और सिंचाई के साधन हैं.

अनिरुद्ध प्रसाद के इस अभियान ने 30 गांवों के 1000 किसानों की सीधी मदद की है. अब 200 गांवों के करीब 10,000 किसान उनके मॉडल को फॉलो कर रहे हैं. जहां कभी सूखी जमीन का मरुथल हुआ करता था, वहां अब हर तरफ जोहड़ और बावड़ियों की पैदावार नजर आती है. जहां कभी बमुश्किल एक फसल हुआ करती थी, अब वहां किसान साल में दो फसलों का सौभाग्य ले रहे हैं. बिहार सरकार ने जिस वक्त बांका समेत कई जिलो में सूखा घोषित किया, उस वक्त भी इन दो ब्लाकों को सूखे की लिस्ट से बाहर रखा गया. उस दौर में भी यहां 70 फीसदी धान की बुवाई की गई. ये एक 70 साल के किसान की दृढ़ इच्छाशक्ति का कमाल था.

सो पर्यावरण को रोज का अभियान बनाइए. ये हमारी जिंदगी का सवाल है. ऐसे अहम सवालों पर नौटंकी करने से कुछ नही हासिल होगा. हर घर में लोग इस अभियान के लिए तैयार होंगे. अपने आस-पास पौधे लगाएंगे. लगे हुए पौधों को पानी देंगे. ये चेतना आगे बढ़ेगी. फिर कोई भी सरकार पर्यावरण को हाथ लगाने से डरेगी. पर्यावरण की लड़ाई आम जनता को ही लड़नी होगी. इन छपास के रोगी एक्टिविस्टों से कुछ न होगा.

ये लेख वरिष्ठ टीवी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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