यूं तो हिन्दी सिनेमा युवा प्रधान है और समूचा सिने उद्योग युवाओं की सोच और मांग को ध्यान में रखकर फिल्मों का निर्माण करता है लेकिन बाल कलाकारों ने इस व्यवस्था को अपने दमदार अभिनय से लगातार चुनौती दी है।बाल फिल्मों की गिनी चुनी संख्या और बाल कलाकारों को मुख्यधारा के सिनेमा में कम जगह मिलने के बावजूद इन कलाकारों का इतिहास भरपूर रोशन है।
जब भी हम फिल्मो में बाल कलाकार को देखते है तो हम यही सोचते हैं की ये इतना अच्छा अभिनय कर रहे हैं, आखिर ये बच्चों को फिल्म में कहाँ से लाया जाता है तो आज हम आपको इसी सच्चाई के बारे में बताने वाले हैं जो शायद आज के पहले नहीं जानते होंगे |
इन नन्हे बाल कलाकारों को देखकर आपको भी यही लगता होगा कि फिल्मों में दिखने वाले बच्चे जरुर किसी हीरो हीरोइन के परिवार से ही होते होंगे क्योंकि इनका अभिनय होता ही इतना शानदार है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि ऐसा बिल्कुल नहीं होता है. जो भी फिल्मों में बच्चे काम करते हैं, उनको ज्यादातर एक एजेंसी के द्वारा लिया जाता है. फिर वह बच्चे अपने माता पिता के साथ फिल्मों में ऑडिशन के लिए आते हैं.
जिसके बाद जो डायरेक्टर को फिल्म के लिए जो बच्चा ठीक लगता है उस किरदार पर बिलकुल फिट बैठता है उसे फिल्म के लिए चुन लिया जाता है इसके अलावा कभी कभी ऐसा भी होता है जो कि बॉलीवुड के कलाकारों के बच्चे भी फिल्मो में लिए जाते हैं, लेकिन उनका भी ऑडिशन लिया जाता है जैसे और बच्चो का लिया जाता है और यदि वे उस दृश्य के लिए ठीक बैठते है तब उन्हें फाइनल किया जाता है |
अक्सर फिल्मों में डायरेक्टर को तरह-तरह के बच्चों की जरुरत होती है कभी काले बच्चे तो कभी गोरे बच्चे तो कभी बिल्कुल ही शिशु बच्चे की जरुरत होती है क्योंकि उन बच्चो को फिल्मों के दृश्य के अनुसार ही चुनाव किया जाता है. अब आप सोच रहे होंगे की इन बच्चो को वेतन कितना दिया जाता होगा तो हम आपको बता दे की यदि इन बच्चों के वेतन के बारे में बात करे तो ऐसा बिल्कुल नहीं होता कि इनको भी हीरो हीरोइन की तरह करोड़ो रुपये भुगतान किया जाए बल्कि इन बच्चों को एक दिन के रोल के लिए लगभग 10,000 हजार से लेकर 20,000 तक का भुगतान किया जाता है जो इनके माता पिता को दिया जाता है |